खामेनेई की अंतिम यात्रा में एक करोड़ लोग शामिल हुए।पूरे विश्व में कोई और ऐसा नेता है जिसके जनाजे में इतने लोग शामिल हुए हो ? या फिर आज के दौर में भारत में कोई ऐसा नेता है जिससे जनता इतना प्यार करती हो ? और ईरान में तो सरकार रेवड़ी भी नहीं बाटती !
@dominos_india your delivery service is pathetic. You are dependent on bot and store only . Fun part is your bot aka so-called virtual customer redirects to store phone numbers and that number is not in service. There is no way to escalate the issue. @dominos
रामलला टेंट में इसलिए नहीं थे कि राम मंदिर आंदोलन करने वालों ने उन्हें वहाँ रखा था। रामलला टेंट में इसलिए रहे क्योंकि उस दौर की सत्ता और व्यवस्था ने करोड़ों हिंदुओं की आस्था को वह सम्मान नहीं दिया जिसकी वे अपेक्षा करते थे।
हिंदुओं ने मंदिर माँगा, तो उन्हें दशकों तक इंतज़ार मिला। कारसेवकों ने बलिदान दिए, लाखों लोगों ने आंदोलन किया, और भगवान राम को अस्थायी टेंट में रखा गया। वह टेंट आंदोलन की उपलब्धि नहीं, बल्कि उस समय की राजनीतिक और प्रशासनिक विफलता का प्रतीक था।
आज जब वर्षों के संघर्ष और अनगिनत बलिदानों के बाद भव्य राम मंदिर खड़ा है, तब उसी टेंट को आंदोलनकारियों के सिर मढ़ना इतिहास को उल्टा पढ़ने जैसा है। जिन्होंने मंदिर के लिए संघर्ष किया, उन्हें ही टेंट का दोषी बताना न केवल तथ्यों से परे है, बल्कि उन लाखों श्रद्धालुओं और बलिदानियों का भी अपमान है।
राम मंदिर दान घोटाले से आहत हूँ चकित नहीं।मंदिर आंदोलन के दौरान रथयात्रा उसके बाद चंदे चढ़ावे दान से जुटी करोड़ों की रकम का कभी सार्वजनिक हिसाब नहीं दिया गया,ट्रस्ट से शंकराचार्यों धर्माचार्यों को दूर रखा गया साफ़ था कि इसके नियंता पारदर्शिता नहीं चाहते।इसलिए ये तो होना ही था।
@dmbijnor महोदया,
जैसा कि आपको अवगत है, आज गंगा दशहरा का पावन पर्व है। इस अवसर पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु गंगा बैराज ( मीरापुर बिजनौर) पर स्नान के लिए आते हैं। किंतु इस वर्ष वहाँ की व्यवस्थाएँ अत्यंत अव्यवस्थित एवं निराशाजनक हैं।
हम सभी जानते हैं कि इस समय गंगा में जल स्तर अपेक्षाकृत कम होता है, परंतु स्नान के दौरान बैराज प्रशासन द्वारा जलकुंभी को बहाया जाना स्थिति को और भी खराब कर रहा है। श्रद्धालुओं के बैठने एवं विश्राम करने के स्थानों पर लोगों ने अवैध रूप से दुकानें लगाकर अतिक्रमण कर रखा है। इस संबंध में जब वहाँ उपस्थित प्रशासनिक कर्मियों से शिकायत की जाती है, तो उनका कहना होता है कि यह उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं है। कुछ पुलिसकर्मी यह कहते हुए दिखाई दिए कि वे वहाँ मौजूद तो हैं, परंतु उनकी ड्यूटी इस व्यवस्था से संबंधित नहीं है। इसके अतिरिक्त, भिखारियों ने भी कई स्थानों और प्रवेश द्वारों पर कब्जा कर रखा है।
कुल मिलाकर श्रद्धालुओं के लिए उपलब्ध व्यवस्थाएँ अत्यंत खराब एवं अव्यवस्थित हैं। अतः आपसे विनम्र अनुरोध है कि कृपया इस विषय को गंभीरता से संज्ञान में लें तथा गंगा बैराज क्षेत्र में हो रहे अतिक्रमण को हटाने एवं समुचित व्यवस्थाएँ सुनिश्चित कराने की कृपा करें, जिससे श्रद्धालुओं को किसी प्रकार की असुविधा का सामना न करना पड़े। धन्यवाद @CMHelpline1076@UPCMOffice
कुछ चंदा चोरों की वजह से मंदिर जाना और दान करना छोड़ दें?
सोमनाथ 17 बार लूटा गया, भक्त मारे गए, फिर भी आस्था अडिग रही। जो श्रद्धा सदियों के आक्रमण नहीं मिटा सके, उसे कुछ भ्रष्ट लोग क्या मिटाएंगे?
राम मंदिर आस्था का केंद्र है, किसी ट्रस्ट या व्यक्ति का नहीं।
सनातन झुकता नहीं, और आस्था बिकती नहीं।
कुछ चंदा चोरों की वजह से मंदिर जाना और दान करना छोड़ दें?
सोमनाथ 17 बार लूटा गया, भक्त मारे गए, फिर भी आस्था अडिग रही। जो श्रद्धा सदियों के आक्रमण नहीं मिटा सके, उसे कुछ भ्रष्ट लोग क्या मिटाएंगे?
राम मंदिर आस्था का केंद्र है, किसी ट्रस्ट या व्यक्ति का नहीं।
सनातन झुकता नहीं, और आस्था बिकती नहीं।
BIG BREAKING: राम मंदिर चंदा गबन घोटाले का बड़ा असर दिखा! श्रद्धालुओं की संख्या में भारी गिरावट, चढ़ावे में आई 80% की भारी कमी।
अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि मंदिर में दानराशि गबन के मामले की जांच चलते अब भक्तों के मन में गहरा आघात पहुंचा है। मंदिर से जुड़े सूत्रों के अनुसार, जहां पिछले कई महीनों से प्रतिमाह औसतन 7 करोड़ रुपये के आसपास चढ़ावा आ रहा था, वही पिछले 15 दिनों में यह राशि घटकर मात्र डेढ़ करोड़ रुपये रह गई है।
@ShriRamTeerth@dmayodhya@LucknowDivision@jaiveersingh099
प्रधानमंत्री मोदी और मायावती में एक समानता है।दोनों ने सत्ता में रहकर अपना इतिहास खुद लिखा।बहन जी ने खुद के,उनकी पार्टी के चुनाव चिन्ह और काशी राम की मूर्तियां लगवाई।प्रधानमंत्री जी ने भी,एयरपोर्ट,स्टेडियम,Central vista जैसे योजनाओं पर अपना नाम लिखवा दिया।शायद नेता सोचते होगे कि सत्ता से हटने के बाद कोई याद नहीं करेगा !
महोदय, ग्राफ़ बनाने से पहले एक बुनियादी आर्थिक सिद्धांत का ध्यान रखना चाहिए था।
GDP को डॉलर में और सरकारी कर्ज को रुपये में दिखाकर तुलना करना वैसा ही है जैसे किसी की ऊँचाई फीट में और वजन किलो में दिखाकर निष्कर्ष निकालना।
दूसरी बात, 2008 से 2014 के बीच कर्ज ₹27 लाख करोड़ से ₹55 लाख करोड़ हुआ था। तब यह "विकास के लिए निवेश" था, लेकिन आज वही तर्क अमान्य कैसे हो गया?
अर्थशास्त्र में कर्ज अपने आप में समस्या नहीं होता। असली सवाल यह होता है कि कर्ज से परिसंपत्तियाँ और उत्पादक क्षमता कितनी बढ़ी।
जैसा कि जॉन मेनार्ड कीन्स ने कहा था — "The boom, not the slump, is the right time for austerity."
आलोचना तथ्यों पर होनी चाहिए, आई जनरेटेड ग्राफिक्स पर नहीं।
महोदय, ग्राफ़ बनाने से पहले एक बुनियादी आर्थिक सिद्धांत का ध्यान रखना चाहिए था।
GDP को डॉलर में और सरकारी कर्ज को रुपये में दिखाकर तुलना करना वैसा ही है जैसे किसी की ऊँचाई फीट में और वजन किलो में दिखाकर निष्कर्ष निकालना।
दूसरी बात, 2008 से 2014 के बीच कर्ज ₹27 लाख करोड़ से ₹55 लाख करोड़ हुआ था। तब यह "विकास के लिए निवेश" था, लेकिन आज वही तर्क अमान्य कैसे हो गया?
अर्थशास्त्र में कर्ज अपने आप में समस्या नहीं होता। असली सवाल यह होता है कि कर्ज से परिसंपत्तियाँ और उत्पादक क्षमता कितनी बढ़ी।
जैसा कि जॉन मेनार्ड कीन्स ने कहा था — "The boom, not the slump, is the right time for austerity."
आलोचना तथ्यों पर होनी चाहिए, आई जनरेटेड ग्राफिक्स पर नहीं।
ब्लूमबर्ग ने स्वयं RBI द्वारा सोना बेचने वाली अपनी रिपोर्ट का खंडन कर दिया है।
जो लोग बिना पुष्टि किए गए समाचारों के आधार पर सवाल उठा रहे थे, आरोप लगा रहे थे और निष्कर्ष सुना रहे थे, उन्हें अब सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए। लोकतंत्र में सवाल पूछना आवश्यक है, लेकिन अपुष्ट खबरों को सत्य मान लेना नहीं।
मार्क ट्वेन का प्रसिद्ध कथन याद आता है—
"सच जब तक जूते पहनता है, तब तक झूठ आधी दुनिया का चक्कर लगा लेता है।"
अफवाहों से नहीं, तथ्यों से बहस होनी चाहिए।
उत्तर प्रदेश के माननीय मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ जी, आपको जन्मदिवस की हार्दिक शुभकामनाएं!
मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम जी से आपके उत्तम स्वास्थ्य एवं दीर्घायु की कामना करता हूंl
@myogiadityanath#HAPPYBIRATHDAYYOGIJI#HaritJanmotsavYogiJi
मनोज बाजपेयी जी एक अच्छे अभिनेता हैं, लेकिन क्या वास्तव में उनसे यह सवाल पूछा जाना चाहिए कि "क्या RBI ने सोना बेच दिया?" -वह भी एक फेक न्यूज़ के आधार पर?
मीडिया वास्तव में टीआरपी और व्यूज़ के लिए कुछ भी कर सकता है। ऐसे मामलों में तथ्यों की पुष्टि करने के बजाय सनसनी फैलाने पर अधिक ध्यान दिया जाता है, जो दुर्भाग्यपूर्ण है।
लेख में यह मान लिया गया है कि भारत में जो बदलाव आया है, वह केवल बीजेपी या नरेंद्र मोदी की देन है और समाज का एक बड़ा वर्ग किसी वैचारिक भ्रम का शिकार हो गया है। लेकिन यह दृष्टिकोण अधूरा है।
सच्चाई यह है कि 2014 के बाद जो राजनीतिक परिवर्तन दिखा, वह अचानक नहीं आया था। यह दशकों से जमा हो रही जनता की आकांक्षाओं, असंतोष और राजनीतिक विकल्प की तलाश का परिणाम था। यदि कांग्रेस की कमजोरियां बीजेपी के उभार का कारण थीं, तो यह भी स्वीकार करना होगा कि बीजेपी की सफलता केवल कांग्रेस की विफलता से नहीं, बल्कि अपने संगठन, नेतृत्व, संदेश और जनता से जुड़ाव के कारण भी आई।
लेख में "नये भारत" की भाषा को अजनबी बताया गया है। लेकिन लोकतंत्र में यह मान लेना कि जो विचार हमें अपरिचित लगते हैं, वे गलत हैं, स्वयं लोकतांत्रिक भावना के विपरीत है। भारत एक विविध समाज है, जहां अलग-अलग वर्गों की अलग-अलग प्राथमिकताएं और चिंताएं हो सकती हैं। जो बातें पहले मुख्यधारा की राजनीति में जगह नहीं पाती थीं, वे आज खुलकर सामने आ रही हैं।
कांग्रेस की ऐतिहासिक गलतियों पर चर्चा उचित है, लेकिन यह भी उतना ही सही है कि दशकों तक सत्ता में रहने वाली पार्टी ने देश की संस्थाओं, राजनीति और समाज को उसी तरह आकार दिया, जैसा वह चाहती थी। यदि आज जनता ने किसी अन्य राजनीतिक दिशा को चुना है, तो उसे केवल प्रचार, ध्रुवीकरण या वैचारिक विचलन कहकर खारिज नहीं किया जा सकता।
राहुल गांधी और कांग्रेस को अपनी राजनीतिक रणनीति बनाने का पूरा अधिकार है, लेकिन किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सफलता का आधार केवल विरोध नहीं, बल्कि जनता को एक विश्वसनीय और सकारात्मक विकल्प देना होता है। भारतीय मतदाता बार-बार यह साबित कर चुका है कि वह किसी दल या परिवार का स्थायी समर्थक नहीं, बल्कि अपने अनुभव और अपेक्षाओं के आधार पर निर्णय लेने वाला नागरिक है।
इसलिए "नये भारत" को समझने का सबसे अच्छा तरीका उसे संदेह या भय की दृष्टि से नहीं, बल्कि जनता की लोकतांत्रिक पसंद के रूप में देखना है।