“उस मासूम की क्या गलती थी?”
सत्य निकेतन की त्रासदी में अपने बेटे, अर्पित जाज, को खोने वाला परिवार डबडबाई आंखों से यही सवाल पूछ रहा है।
अगर अच्छे और सुरक्षित हॉस्टल होते, तो उन्हें अपने बच्चे को ऐसी खतरनाक जगह में रखने के लिए मजबूर न होना पड़ता। और अगर सुरक्षा मानकों का सच में पालन होता, तो शायद यह त्रासदी होती ही नहीं - एक ऐसी त्रासदी, जिसकी कल्पना उन बच्चों और उनके माता-पिता ने सपने में भी नहीं की होगी।
सिस्टम की गैर-जिम्मेदारी और भ्रष्टाचार ने सपनों से भरी कई जिंदगियां छीन लीं और उम्मीदों से भरे कई परिवारों को उजाड़ दिया।
अर्पित का परिवार भी पूरे देश की तरह जवाबदेही मांग रहा है। वे चाहते हैं कि छात्रों की जिंदगी की जिम्मेदारी तय हो, ताकि फिर किसी माता-पिता को अपने बच्चे को इस तरह खोने का दर्द न सहना पड़े।
सिस्टम से मेरा सीधा सवाल है: नए और सुरक्षित हॉस्टल क्यों नहीं बनाए जा रहे? छात्रों को असुरक्षित PG में रहने के लिए मजबूर क्यों होना पड़ रहा है? सत्य निकेतन हादसे की जांच कहां तक पहुंची?
मंदिर में चोरी करवानेवाले और दुखी माँ का अपमान करनेवालों की झूठी बात का भरोसा अब कोई नहीं कर रहा है।
- जिन्होंने अपने ऊपर से मुक़दमे हटवाएं हों;
- जो पूज्य शंकराचार्य जी तक पर प्रहार करवाते और आरोप लगाते हों;
- जो संविधान का विरोध करने के लिए बाबासाहेब की मूर्तियों तक को तोड़ रहे हों;
- जो अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ नाइंसाफी की हर हद पार कर गये हों;
- जिन्होंने ‘हाथरस की बेटी’ के साथ अंतिम संस्कार तक का न्याय न किया हो;
- जिनको ‘हाता नहीं भाता’;
- जिन्होंने एक युवा विधवा को जेल में तड़पाया हो;
- जो प्राध्यापक, पत्रकार व ईमानदार अधिकारी तक को अभद्र शब्दों से संबोधित करते हों;
- जिन्होंने कॉरिडोर, पुल, एक्सप्रेसवे, मंदिर, पानी की टंकी के नाम पर निर्माण में पैसे खाएं हों;
- जो अपने सत्ता सजातीयों को हर अपराध के बाद बचाते हों;
- जो जनता के टैक्स के 2.5 करोड़ रुपये हर दिन अपनी नक़ली छवि बनाने पर लुटा रहे हों;
- जो विपक्ष पर झूठे मुक़दमे लगवाते हों;
- जो अपने विरोधियों का फ़ेक एनकाउंटर करवाते हों;
- जो बुलडोज़र से लोगों के घर गिरवाते हों;
- जो स्कूलों को बंद करवा रहे हों;
- जिनकी कुर्सी खींचने के लिए उनके अपने उप ही प्रयासरत हों;
- जिनका विरोध उनके ही विधायक करते हों;
- जिनका अपने दल के प्रधान से ही मुख्य संघर्ष हो;
- जो भ्रष्टाचार के पैसों को सोने की सिल्ली में ढलवाते हों;
- जिनकी कमीशनख़ोरी की वजह से लगातार बढ़ती कमरतोड़ महंगाई ने खाना-पीना, दवाई-इलाज, पढ़ाई सब महंगा कर दिया हो;
- जिनकी प्रशासनिक अज्ञानता और अक्षमता का लाभ अधिकारी लगातार उठा रहे हों;
- जिनके अपने मंत्री तक न्याय पाने के लिए धरने पर बैठ रहे हों;
- जिनके समय में बिजली, पानी, सड़क जैसी बुनियादी ज़रूरतों के लिए लोग तरस रहे हों,
- जो किसानों-मज़दूरों को उनकी फसल-मेहनत का सही दाम इसलिए नहीं दिलवा रहे हों कि उनकी किसी से डील हो गई है;
- जो किसानों को खाद, सिंचाई का पानी, बिजली न दिलवा पा रहे हों;
- जो खेती को छुट्टा पशुओं से न बचा पा रहे हों;
- जो अपने प्रदेश के व्यापार-कारोबार को दूसरे राज्यों के ठेकेदारों को नीलाम कर रहे हों;
- जो जीएसटी की मार से छोटे दुकानदारों-कारख़ानों को ख़त्म करने पर उतारू हों;
- हस्तकलाओं-शिल्पकारों को विदेशी डील के माध्यम से मार रहे हों;
- जो ट्रेडिंग के बिचौलियों के लिए प्रदेश के उत्पादन को समाप्त कर रहे हों;
- जो इंवेस्टमेंट में एडवांस कमीशन खाते हों,
- जो कोर्ट में नौकरी-भर्ती फँसाकर, लेटरल एंट्री, संविदा, नॉट फाउंड सूटेबल के माध्यम से आरक्षण मार रहे हों;
- जिन्होंने प्रतिभावानों, हुनरमंदों के यश भारती जैसे सम्मान और सम्मान राशि बंद कर दी हो;
- जो सरकारी संपत्ति बेच रहे हों;
- जिनका शासनकाल महिलाओं के विरुद्ध अपराध व हिंसा में नंबर वन हो;
- जिनके समय में ‘हिरासत में मौतों’ का रिकॉर्ड बना हो;
- जिनके समय में माफ़िया नहीं बल्कि क़ानून-व्यवस्था ही प्रदेश छोड़कर भाग गई हो और ‘क्राइम के ख़िलाफ़ ‘ज़ीरो-टॉलरेंस’ का दावा ही ‘ज़ीरो’ हो गया हो;
- जिनके भ्रष्ट शासन में ‘हथेली गरम, पुलिस नरम’ का फ़ार्मूला जनता में लोकप्रिय हो गया हो;
- जिनके शासनकाल में आईपीएस फ़रार हुआ हो और थाने पर छापे पड़े हों;
- जिनके समय में ‘कोडीन भाई’ और ‘वनस्पतिगंज’ जैसे सीरियल बनने की चर्चा हो;
- जिनके समय में भूमाफ़ियाओं, क़ब्ज़ाजीवियों, अवैध खननवालों, जमाख़ोरों, मिलावटखोरों का बोलबाला हो;
- जो पीडीए समाज के लोगों के आवास गंगा जल से धुलवाते हों; मंदिर-चौराहे-मंच तक का शुद्धीकरण करवाते हों;
- जो पीडीए समाज के लोगों से मिलने से पहले उनको साबुन से नहलवाते हों;
- जो ‘पीडीए’ पर अत्याचार करवाकर मन-ही-मन मुस्कुराते हों;
- जिनके समय में शिक्षक, शिक्षार्थी, शिक्षामित्र, आशा-आँगनबाड़ी-सहायिका, चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी, पुरानी पेंशन की मांग करनेवाले वरिष्ठ नागरिक, 1090 व 69000 वाले, UPSSSC व अन्य भर्ती व सैन्यभर्तीवाले, टीईटीवाले, वकील, पेशेवर, डिलेवरी पर्सन, बीएलओ, प्रधान और सभी विभागों के ईमानदार लोग उपेक्षित-उत्पीड़ित व परेशान हों;
- जिनके समय में डबल इंजन की आपसी टकराहट में उत्तर प्रदेश पिस रहा हो;
- जिनके अपने भाषण-संबोधन में अपनी कोई बात कहने को नहीं हो;
ऐसे लोगों की बातों का अब कोई असर नहीं हो रहा है क्योंकि वो ख़ुद दिन भर किसी के असर में रहते हैं।
जनता अब उनको सुनने के मूड में नहीं है।
"सरकार के पास दिया जलाने के लिए पैसा है - हमारे हॉस्टल के लिए क्यों नहीं?"
यह सवाल कल इंदौर में एक छात्रा ने मुझसे पूछा।
गाँव से पढ़ने शहर आई। हॉस्टल है नहीं, तो PG में रहना पड़ता है। सिर्फ़ सुरक्षित रहने में लाखों ख़र्च हो जाते हैं। हर महीने किराए की चिंता, और बेघर होने का डर - इसी में पढ़ाई करनी पड़ती है।
कई लड़कियाँ इसी वजह से पढ़ाई छोड़ देती हैं। सिर्फ़ इसलिए कि रहने की जगह नहीं है।
और आवास भत्ता? महंगाई के साथ बढ़ता नहीं, ऊपर से भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ जाता है।
@narendramodi जी - उस बच्ची के सवाल का कोई जवाब है आपके पास?
बीजेपी के मीडिया विभाग और रणनीतिकार अगर समझदार होंगे तो इस विडियो पर प्रतिक्रिया नहीं देंगे।अन्यथा ये बात दूर तक चली जाएगी।राहुल गांधी की टीम तो यही चाहती हैं कि बीजेपी इसका मुद्दा बनाए…
देश पर एक system का कब्ज़ा है - परत दर परत।
कौन है ये सिस्टम?
RSS और "हम दो, हमारे दो" की अगुवाई में गिनती के लोगों ने मिल कर भारत की हर संस्था पर अपना नियंत्रण कर लिया है।
सरकार हो, व्यापार हो, शिक्षा हो, स्वास्थ्य हो, खेल हो, मीडिया हो, न्यायपालिका हो, चुनाव आयोग हो या bureaucracy - इस सिस्टम में हुनर नहीं, पैसा और पहुंच मायने रखता है।
इस क़ब्ज़े के खिलाफ, भ्रष्टाचार के खिलाफ, अन्याय के खिलाफ छात्रों की आवाज़ ही सिस्टम के लिए सबसे बड़ी चुनौती है।
इसीलिए system को students से खतरा है - क्योंकि वो सवाल पूछते हैं, जवाबदेही मांगते हैं।
इसी डर से सिस्टम छात्र नहीं, अंधभक्त चाहता है - छात्रों को प्रताड़ित करता है, अंधभक्त को बढ़ावा देता है, ताकि कोई सवाल न उठे और मनमानी चलती रहे।
#ChhatronKiGoonj
Let's talk about Manish Chatrath's track record, because the party clearly won't.
He was AICC in-charge of Arunachal Pradesh. Congress is irrelevant there.
He was AICC in-charge of Meghalaya. Congress went from the single largest party with 21 seats in 2018 to a humiliating 5 seats in 2023 under his watch. Not a dip. A collapse.
His reward for destroying Congress's footprint across two northeastern states? Incharge of the AICC headquarters at Indira Bhawan. A promotion.
In Congress, apparently, the worse you perform in the field, the safer your desk job becomes.
Now his son, Veer Chatrath, gets the NSUI vice-presidential ticket for DUSU 2026. No ground record. No student movement history. Just a surname.
The result? Deepanshu Shokeen, a rebel who had to fight NSUI from outside because he refused to accept this ticket culture, didn't just win; he demolished the field. Veer Chatrath finished a distant third. Not second. Third. Behind ABVP.
The candidate fielded by the full organisational weight of NSUI couldn't even beat the RSS-backed machinery, let alone the independent who exposed them both.
One nepotism-driven ticket fractured the entire NSUI panel's campaign in Delhi. The knock-on effect on coordination, messaging, and voter confidence was visible in the numbers.
So here is the question Congress owes every genuine NSUI worker an answer to: On what ground does Manish Chatrath remain incharge of the AICC headquarters after failing in Meghalaya, failing in Arunachal, and now using his party position to parachute his son into a student election ticket that cost the organisation a winnable contest?
And why has neither Kanhaiya Kumar nor Vinod Jakhar demanded he be held accountable for the damage his family's entitlement did to NSUI's 2026 DUSU campaign?
Rahul Gandhi Ke Mehnat Par Khuleaam Muta Jata Hai INC Me Baithe Leaderon ke Dwara 🥲
KCV, Party Ka GSO Hai Usko Apna Kaam Hi Nahi Maloom Hai
Aap Kisi Party Ke GSO Hon Aor Aap Ke Nak ke Niche Party Ki Gaand Mari Ja Rahi Ho Aor Aap Kuchh Na Kar Pa Rahe Hon To Aap Xutiya Hain..🤬