‘उदयाचल मेरा दीप्त भाल,
भूमंडल वक्षस्थल विशाल,
भुज परिधि-बन्ध को घेरे हैं,
मैनाक-मेरु पग मेरे हैं।
दिपते जो ग्रह नक्षत्र निकर,
सब हैं मेरे मुख के अन्दर।
कितने शर्म की बात है कि हम
कुत्ते को गोद में उठा सकते हैं,
उसे रसोई में भी ले जा सकते हैं, लेकिन
इंसान के स्पर्श मात्र से धर्म भ्रष्ट हो जाता है।
– शहीद भगत सिंह |
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विजयादशमी ने दिया, हम सबको उपहार I
अच्छाई के सामने, गयी बुराई हार II
मनसा-वाता-कर्मणा, सत्य रहे भरपूर I
नेक नीति हो साथ में, बाधाएँ हों दूर II
पुतलों के ही दहन का, बढ़ने लगा रिवाज I
मन का रावण आज तक, जला न सका समाज II
~ रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
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