आजकल की स्त्रियाँ विवाह नहीं करना चाहतीं...
मैं एक पुरुष हूँ, और सत्य कहूँ तो मैं भी विवाह नहीं चाहता।
मैं नहीं चाहता कि मैं ब्याह लाऊँ किसी की प्रेमिका।
मैं नहीं चाहता कि मैं ब्याह लाऊँ किसी को मजबूरी में।
मैं नहीं चाहता कि मैं ब्याह लाऊँ किसी के अधूरे सपने।
मैं नहीं चाहता कि मैं ब्याह लाऊँ किसी की आज़ादी।
मैं नहीं चाहता कि मैं ब्याह लाऊँ किसी को केवल समान जाति होने के कारण।
मैं नहीं चाहता कि मैं ब्याह लाऊँ किसी को प्रेम के बिना।
मैं नहीं चाहता कि मैं ब्याह लाऊँ किसी को रीति-रिवाज़ों की बेड़ियों में बाँधकर ।
मैं नहीं चाहता कि मैं ब्याह लाऊँ किसी को मात्र पति-सुख भोगने की अभिलाषा में।
मैं चाहता हूँ कि मुझे किसी को ब्याह लाने की इच्छा ही न हो...
"उसके सिवा..." 🤍
(main_nadaan_hoon)
आजादी के बाद के देश के इतिहास में OBC वर्ग को इतना बड़ा राजनीतिक प्रतिनिधित्व कभी नहीं मिला जितना आज मिला है ---- राष्ट्र के सर्वोच्च पदों से लेकर स्थानीय निकाय और पंचायतों तक --- सत्ता में सबसे बड़ी भागीदारी --- फिर भेदभाव कहाँ ---- असमानता कहाँ ???
सिर्फ़ पानी व पसीने में बड़ा अंतर है
एक पत्थर व नगीने में बड़ा अंतर है
मुर्दा घड़ियों की तरह वक्त बिताने वालों
साँस लेने में व जीने में बड़ा अंतर है...
~डॉ. उदयभानु हंस