ऐ "अल्लाह" हमें बचा ऐसी नींद से जिससे "फ़जर" की नमाज़ क़ज़ा हो,
ऐसी मसरूफ़ियत से जिससे "ज़ुहर" की नमाज़ क़ज़ा हो,
ऐसी सुस्ती से जिससे "असर" की नमाज़ क़ज़ा हो,
ऐसी महफ़िल से जिससे "मग़रिब" की नमाज़ क़ज़ा हो,
ऐसी थकावट से जिससे "इशा" की नमाज़ क़ज़ा हो।
माह-ए-रमज़ान का मक़्सद इंसान को तक़्वा और परहेज़-गारी की राह पर ले जाना है,
ता-कि वो अपनी नफ़्स पर क़ाबू पा सके और "अल्लाह" की फ़रमाँ-बरदारी में अपनी ज़िंदगी गुज़ारे।