देशगान / सर्वेश्वरदयाल सक्सेना (पूरी कविता...)
क्या ग़ज़ब का देश है यह, क्या ग़ज़ब का देश है!
बिन अदालत औ' मुवक्किल के मुक़दमा पेश है।
आँख में दरिया है सबके
दिल में है सबके पहाड़
आदमी भूगोल है, जी चाहा नक़्शा पेश है।
क्या ग़ज़ब का देश है यह, क्या ग़ज़ब का देश है!
हैं सभी माहिर उगाने
में हथेली पर फ़सल
औ हथेली डोलती दर-दर बनी दरवेश है।
क्या ग़ज़ब का देश है यह, क्या ग़ज़ब का देश है!
पेड़ हो या आदमी
कोई फ़र्क़ पड़ता नहीं
लाख काटे जाइए, जंगल हमेशा शेष है।
क्या ग़ज़ब का देश है यह, क्या ग़ज़ब का देश है!
प्रश्न जितने बढ़ रहे
घट रहे उतने जवाब
होश में भी एक पूरा देश यह बेहोश है।
क्या ग़ज़ब का देश है यह, क्या ग़ज़ब का देश है!
खूँटियों पर ही टँगा
रह जाएगा क्या आदमी?
सोचता, उसका नहीं यह खूँटियों का दोष है।
क्या ग़ज़ब का देश है यह, क्या ग़ज़ब का देश है!
#sonamwangchuk #hungerstrike #cockroachjantaparty
उस के दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा
वो भी मेरी ही तरह शहर में तन्हा होगा
इतना सच बोल कि होंटों का तबस्सुम न बुझे
रौशनी ख़त्म न कर आगे अँधेरा होगा
निदा फाजली
@nitin_gadkari Or ye arajak nahi hai ,jab apke ghar pe apke car me apke ghar me kaam karne wali aurat ki beti uski choti si bachi ki sandigdh halat me laash mili thi , jiska khulasa nahi hogaya , ush lachar mahila ko uski mari hui bachi ko nyay nahi mil paya .