DSRC वै०-आकाश गंगा के केन्द्र में धनु राशि उपस्थिति है।इसे विष्णुलोक कहा गया है।भारतीय सृष्टि वैज्ञानिकों द्वारा विष्णु को जैव सृष्टि में पोषण का देवता कहा गया है।धनु राशि ही जैवसृष्टि के लिए पोषकऊर्जा का परम स्रोत है।उसी विष्णुलोक से सम्पूर्ण जैवसृष्टि के लिए पोषक ऊर्जा आती है
DSRCवै०-जो दवा किसी रोग का प्रतिषेध नहीं करसकती,वह उस रोग का निराकरण भी नहीं कर सकती।प्रतिषेध और रोग-चिकित्सा एक ही सड़क के दो पड़ाव कहे जासकते हैं।जीवित शरीर की प्रतिरक्षा पर जिन पदार्थों का प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है,उनसे न तो प्रतिषेध की योग्यता प्राप्त होगी,न रोग-चिकित्सा की।
DSRC वै०- जो भोज्य रासायनिक या अन्य कारणों से स्वयं विचलित हो चुके हैं, वे भोज्यों की सूची में शामिल होने की योग्यता रखते हुए भी चयोपचय का विचलन बढ़ाने का कार्य करते हैं।
DSRC वै०- विष और ड्रग पदार्थ स्वभाव से ही चयोपचय का विचलन बढ़ाते हैं, अत: वे रोगों के स्थापना की बुनियाद तो रख सकते हैं, उनका निराकरण नहीं कर सकते।यह बात कैन्सर पर भी लागू होती है।
DSRCवै०-जिस व्यक्ति को वैज्ञानिकजाँच ने कभी कहा था कि वह मात्र कुछदिन या कुछ महीने जिन्दा रह सकेगा,आज वह यदि दो-चार या आठ वर्षों से स्वस्थ जीवन-धारा में उत्साहपूर्ण दिन बिता रहा है,तो इसे ‘असत्य’कहकर कब तक टाला जा सकेगा ?”क्या यह कैन्सर पर विजय और उसकी सफल चिकित्सा का सबूत नहीं ?
DSRC के वैज्ञानिकों ने १९८५ में ही निष्कर्ष निकाला कि अन्य दूध और दूध से तैयार होने वाली वस्तुओं (दूध,छाछ,घी,मक्खन, छेना)का सम्पर्क कैन्सर-कोशिकाओं को मजबूत और अधिक आक्रामक बना देता है।इसके अतिरिक्त हड्डियों के कैन्सर को दूध और दूध से बनी वस्तुओं का सेवन भी तेजी से उग्र बनाता है।
डी.एस.रिसर्च सेण्टर के वैज्ञानिकों ने 1985 में यह वैज्ञानिक निष्कर्ष निकाला कि माँ (नारी) का दूध कैन्सर कोशिकाओं का विध्वंसक है।कैन्सर कोशिकाओं के सम्पर्क में आने पर माँ का दूध उन्हें मारकर नष्ट कर देता और कमजोर बना देता है।
DSRC के वैज्ञानिकों ने बहुत पहले कहा था कि कैन्सर वस्तुत: एक ही व्याधि है,प्रकारों का भ्रमजाल टूट जाना चाहिए।यह भ्रम चिकित्सा-प्रयासों को भी खण्डों में बाँट दे रहा है।आज एक ही माध्यम से प्राय: हर प्रकार के कैन्सर की सफल चिकित्सा ने भ्रम और भ्रान्ति की वह बुनियाद तोड़ दी है।
DSRCवै०-घोर विचलन और प्रतिरोध-क्षमता के अन्धेपन की स्थिति अन्य-अन्य को रोगों जन्म, आवास और संरक्षण देने लगती है।अतः लड़ाई केवल कैन्सर के विरुद्ध ही सीमित नहीं रह जाती, बल्कि इन उपद्रवों पर काबू पाना एक दुष्कर कार्य हो जाता है।कैन्सर रोगी इन बाह्य उपद्रवों के खतरे में घिर जाता है
DSRCवै०-कैन्सर की उग्रावस्था में कैन्सर कोशिकाओं का आक्रमण भी तीव्र होता है और सामान्य शरीर का विघटन भी बड़ी तेज़ी से होता है ।इन स्थितियों में ढहती हुई सामान्यता अपने विचलन को झाड़-पोंछकर खड़ा होने का मौका भी नहीं पाती है ।
देखा हुआ यथार्थ है कि रासायनिक विषों के बल पर सुरक्षित रखे गये बीजों से उगाई गई फसल पर कीटाणु और रोगाणु टूट पड़ते हैं।बीजों और उससे उगे पौधों का विचलन उनकी कमजोरी बन उनके जीवन का शत्रु बन गया है।प्रश्न है कि उनसे प्राप्त की गई ऊर्जा,मानव स्वास्थ्य की रक्षा किस प्रकार कर पायेगी?
DSRCवै०-कैन्सर अथवा अन्य असाध्य रोग की जाँच भी आधुनिक जाँच विज्ञान के दायरे से बाहर है और अरबों वर्षों बाद भी रहेगी, क्योंकि वर्तमान जाँच-विधियाँ पदार्थगत जड़ मन-बुद्धि (Material)द्वारा विकसित है, जबकि जिन्दगी सचेतन है और असाध्य रोग भी अपदार्थगत (Immaterial)हैं।
DSRCवै०किसी भी कारण से जीवनधारा मौत के खतरे में घिर जाय और वैज्ञानिक उपायों से उन खतरों को नष्टकरके जिन्दगी को मुकर दियाजाय कि वह निर्धारित आयुपर्यन्त प्रवाहित हो,प्राचीन भारतीयऋषियों ने इस क्रियाविज्ञान को आयुर्वेद कहा था।DSRCके संस्थापक वैज्ञानिकों ने इसे प्राचीनआयुर्वेद कहा है
जीवनी शक्ति चेतना है, अत: वह दिखाई नहीं दे सकते।न हमारे नेत्रों द्वारा कभी उसे देखा जाना संभव है न यंत्रों द्वारा।हमारे नेत्र, मन और बुद्धि तो केवल पदार्थ की सूक्ष्मताओं-स्थूलताओं, वहाँ उपस्थित गणित और चेतना के कारण पदार्थाणुओं में उठते स्पन्दन और तरंगों को ही नोट कर सकते हैं ।