🚨BREAKING : BJP Fraud EXPOSE 🔥🔥
🪷Private banks — minimum balance:
HDFC 2,500 | ICICI 5,000 | Axis 2,500 | Kotak 10,000
✋Public banks — PNB, SBI, Canara, BoB, BoI, Indian Bank:
Minimum balance = ZERO
But watch the game under Modi sarkar:
Pensions → sarkari banks
Election duty → sarkari bank staff
Jan Dhan accounts → sarkari banks
Adani–Ambani loans → sarkari banks
Staff cuts → sarkari banks
Hardest customers → sarkari banks
Private banks make their own rules…
RBI gets near-zero from their “game”…
and the ENTIRE load is dumped on public banks.
Charge the poor ₹500 for balance.
Hand billionaires credit from PSU balance sheets.
Not banking reform.
Privatise the profit. Socialise the burden 🗿🔥
जनता से अपील
Covid काल में हम आपके साथ खड़े रहेकई साथियों को भी खोया 28–30 Sept की strike आपकी परेशानी के लिए नहीं बल्कि Govt द्वारा पहले से सहमति दी गई माँग को लागू कराने के लिए है
जिन बैंकर्स ने हर मुश्किल में आपका साथ दिया आज उसके साथ खड़े होने की बारी आपकी है🙏
#5DayBanking
5 day banking wil nt cause any inconvenience to the general public. Saturday already has the lowest footfall in banks.
And we are not asking for it for free-the daily working hours are being increased to compensate.
The only reason @nsitharaman ’s ego, nothing else.
#5DaysBanking
#BlackSunday#5DayBankingNow
We are observing 27/09 as a #BlackSunday
All Bankers who are compelled to working on Sunday, 27.09.2026 will show their protest wearing Black Clothes on Sunday.
@JagranNews क्यों और विभागों को आराम,
बैंक करें क्यों 6 दिन काम
सरकार तक पंहुचा दो पैगाम
बैंक करे क्यों 6 दिन काम
लंचटाइम में भी नहीं आराम,
बैंक करे क्यों 6 दिन काम
हम नहीं उद्योपतियों के गुलाम,
बैंक करे क्यों 6 दिन काम.
सरकार के कामों का ये कैसा ईनाम,
बैंक करे क्यों 6 दिन काम.
@JagranNews बिलकुल जायज मांग है जब पूरा वित्त मंत्रालय RBI NABARD LIC GICs सब में 5 days है जो बैंक में क्यों नहीं और यह मान ली गई मांग है 1000 से ज्यादा दिनों से अप्रूवल लटका कर रखा है सरकार ने
@JagranNews बैंक कर्मचारी सही बोल रहे है, saturday तो छोड़िए, sunday भी आ जाएंगे वे, पर फिर आप सब RBI, NABARD, LIC, EPFO, कोर्ट, सारे केंद्र सरकार के मंत्रालय , सारे राज्य सरकार के विभाग, etc, आप सब भी आइए ना saturday, आप सब को घर बैठना है, और आप चाहते हैं बैंक वाले आए तो ये ग़लत है सरासर 🙏
@JagranNews बैंकरों को अपनी सैलरी कटवाने का कोई शौक़ नहीं है
सरकार के ढीलढाल रवैये के कारण जब और कोई रास्ता नहीं बचा तो मजबूरी में स्ट्राइक करनी पड़ रही है
#5DaysBanking
@JagranNews बिल्कुल सही है
जब Banks की Regulatory authorities यानी RBI, NABARD और यहाँ तक कि finance ministry सप्ताह में पांच दिन काम करती हैं तो बैंक क्यों नहीं
बैंककर्मियों की हड़ताल पहले , एक दिन की हुई , अब तीन दिन की हो रही है और उसके बाद अनिश्चितकालीन हड़ताल की ओर बढ़ेंगे अगर #5DaysBanking को लागू नहीं किया गया ।
बैंककर्मी हड़ताल अपने शौक के लिए , या ग्राहकों की असुविधा के लिए नहीं कर रहे है , हमलोग अपनी सैलरी कटा कर मजबूरन #स्ट्राइक कर रहे है
@JagranNews अपनी तीन दिन की सैलरी deduction करवाने के बाद कोई हड़ताल पर जाता है तो समझ लो कि पैसों से ज्यादा family लाइफ और #WorkLifeBalance में कितना संघर्ष चल रहा है
ये strike हमारे साथियों को बढते suicide cases, Heart attack, stroke hypertension BP शुगर और मानसिक आघात से बचाने के लिए है
It’s easy to judge until you step into a branch. Bankers routinely work 10–12 hour days, handle immense stress, strict compliance, financial liability, and zero work-life balance without overtime pay. Asking for a 5-day workweek like almost every other corporate sector, IT firm, RBI, and international bank isn't "laziness"—it's a basic standard for mental health and efficiency.
Public convenience matters, but so does the well-being of the people safeguarding your money.
मैं बैंक कर्मचारियों के हफ्ते में 5 डे वर्किंग का पुरजोर समर्थन करता हूं। बल्कि बैंकिंग ही नहीं, भारत की सभी सरकारी और प्राइवेट कंपनियों में 5 डे वर्किंग ही होना चाहिए। इस मामले में सख़्त कानून भी बने तो मैं उसका स्वागत करूंगा।
लेकिन हमारे देश में आज भी नारायण मूर्ति अंकल जैसे लोग हैं, जो हफ्ते में 70-70 घंटे काम करवाने के हिमायती हैं, मगर तिजोरी से सही अनुपात में सैलरी नहीं निकलती। ऐसी परिस्थितियों में इंसान काम तो करता है, लेकिन वो एफिशिएंट नहीं होगा और काम के प्रति समर्पण (dedication) भी नहीं होगा। वो सिर्फ़ 9 से 6 की ड्यूटी करेगा, ओनरशिप नहीं लेगा। ऑफिस के माहौल में ये चीज़ें सबसे ज़रूरी हैं और यहीं से सबसे ज्यादा conflict पैदा होता है।
दुनिया के सारे विकसित देश वर्क-लाइफ बैलेंस को महत्व देते हैं, जिससे मेंटल हेल्थ अच्छा रहता है और आदमी ज्यादा प्रोडक्टिव बनता है। लेकिन हमारे यहां कम पैसे में ज्यादा काम और देर तक काम करवाने की आदत है। टाइम से आना तो आपका संवैधानिक कर्तव्य जैसा है, मगर टाइम से जाना अपराध है।
टाइम पर सैलरी नहीं देना, रोक कर रखना, ब्लैकमेल करना और इसके अलावा भारतीय कंपनियों की एक और खासियत है। वो ज्यादातर 1-30 तारीख की सैलरी महीने के आखिर में या अगले महीने की एक तारीख पर देने की बजाय 7-8 तक या कहीं-कहीं उससे भी लेट देते हैं। ये इसलिए कि स्टाफ छोड़कर जाए तो उसकी सैलरी होल्ड करके उसे ब्लैकमेल किया जाए।
देश में लेबर लॉ भी एक मज़ाक है। कंपनियां सरकार के माध्यम से अपने हिसाब से, खुद के फायदे के लिए नीतियां बनवाती हैं। मालिक की मर्ज़ी होगी, "कल से मत आओ", तो "मत आओ"।
ये तो हो गई ऑफिस की बात और आम लोगों की आर्थिक सुरक्षा की बात।
इसके अलावा आम आदमी की जिंदगी आसान कैसे बने और उसे कौन से फैक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित करते हैं, ये बहुत बेसिक चीज़ है, लेकिन इस पर कोई बात ही नहीं होती।
इनमें सबसे महत्वपूर्ण हैं - शिक्षा, स्वास्थ्य और सोशल सिक्योरिटी।
मिडल क्लास का एक आदमी पूरी जिंदगी इन्हीं में उलझा रहता है। बच्चे के जन्म से लेकर उसे पढ़ाने-लिखाने तक का खर्चा क्या है, वो आप सब जानते हैं, जो बढ़ता ही जा रहा है - क्या गांव और क्या शहर?
स्वास्थ्य का भी वही हाल है। मेडिकल चीज़ों और इलाज़ पर बेइंतहा खर्चा है। सरल शब्दों में, ₹1.5 करोड़ में डॉक्टर बनेंगे तो पैसा तो मरीजों से ही वसूला जाएगा। कोई गंभीर बीमारी हो गई तो आप बर्बाद हैं।
शिक्षा और स्वास्थ्य सरकार अपने नियंत्रण में उत्कृष्ट तरीके से चलाए तो देश की आधी से ज्यादा समस्या ख़त्म हो जाएगी।
लेकिन सरकार क्या कर रही है? स्कूल-कॉलेज बंद हो रहे हैं। जो हैं, उनकी गुणवत्ता भी ख़त्म की जा रही है। इनकी कीमत पर एक पूरी महंगी प्राइवेट लॉबी पनपने दी जा रही है। मध्यम वर्ग बेहाल है।
हॉस्पिटल के नाम पर AIIMS इत्यादि बना तो दिए गए हैं, मगर आपको जरूरत पड़ने पर गोरखपुर, पटना आदि जगहों पर स्पेशलिस्ट डॉक्टर ही नहीं मिलेंगे, क्योंकि उनकी पोस्टिंग ही नहीं हुई है। मजबूरन सामान्य लोगों को प्राइवेट का ही मुंह देखना पड़ता है।
मेडिकल इंश्योरेंस लो तो क्लेम देने में आनाकानी होती है। आयुष्मान कार्ड का कॉन्सेप्ट बढ़िया है, पर ये सबके लिए नहीं है। जिनके लिए है, उनका कैसा चल रहा है, इसका मुझे ज्यादा अनुभव नहीं है।
तो कुल मिलाकर बात ये है कि उपरोक्त चीज़ें बेसिक वाली हैं, जो हम-आप सबके आम जीवन से जुड़ी हुई हैं। इनको एड्रेस किए बगैर लोगों की जिंदगी आसान कभी नहीं हो सकती।
आम आदमी को सिर्फ़ नौकरी और सैलरी नहीं चाहिए। उसे ऐसी व्यवस्था चाहिए, जिसमें काम करने के बाद जिंदगी जीने का भी समय हो, बच्चों की अच्छी शिक्षा हो, इलाज़ के लिए घर-जमीन न बेचनी पड़े और भविष्य को लेकर थोड़ी सामाजिक सुरक्षा हो।
यही असली सवाल हैं, जिन पर बात होनी चाहिए।
एक तस्वीर में सब कुछ है जिससे एक बैंक कर्मी गुजरता है।
1) ग्राहकों की शिकायतें
2)लक्ष्य का दबाव
3)ऑडिट और इंस्पेक्शन
4)अनुपालन
5)VIP ग्राहक
6) महत्वपूर्ण email ✉️
7)पेंशन और अन्य सरकारी योजनाएं
8)सेल्स कैंपेन
9)बीमा बेचना
10)10- 12 घंटे की नौकरी
11) अनगिनत मीटिंग
12)सिस्टम का प्रॉब्लम
13).......... लिस्ट लंबी है
बस छोटी सी डिमांड है 5 दिन की बैंकिंग की।