एक समंदर है जो काबू में है मेरे, मैं और एक कतरा है, जो मुझसे संभiलi नहीं जाता.
एक उमरा है जो बितानी है उसके बगैर
और एक लम्हा है जो मुझसे गुज़iरा नहीं जाता
तू लाख बेवफा है मगर, सर उठाकर चल,
दिल रो पड़ेगा तुझे पशेमान देखकर..!!
सोचा नहीं था कभी तेरे जैसा शख्स,
मुंह फेर लेगा मुझे परेशान देखकर..!!
- हिमांशी बाबरा
सबको मिल जाएगी मंज़िल यह ज़रूरी तो नहीं,
ज़िंदगी राह-ए-सफ़र है…
यू ही चलते रहना…
तुम चिराग़ों की तरह राह में जलते रहना,
हर अंधेरे को उजालों में बदलते रहना।
इक पल में इक सदी का मज़ा हम से पूछिए
दो दिन की ज़िंदगी का मज़ा हम से पूछिए
भूले हैं रफ़्ता रफ़्ता उन्हें मुद्दतों में हम
क़िस्तों में ख़ुद-कुशी का मज़ा हम से पूछिए
आग़ाज़-ए-आशिक़ी का मज़ा आप जानिए
अंजाम-ए-आशिक़ी का मज़ा हम से पूछिए