"जय श्रीराम"
"न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः"।
"सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः"।।
(पृथ्वीमें या आकाशमें अथवा देवताओंमें तथा इनके सिवा और कहीं भी ऐसा कोई भी सत्त्व नहीं है, जो प्रकृतिसे उत्पन्न इन तीनों गुणोंसे रहित हो।)
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"जय श्रीराम"
"यया स्वप्रं भयं शोकं विषादं मदमेव च"।
"न विमुँचन्ति दुर्मेधा धृतिः सा पार्थ तामसी"।।
(हे पार्थ ! दुष्ट बुद्भिवाला मनुष्य जिस धारणशक्तिके द्वारा निद्रा, भय, चिन्ता और दुःखको तथा उन्मत्तताको भी नहीं छोडता अर्थात् धारण किये रहता है- वह धारणशक्ति तामसी है।)
"जय श्रीराम"
"अधर्मं धर्ममिति या मन्यते तमसावृता"।
"सर्वार्थान्विपरीतांश्च बुद्भिः सा पार्थ तामसी"।।
(हे अर्जुन ! जो तमोगुणसे घिरी हुई बुद्भि अधर्मको भी 'यह धर्म है' ऐसा मान लेती है तथा इसी प्रकार अन्य सम्पूर्ण पदार्थोंको भी विपरीत मान लेती है, वह बुद्भि तामसी है।)
"जय श्रीराम"
"बुद्भेर्भेदं धृतश्चैव गुणतस्त्रिविधं श्रृणु"।
"प्रोच्यमानमशेषेण पृथक्त्वेन धनंन्जय"।।
(हे धनंन्जय ! अब तू बुद्भिका और धृतिका भी गुणोंके अनुसार तीन प्रकारका भेद मेरे द्वारा सम्पूर्णतासे विभागपूर्वक कहा जानेवाला सुन।)
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"जय श्रीराम"
"अयुक्तः प्राकृतः स्तब्धः शठो नैष्कृतिकोअलसः"।
"विषादी दीर्घसूत्री च कर्ता तामस उच्यते"।।
(जो कर्ता अयुक्त, शिक्षासे रहित, घमंडी, धूर्त और दूसरोंकी जीविकाका नाश करनेवाला तथा शोक करनेवाला, आलसी और दीर्घसूत्री है- वह तामस कहा जाता है।)
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"जय श्रीराम"
"नियतं सङ्गरहितमरागद्वेषतः कृतम्"।
"अफलप्रेप्सुना कर्म यत्तत्सात्त्विकमुच्यते"।।
(जो कर्म शास्त्रविधिसे नियत किया हुआ और कर्तापनके अभिमानसे रहित हो तथा फल न चाहनेवाले पुरुषद्वारा बिना राग- द्वेषके किया गया हो- वह सात्त्विक कहा जाता है।)
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"जय श्रीराम"
"यत्तु कृत्स्नवदेकस्मिन्कार्ये सक्तमहैतुकम्"।
"अतत्वार्थवदल्पं च तत्तामसमुदाहृतम्"।।
(परन्तु जो ज्ञान एक कार्यरूप शरीरमें ही सम्पूर्णके सदृश आसक्त है तथा जो बिना युक्तिवाला, तात्त्विक अर्थसे रहित और तुच्छ है- वह तामस कहा गया है।)
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"जय श्रीराम"
"ज्ञानं कर्म च कर्ता च त्रिधैव गुणभेदतः"।
"प्रोच्यते गुणसङ्ख्याने यथावच्छृणु तान्यपि"।।
(गुणोंकी संख्या करनेवाले शास्त्रमें ज्ञान और कर्म तथा कर्ता गुणोंके भेदसे तीन-तीन प्रकारके ही कहे गये हैं, उनको भी तू मुझसे भलीभाँति सुन।)
🙏🙏सुप्रभातम🙏🙏
"जय श्रीराम"
"ज्ञानं ज्ञेयं परिज्ञाता त्रिविधा कर्मचोदना"।
"करणं कर्म कर्तेति त्रिविधः कर्मसङ्ग्रहः"।।
(ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय- ये तीन प्रकारकी कर्म- प्रेरणा हैं और कर्ता, करण तथा क्रिया ये तीन प्रकारका कर्म-संग्रह है।)
🙏🙏सुप्रभातम🙏🙏
आपका दिन शुभ व मंगलमय हो।
"जय श्रीराम"
"शरीरवाङ्-मनोभिर्यत्कर्म प्रारभते नरः"।
"न्याय्यं वा विपरीतं वा पंचैते तस्य हेतवः"।।
(मनुष्य मन, वाणी और शरीरसे शास्त्रानुकूल अथवा विपरीत जो कुछ भी कर्म करता है- उसके ये पाँचों कारण हैं।)
🙏🙏सुप्रभातम🙏🙏
आपका दिन शुभ व मंगलमय हो।
"जय श्रीराम"
"अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथग्विधम्"।
"विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पंचमम्"।।
(इस विषयमें अर्थात् कर्मोंकी सिद्भिमें अधिष्ठान और कर्ता तथा भिन्न-भिन्न प्रकारके करण एवं नाना प्रकारकी अलग-अलग चेष्टाएँ और वैसे ही पाँचवाँ हेतु दैव है।)
🙏🙏सुप्रभातम🙏🙏
"जय श्रीराम"
"न हि देहभृता शक्यं त्यक्तुं कर्माण्यशेषतः"।
"यस्तु कर्मफलत्यागी स त्यागीत्यभिधीयते"।।
(क्योंकि शरीरधारी किसी भी मनुष्यके द्वारा सम्पूर्णतासे सब कर्मोंका त्याग किया जाना शक्य नहीं है, इसलिये जो कर्मफलका त्यागी है, वही त्यागी है- यह कहा जाता है।)
सुप्रभातम
"जय श्रीराम"
"कार्यमित्येव यत्कर्म नियतं क्रियतेअर्जुन"।
"सङ्गं त्यक्त्वा फलं चैव स त्यागः सात्त्विको मतः"।।
(हे अर्जुन ! जो शास्त्रविहित कर्म करना कर्तव्य है- इसी भावसे आसक्ति और फलका त्याग करके किया जाता है- वही सात्त्विक त्याग माना गया है।)
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"जय श्रीराम"
"दुःखमित्येव यत्कर्म कायक्लेशभयात्त्यजेत्"।
"स कृत्वा राजसं त्यागं नैव त्यागफलं लभेत्"।।
(जो कुछ कर्म है, वह सब दुःखरूप ही है-ऐसा समझकर यदि कोई शारिरिक क्लेशकज भयसे कर्तव्य- कर्मोंका त्याग कर दे, तो वह ऐसा राजस त्याग करके त्यागके फलको किसी प्रकार भी नहीं पाता।)
"जय श्रीराम"
"एतान्यपि तु कर्माणि संङ्ग त्यक्त्वा फलानि च"।
"कर्तव्यानीति मे पार्थ निश्चितं मतमुत्तमम्"।।
(इसलिये हे पार्थ! इन यज्ञ,दान और तपरूप कर्मोंको तथा और भी सम्पूर्ण कर्तव्यकर्मोंको आसक्ति और फलोंका त्याग करके अवश्य करना चाहिये, यह मेरा निश्चय किया हुआ उत्तम मत है।)
"जय श्रीराम"
"निश्चयं श्रृणु मे तत्र त्यागे भरतसत्तम"।
"त्यागो हि पुरुषव्याघ्र त्रिविधः सम्प्रकीर्तितः"।।
(हे पुरुषश्रेष्ठ अर्जुन ! संन्यास और त्याग दोनोंमेंसे पहले त्यागके विषयमें तू मेरा निश्चय सुन। क्योंकि त्याग सात्त्विक, राजस और तामस भेदसे तीन प्रकारका कहा गया है।)
"जय श्रीराम"
"सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते"।
"प्रशस्ते कर्मणि तथा सच्छब्दः पार्थ युज्यते"।।
( 'सत्' - इस प्रकार यह परमात्माका नाम सत्यभावमें और श्रेष्ठभावमें प्रयोग किया जाता है तथा हे पार्थ ! उत्तम कर्ममें भी 'सत्' शब्दका प्रयोग किया जाता है।)
🙏🙏सुप्रभातम🙏🙏
"जय श्रीराम"
"ऊँ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः"।
"ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा"।।
(ऊँ, तत्, सत्- ऐसे यह तीन प्रकारका सच्चिदानन्दघन ब्रह्मका नाम कहा है, उसीसे सृष्टिके आदिकालमें ब्राह्मण और वेद तथा यज्ञादि रचे गये।)
🙏🙏सुप्रभातम🙏🙏
"जय श्रीराम"
"मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः"।
"परस्योत्सादनार्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्"।।
(जो तप मूढतापूर्वक हठसे, मन, वाणी और शरीरकी पीडाके सहित अथवा दूसरेका अनिष्ट करनेके लिये किया जाता है-वह तप तामस कहा गया है।)
🙏🙏सुप्रभातम🙏🙏
आपका दिन शुभ व मंगलमय हो।
"जय श्रीराम"
"सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत्"।
"क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्"।।
(जो तप सत्कार, मान और पूजाके लिये तथा अन्य किसी स्वार्थके लिये भी स्वभावसे या पाखण्डसे किया जाता है, वह अनिश्चित एवं क्षणिक फलवाला तप यहाँ राजस कहा गया है।)
🙏🙏सुप्रभातम🙏🙏