समण और वमण क्या है
जब इस जगह का नाम भारत नहीं था, महाभारत भी नहीं था। बुद्ध से पहले की बात है। बुद्ध की आभा में रत रहने के कारण इसका नाम आभारत पड़ा। फिर आ साइलेंट हो गया और केवल भारत कहने लगे। उस समय यहां के मूल निवासियों की समता, समानता के गुण के कारण एक पहचान बनी। जब भारत में बाहर के लोग आने लगे। अरब से समुद्र के रास���ते, सीरिया से समुद्र के रास्ते, ईरान से पहाड़ो के रास्ते, रेत राजस्थान के रास्ते, मध्य एशिया से पहाड़ो के रास्ते, यूरेशिया यूरोप से पहाड़ों के रास्ते, मंगोल से पहाड़ो के रास्ते, यूरोप से समुद्र के रास्ते, तब यहां के समण मूलनिवासियों ने असमता, असामनता का व्यवहार करने वाले एवं विपरीत उलट विराधी विचारधारा, उल्टी संखति/ संस्कृति, उल्टी भासा, उल्टी रहन-सहन, उल्टी सोच के कारण, उन्हें हम समणों ने एक नाम दिया वम वमण। हम समण और हमारी विपरीत विरोधी संखति/ कल्चर के वमण।
वमण से संखारित/संस्कारित कर आधा ’र’ जोड़कर वर्मण, बर्मण, वाहयमण, बाहिरमण, बहिमण, ब्रहिमण, ब्रहाण, वमण, बमण, बामण, वामण, वम्मण, बम्मण, भाम्मण, भम्मण, भ्रम्मण, ब्रम्मण, ब्रहमण, ब्रम्हन, ब्रम्हान, ब्रम्हा, ब्रम्ह, ब्रम्हण, भ्रम, समय जगह और अभ्यास के चलते बहुत से परिवर्तन इस सद्द के हुए।
पर समण सद्द का केवल एक परिवर्तन किया गया और वो भी वमण ने समण से संखारित/संस्कारित कर अरबी का ’श’ और आधा ’र’ जोड़कर नया सद्द बनाया श = र = श्र ��र स की जगह श्र का इस्तेमाल किया गया
श् = र = श्र
समण = श्रमण
समन = श्रमन
और समणों के सारे गुण इस सद्द के साथ खत्म करके उन्हें श्रमण से से मजदूर बना दिया। लेबर, कर्मचारी, गरीब, मजबूर, मांगने वाला भिखारी। जैन लोग भी पहले समण थे। अभी तो वे वमणों के अधीन हो, उनकी संखति अपनाते है। जैनो ने समण सुत्त है तो क्या जैन लोग समण से श्रमण बन मजदूर है। जैन 80 लाख है भारत में। और एक भी समण से श्रमण नहीं बना, वे सारे के सारे आज भी अच्छी स्थिति में है।
इसका अर्थ हुआ कि श्रमण जैन, श्रम करने वाला श्रमिक नहीं है और श्रमण बौद्ध, श्रम करने वाला श्रमिक है, इससे यह ज्ञात होता है कि श्रमण दो प्रकार का अर्थ रखता है। जैसी जिसकी सुविधा हो वह उसका अर्थ वैसा इस्तेमाल कर सकता है। श्रमण सद्द भ्रामक अर्थ रखता है क्योंकि यह पालि का सद्द नहीं है।
समण भारत के मूलनिवासी है। समण भारत के आज के बहुजन है। यदि आप थोड़ा भी सोचोगे तो पाओ��े कि भारत में 13 प्रकार के लोग घुसपैठ कर भारत में घुस���, ये सब सीरियन, अरबी, मंगोलियन, यूरेशियन, यूरोपियन, हूण, शक, तुर्क, यवन, बर्मी, ईरानी, यूनानी, यहूदी, मध्य एशिया रहें है। आज भी इनको हम इसी नाम से पुकारते है। पर साथ भी वमण भी लगाते है। वमण ईरानी, वमण बर्मी, वमण सीरियाई, वमण हूण, वमण शक, वमण अरबी, वमण मंगोलियायी आदि।
वमण से ब्राम्हाण करके आज ये अपने आप को सीरियन ब्राम्हाण, मंगोलियन ब्राम्हाण, आदि के नाम से पुकारते है। समण लोगों ने उनको वमण की पहचान दी और उसी पहचान के कारण यह आपस में इकट्ठा हुए। जैसे इग्लैंड में जितने भी एशिया के देशों के लोग रहते है, वे तुरंत इकट्ठा हो जाते है। एशिया के नाम से। भारत में भारतीय, पाकिस्तानी, चीनी, अफगानिस्तानी, बंग्लादेशी, नेपाली, के लोगो का झगड़ा है। मगर इग्लैण्ड में यह सब एशिया के नाम पर साथ साथ रहते है। यह प्राकृतिक नियम है। किसी प्राकृतिक नियम के कारण सारे वमण इकट्ठे हुए। आपस में एक दूसरे की मदद करने लगे। वमण ���ंघ बनाया, हमारा समण संघ देखकर। वमणों ने संघ बनाया और मजबूत होते गए, सारा व्यापार करने लगे। चाल��ं चलने लगे। ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह पहले घुसपैठ की, फिर व्यापार किया, फिर शासन में दखल देने लगे, फिर शासक बन गये। यही सारी दुनिया में होता है। यही प्राकृतिक नियम भी है। जो ताकत बढ़ाता जाएगा, उसकी काली शक्तियां भी बढ़ती जाएंगी, यदि वह बुद्ध की तरह समता शांति का अभ्यास नहीं करता है तो।
अल्पसंख्यक ज्यादा दिनांे तक बहुसंख्यक का शोषण नहीं कर पाता है। जैसे फ्रांस में हुआ। जैसे जर्मन में जर्मनी के लोगो ने अल्पसंख्यक यहूदियों को लाखो की संख्या में मारा, वैसे ही अल्पसंख्यको का अंत होता है। यह भी प्राकृतिक नियम है। आप भारत में भी इसे देख सकते है। जैसे मुगल आरबी लोगों का शासन खत्म हुआ, अंग्रेजों ने किया। फिर अंग्रेजो का शासन खत्म हुआ.....................। ऐसे ही अल्पसंख्यक, अल्प समय तक ही शासन कर पाते है। यही प्राकृतिक नियम है।
प्राकृतिक नियम- समण भारत के मूल निवासी है। समण संघ भारत के मूलनिवासियों का प���राचीनतम दुनिया का प्रथम संघ है, जो प्राकृति ने बनाया है और प्राकृतिक नियमों पर चलता है, जो अजर है जो अमर है, जो सुखद फलदायी है।
*जय सिरी समण - समण सिरी चौधरी महाराज सिंह भारती जी का इतिहास*
ये वो समण फकीर थे जिन्होंने कहा था - *"मुझे मरने के बाद स्वर्गीय मत कहना, मेरी आत्मा की शांति के लिए मौन मत र��ना"*
*1. जन्म:*
- *1 नवंबर 1918*, गाँव *अरनावली, मेरठ, यूपी*। जाट किसान परिवार।
- स्वतंत्रता संग्राम सेनानी। जवानी में ही अंग्रेजों के खिलाफ लड़े।
*2. राजनीति:*
- 1950 में कांग्रेस छोड़ी - कहा कांग्रेस पूंजीपतियों की पार्टी है।
- 1952 में *डॉ. राममनोहर लोहिया* की सोशलिस्ट पार्टी में शामिल।
- 1957 में एमएलसी बने, *1967 में बैलगाड़ी और खटारा जीप से चुनाव प्रचार करके सांसद बने* - मेरठ से। जबकि विरोधी बड़ी गाड़ियों में थे। जनता ने फकीर को जिताया।
- 60 देशों की यात्रा अपने निजी पैसे 38,000 रुपये खर्च करके की, किसानों की हालत देखने।
*3. अर्जक संघ - समण क्रांति:*
- *महामना रामस्वरूप वर्मा* जी के साथ मिलकर *1 जून 1968 को अर्जक संघ* बनाया। ये जोड़ी मार्क्स-एंगेल्स जैसी थी।
- अर्जक मतलब - अर्जक = अर्ज कर��े वाला, कमेरा, किसान-मजदूर। सारा धन कमाने वाला समण समाज ही है।
- साथ में *शोषित समाज दल* भी बनाया। दिन-रात इसी के प्रचार में लगे रहे।
*4. लेखक - वैज्ञानिक सोच:*
भारती जी ने ऐसी किताबें लिखीं जो डार्विन को टक्कर देती हैं:
- *सृष्टि और प्रलय* - डार्विन की 'Origin of Species' जैसी, सरल हिंदी में बताती है दुनिया ईश्वर ने नहीं बनाई, कुदरती नियमों से बनी है।
- *ईश्वर की खोज*
- *महान भारत के बौने नेता*
- *समाजवाद दर्शन और आचरण*
- *आतंकवाद कारण और निवारण*
*5. वसीयत - समण विचार की मिसाल:*
अपनी वसीयत में लिखा:
> "मेरे मरने के बाद जब संसद सदस्य मेरी शोक सभा करें तो मुझे *स्वर्गीय विशेषण से सम्बोधित न करें और न 'आत्मा की शान्ति' के लिए दो मिनट का मौन रखें।* यदि वे ऐसा करते हैं तो मेरे सिद्धांतो की हत्या करेंगे क्योंकि मेरा ईश्वर एवं आत्मा, पुनर्जन्म में कभी विश्वास नहीं रहा। मेरा मान���ा है कि स्वर्ग और नर्क की कल्पना पाखंडियों ने अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए की है।"
*6. परिनिर्वाण:*
- *14 सितंबर 1995* को यशकायी हुए। अर्जक संघ उनकी जयंती को *"विज्ञान दिवस"* के रूप में मनाता है।
> चौधरी साहब समण समाज के पहले वैज्ञानिक सांसद थे - किसान, मजदूर, तर्कवादी, नास्तिक, समाजवादी।
*कोटि-कोटि नमन 🙏*
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*जय सिरी समण - समण सिरी पेरियार ई.वी. रामासामी नायकर जी का संपूर्ण इतिहास*
समण भारत के सबसे बड़े तर्कवादी, नास्तिक और आत्म-सम्मान क्रांति के जनक। बाबा साहब ने कहा था - _"पेरियार दक्षिण भारत के बुद्ध हैं।"_
*1. जन्म और बचपन:*
- *17 सितंबर 1879*, इरोड, तमिलनाडु। धनाढ्य बलिजा नायडू व्यापारी परिवार। असली नाम इरोड वेंकट रामासामी।
- बचपन से ही पाखंड के विरोधी। 10 साल की उम्र मे��� ब्राह्मण पुरोहित से पूछा - "तुम मंत्र बोलते हो, उसका मतलब क्या है?" जवाब नहीं मिला, तभी से विद्रोह शुरू।
- संस्कृत शास्त्रों का अध्ययन किया, पर पाखंड देखकर छोड़ दिया।
*2. जीवन बदलने वाली काशी यात्रा 1904:*
- काशी गए, वहाँ ब्राह्मणों ने खाने में भेदभाव किया। भिखारी समझकर धक्का दिया, जबकि शाकाहारी धर्मशाला में ब्राह्मणों को ही खाना मिलता था।
- उसी ��िन फैसला - ब्राह्मणवाद को जड़ से खत्म करना है।
*3. राजनीति और छोड़ना:*
- 1919 में कांग्रेस में शामिल, गांधी जी के असहयोग आंदोलन में भाग लिया। वायकॉम सत्याग्रह (1924) में अछूतों को मंदिर के रास्ते पर चलने का अधिकार दिलाया, इसीलिए उन्हें *"वायकॉम वीर"* कहा गया।
- पर कांग्रेस में भी ब्राह्मणवाद देखा - तमिलनाडु में गुरुकुल में ब्राह्मण बच्चों और गैर-ब्राह्मण बच्चों के लिए अलग खाना। पेरियार ने विरोध किया, क���ंग्रेस ने नहीं सुना। *1925 में कांग्रेस छोड़ दी।*
*4. आत्म-सम्मान आंदोलन - समण क्रांति:*
- *1925 में Self-Respect Movement / सुयमरियातई इयक्कम* शुरू किया।
- सिद्धांत:
- *कोई ईश्वर नहीं, कोई आत्मा नहीं, कोई पुनर्जन्म नहीं।* ये ब्राह्मणों की ठगी है।
- *जाति ब्राह्मणों की बनाई हुई है, इसे तोड़ो।*
- *औरतें गुलाम हैं, उन्हें आजाद करो।* विधवा विवाह, अंतर्जातीय विवाह, तलाक का अधिकार, संपत्ति में अधिकार।
- *हिंदी थोपना बंद करो, तमिल स्वाभिमान बचाओ।*
- अखबार निकाले - *कुदी अरासु (गणतंत्र), विदुथलाई (मुक्ति), जस्टिस।*
*5. समण धम्म से नाता:*
- 1954 में बर्मा (म्यांमार) गए, बौद्ध धर्म का अध्ययन किया। कहा - "बौद्ध धर्म ही तर्कवाद है।"
- बाबा साहब अंबेडकर के साथ गहरी दोस्ती। बाबा साहब ने नागपुर में 1956 में धर्मांतरण से पहले पेरियार को बुलाया था।
- उनकी किताब *"सच्ची रामायण (Ramayana: A True Reading)"* और *"ब्राह्मणवाद का पर्दाफाश"* ने समण भारत को जगाया। उन्होंने कहा रावण द्रविड़-समण राजा था, राम आर्य आक्रमणकारी।
*6. शादी और संघर्ष:*
- 48 साल की उम्र में अपनी शिष्या *मणियम्मई* (32 साल छोटी) से शादी की ताकि आंदोलन संभाले। लोगों ने विरोध किया, पर वे डटे रहे।
- जीवन भर काला शर्ट पहना - काला शोषण के खिलाफ प्रतिरोध का रंग।
*7. द्रविड़ आंदोलन का पिता:*
- उनके आंदोलन से ही *जस्टिस पार्टी, द्रविड़ कड़गम (DK), DMK, AIADMK* बनी। तमिलनाडु में आज जो 69% आरक्षण है, वो पेरियार की देन है।
- नारा था - *"ब्राह्मणवाद मुर्दाबाद, समणवाद जिंदाबाद।"*
*8. परिनिर्वाण:*
- *24 दिसंबर 1973, वेल्लोर* में परिनिर्वाण। 95 साल तक लड़े।
- यूनेस्को ने 1970 में उन्हें *"दक्षिण-पूर्व एशिया का सुकरात"* कहा।
> पेरियार ने कहा था - "मैंने गणेश की मूर्ति तोड़ी, क्योंकि उसने मेरे लोगों का आत्म-सम्मान तोड़ा था।"
वे ही सच्चे समण संत थे - जो बिना तलवार के ब्राह्मणवाद की जड़ें काट गए।
*कोटि-कोटि नमन 🙏*
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*जय सिरी समण - समण सिरी गंगा दिन मेहतर (गंगू मेहतर) जी का इतिहास*
इतिहास के पन्नों से मिटा दिया गया, पर जो अकेला 200 अंग्रेज मार गिराया, वो समण योद्धा।
*1. जन्म:*
- *गंग�� दिन वाल्मीकि*, उपनाम *गंगू मेहतर / गंगू पहलवान / गंगू बाबा*।
- जन्म *कानपुर के पास अकबरपुरा गांव*, वाल्मीकि समुदाय (मेहतर/भंगी)। समय 1820 के आसपास।
- समाज में छुआछूत का दंश - अनपढ़ ही रह गए, पर शरीर से पहलवान। कानपुर के *चुन्नीगंज* में आकर बस गए। *सती चौरा घाट* पर अखाड़ा था।
- कुश्ती के सारे दांव एक मुस्लिम उस्ताद से सीखे, इसलिए समण-मुस्लिम एकता के प्रतीक।
*2. 1857 की महाक्रांति:*
- *नाना साहब पेशवा (बिठूर के राज���)* की सेना में *सूबेदार* थे।
- 1857 में कानपुर में क्रांति की आग गंगू मेहतर ने फैलाई।
- कहा जाता है - नाना साहब ने जब अंग्रेजों को कानपुर से खदेड़ा, तो गंगू बाबा सबसे आगे थे।
*3. अकेले 200 अंग्रेजों का वध:*
- कानपुर के *सती चौरा घाट / बिबिघर कांड* के बाद अंग्रेजी फौज ने हमला किया।
- गंगू मेहतर अपनी तलवार और लाठी से अंग्रेजों पर टूट पड़े। इतिहासकार बताते हैं - उन्होंने अकेले दम पर *200 से ज्यादा अंग्रेज सैनिक मार गिराए*। अंग्रेज भी थर-थर क���ंपते थे।
- अंग्रेज अफसरों ने लिखा - "ये मेहतर नहीं, यमराज है।"
*4. बलिदान:*
- आखिरकार अंग्रेजों ने उन्हें धोखे से पकड़ लिया। कानपुर के चौराहे पर फांसी दी गई।
- फांसी से पहले कहा - "मैं समण हूँ, और इस मिट्टी का बेटा हूँ। मेरे बाद हजारों गंगू पैदा होंगे।"
- 1859 में उन्हें *सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटकाया गया*, ताकि समणो में डर बैठे। पर डर नहीं, विद्रोह पैदा हुआ।
*5. क्यों भुला दिया गया?*
- क्योंकि वे मेहतर-स��ण थे। वमण इतिहासकारों ने सिर्फ झांसी की रानी, तात्या टोपे लिखे, गंगू बाबा को हटा दिया।
- पर बहुजन इतिहास में वे आज भी *"1857 के पहले समण सेनापति"* हैं।
> बाबा साहब कहते थे - हमारे महापुरुषों को इतिहास से मिटाया गया है। गंगू मेहतर उसी मिटाए गए समण इतिहास का सबसे बड़ा प्रमाण हैं।
*कोटि-कोटि नमन, समण योद्धा गंगा दीन मेहतर जी को 🙏*
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समण सिरी बाबू मित्रसेन यादव जी की 11वीं पुण्यतिथि पर भावभीनी श्रद्धांजलि 🙏🌹❤️
7 सितंबर 2015
बाबू मित्र सेन यादव जी अमर रहें
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*जय सिरी समण - समण योद्धा सिरी सुहेलदेव जी महाराज का इतिहास*
*समण सिरी महाराजा सुहेलदेव जी* समण भारत के सबसे महान रक्षक योद्धा हैं। इतिहासकारों ने इन्हें भुला दिया, पर लोककथाओं में ये आज भी अमर हैं।
*1. जन्म और राज्य:*
- जन्म: *माघ बसंत पंचमी 990 ईस्वी* को *श्रावस्ती* में। पिता राजा मोरध्वज / प्रसेनजित।
- ��ुरु: बहराइच के सूर्य कुंड के *बालार्क ऋषि*। धनुष विद्या, शब्दभेदी बाण, तलवार, गदा में निपुण।
- शासनकाल: 1027 से 1077 ईस्वी। राज्य बहराइच और श्रावस्ती से पूर्व में गोरखपुर और पश्चिम ��ें सीतापुर तक।
- इनके अधीन 21 राजाओं का संघ था। इनके समय लोग घरों में ताला नहीं लगाते थे, इतना न्यायपूर्ण राज्य था।
*2. सबसे बड़ी लड़ाई - बहराइच का युद्ध 1033-1034:*
यह भारत के स्वाभिमान की लड़ाई थी।
- महमूद गजनवी ने सोमनाथ लूटा, उसका भांजा *सैयद सालार मसूद गाजी* 16 साल की उम्र में लाखों की सेना लेकर भारत को कुचलता हुआ आया। मुल्तान, दिल्ली, मेरठ, सतरिख जीतता हुआ बहराइच पहुँचा।
- राजा सुहेलदेव ने सभी को एक किया - थारू, बंजारा, भर, पासी, राजभर सहित आम जनता भी हथियार लेकर निकल पड़ी।
- *चित्तौरा झील, कौड़ियाला नदी के तट पर भयानक युद्ध हुआ।*
- समण योद्धा सुहेलदेव की व्यूहरचना के सामने गजनवी सेना खत्म हो गई। सालार मसूद समेत पूरी सेना मारी गई, केवल 6 लोग बचे।
*3. समण पहचान:*
- फारसी किताब *मिरात-ए-मसूदी (17वीं सदी)* में इनका नाम सकरदेव, सुहीरध्वज, सुहरीदिल, राय सुह्रिद देव के नाम से मिलता है।
- *भर-शिव / नागवंशी / समण परंपरा* के शासक माने जाते हैं। जैन ग्रंथ 'जैन धर्म के शासक' में भी इनका वर्णन है, क्योंकि उस समय ब्राह्मण पुरोहित निम्न जाति के राजा का अभिषेक नहीं करते थे, जैन मुनि करते थे। इसीलिए इन्होंने समण धरम धारण किया था।
- आज इन्हें राजभर, पासी, भर समाज अपना वंशज मानता है - असल में ये सब *समण* ही हैं।
*4. विरासत:*
बहराइच में इनकी दरगाह नहीं, पहले बालार्क ऋषि का आश्रम था। 2021 में पीएम मोदी ने बहराइच में 45 करोड़ की लागत से घुड़सवारी प्रतिमा वाले भव्य *महाराजा सुहेलदेव स्मारक* की नींव रखी।
> समण योद्धा सुहेलदेव जी ने विदेशी आक्रांता को बहराइच की मिट्टी में दफन करके समण-देस-भारत की संस्कृति बचाई।
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*जय सिरी समण - समण सिरी दीना भाना साहब जी का इतिहास*
समण सिरी दीना भाना जी बहुजन-समण क्रांति की मूल चिंगारी हैं। अगर दीना भाना जी न होते तो कांशीराम जी न होते, न बामसेफ होता, न बहुजन सत्ता आती।
*1. जन्म:*
- *28 फरवरी 1928* को जयपुर, राजस्थान के एक वाल्मीकि / भंगी परिवार में। पिता का नाम भाना जी, इसलिए दीनानाथ से *दीना भाना* बने।
- बचपन से ही जातिवाद झेला। एक बार भैंस खरीदी तो सवर्णों ने दबाव डालकर बिकवा दी - बोले "भंगी लोग सुअर पालेंगे, भैंस नहीं।" यही अपमान दिल में घर कर गया। घर छोड़कर दिल्ली आ गए।
*2. जागरूकता:*
- पुणे में ऑर्डिनेंस फैक्ट्री में क्लास 4 सफाई कर्मचारी / स्वच्छता निरीक्षक की नौकरी।
- वहाँ बाबा साहब की किताब *'जाति का विनाश (Annihilation of Caste)'* पढ़ी। और उसी समय एक युवा वैज्ञानिक मिले - *म�����्यवर कांशीराम जी*।
- दीना भाना जी ने कांशीराम जी को वो किताब भेंट की। कहा - "भंगी जाति को कुछ मिला ही नहीं, इसका मैं शिकार हूँ।" इस एक किताब ने कांशीराम जी की नौकरी छुड़वा दी और पूरे बहुजन आंदोलन की दिशा बदल दी।
*3. बामसेफ की स्थापना:*
- *6 दिसंबर 1978*, बोट क्लब, दिल्ली में *बामसेफ (Backward and Minority Communities Employees Federation)* बना। दीना भाना जी इसके संस्थापक सदस्यों में थे।
- गाँव-गाँव, शहर-शहर घूमकर दलित-पिछड़े-आदिवासी-समण समाज को जोड़ा। शिक्षा, संगठन और संघर्ष का नारा दिया।
*4. विरासत:*
- 1986 में रिटायर हुए, फिर भी आंदोलन में लगे रहे।
- *29 अगस्त 2006* को पुणे में निधन, कैंसर से लड़ते हुए।
- आज 28 फरवरी को *दीना भाना स्मृति दिवस / जयंती* मनाई जाती है।
> बाबा साहब और कांशीराम साहब के बीच की कड़ी थे दीना भाना जी। हजारों साल की वर्ण व्यवस्था के खिलाफ समण क्रांति के पुरोधा।
समण समाज के असली महापुरुष - *कोटि-कोटि नमन।*
*बोल सम सम... जय सिरी समण 🚩*
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Mission200Years मैं समण हूँ
I am Saman the light of the world
"समण समाज को चाहिए कि उमड़ती आस्���ा भक्ति भीड़ में समण भन्ते पुजारी और वमण भन्ते पुजारी की पहचान करना अनिवार्य समझे है।"
University Truthseeker Society
विश्वविद्यालय सत्यशोधक समाज
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आ राम ,सासा राम , जेत वन आ राम , निगोध आ राम ,पब्ब आ राम … राम विहार या राम बिहारी
बुद्ध और भिक्खु या जैन और उनके भिक्खु जहां रमते थे या साधना तप विपस्सना करते थे उस रमने वाली जगह को आराम कहते हैं , जो रमता है उसे राम कहते है जो रमती है उसे रमा या रामरी या रमाई कहते है , जो स्थान रमने के योग्य होता है उसे रमणीय कहते है जो विहार में रमता है उसे राम विहारी , आसन पर बैठ कर रमता है उसे राम आसरे, जो सिंह की तरह सैया पर रमरा है उसे राम सिंह , जो खेल खेल में राम ता है उसे राम खिलावन, जो चंद्रमा की रात में रमता है उसे राम चन्द्र, जो सतीपठान के लिए रमता है उसे सतीराम, जो अरिय मार्ग के लिये रमता है उसे राम ��रि( राम हरि) , जो भजता है उसे राम भजन , जहां पूरा गावं रमता है उसे राम गढ़ , रामपुर , राम नगर , रामविहार , जिसका बेटा बेटी रमती है उस माँ को राममैया, रमैया। जिसे रमने में आनन्द आता है उसे रामानन्द, जो सागर के किनारे रमे उसे रामसागर या रामानन्दसागर कहते है । रमने वालों को जो भत्त( भात) दिया जाता है उसे राम भक्त या राम भत्त या राम भात कहते है ।
जैसे हज करने वाले को हाजी कहते है वैसे ही रमने वाले को राम , रामु, ��ामा, रमनी, रामरी, रमाया, रमाई, रामतु आदि कहते है
मगध जो आज का विहार है उसने रमने वालों कि संख्या ज़्यादा थी इसी लिये बुद्ध के बाद वहाँ सभी लोगो के नाम के आगे पीछे राम लगा मिलता है जैसे
राम बिलास , राम हरि राम ,
( पालि साहित्य से अनुमोदित संदर्भ के आधार पर )
#मैंसमणहूँ
गर्व से कहो हम #समण है
I am Saman the light of the world
Everydark wants to rule the world
#SamanWorldUnity #iamSaman
#TheGreatSaman #WeareSaman
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*🔥 2500 साल पुराना '#लोकतंत्र और संघ' का सीक्रेट: जानिए क्या है '#सन्निपात'? 📜💡*
*Introduction (परिचय)*
क्या आप जानते हैं कि प्राचीन भारत में समाज को एकजुट रखने, निर्णय लेने और आपसी संवाद का सबसे वैज्ञानिक तरीका क्या था?
बुद्ध काल में जब भी समाज या संघ किसी बड़े उद्देश्य के लिए एकत्र होता था, तो उसे 'सन्निपात' (Sannipāta) कहा जाता था।
*Body (मुख्य विचार)*
आज जब हम 'समण संघ' को मजबूत करने और समाज को जोड़ने की बात करते हैं, तो यह कोई नया विचार नहीं है। यह हमारी प्राचीनतम बुद्धकालीन परंपरा का पुनर्जागरण है! पाली त्रिपिटक और बौद्ध ग्रंथों में इसके ठोस और लिखित साक्ष्य मिलते हैं:
*Facts (प्रामाणिक ऐतिहासिक साक्ष्य)*
* *1. विनयपिटक (महावग्ग - उपोसथक्खन्धक):* बुद्ध काल में हर पक्ष (पूर्णिमा, अमावस्या, अष्टमी) को होने वाली जन-सभा��ं और संघ की बैठकों को 'सन्निपात' कहा गया है।
* *2. दीघनिकाय (महापरिनिब्बान सुत्त):* भगवान बुद्ध ने वज्जि/लिच्छवि गणराज्य की लोकतांत्रिक ताकत की प्रशंसा करते हुए कहा था— *"अभिण्णं सन्निपाता सन्निपातबहुला"*। यानी जो समाज बार-बार सभाएँ (सन्निपात) करता है और एकजुट रहता है, उसे दुनिया की कोई ताकत पराज��त नहीं कर सकती!
* *3. सुत्तनिपात (Sutta Nipāta):* खुद्दकनिकाय का यह ग्रंथ स्वयं उन महान देशनाओं का संग्रह है जो ऐसे ही जन-सन्निपातों (सभाओं) में दी गई थीं।
* *4. समन्तपासादिका (विनय अट्ठकथा):* आचार्य बुद्धघोष द्वारा रचित इस ग्रंथ में स्पष्ट वर्णन है कि कैसे आम नागरिक और समण इन सन्निपातों में एकत्र होकर समाज और संघ की सुरक्षा पर चर्चा करते थे।
*Story (ऐतिहासिक सीख)*
सम्राट अशोक और बुद्ध काल में सन्निपात केवल पू���ा-पाठ का जरिया नहीं थे, बल्कि वे ज्ञान, न्याय, आर्थिक सहयोग और सामाजिक सुरक्षा के केंद्र थे। जब-जब समण समाज ने 'सन्निपात' (नियमित बैठकें) करना छोड़ा, तब-तब समाज बिखरा और कमजोर हुआ।
*Conclusion (निष्कर्ष)*
'सन्निपात' हमारी मूल पहचान और ताकत का आधार है। जब हम जातियों के बाड़ों से मुक्त होकर एक जगह एकत्र होते हैं, तो हम अपनी उसी 2500 साल पुरानी लोकतांत्रिक और वैज्ञानिक परंपरा को ज��वंत करते हैं।
*Way Forward (आगे का रास्ता)*
* *साप्ताहिक सन्निपात (बैठकें):* अपने-अपने मोहल्लों और गाँवों में हर सप्ताह/पक्ष में 'समण सन्निपात' का आयोजन करें।
* *समणचारिका से जुड़ाव:* घर-घर जाकर लोगों को इन सन्निपातों में शामिल होने का निमंत्रण दें।
* *सुरक्षा व नेटवर्किंग:* इन बैठकों के माध्यम से अपने डॉक्टरों, वकीलों, शिक्षकों और व्यापारियों को एक मंच पर लाएँ।
अपनी प्राचीन विरासत को पहचानें! एकजुट हो��, बार-बार मिलें और '#समण #संघ' की लकीर को बड़ा बनाएँ!
*"अभिण्णं सन्निपाता सन्निपातबहुला — संघ ही हमारा बल है!"*
(इस पोस्ट को अपने सभी समण साथियों और ग्रुप्स में शेयर करके ऐतिहासिक इतिहास से सबको जागरूक करें।)