#JusticeForTeachers
एक आग्रह (केंद्र सरकार और राज्य सरकार से)
आज शिक्षक वर्ग को टीईटी अनिवार्यता के प्रश्न पर असमंजस और असुरक्षा का सामना करना पड़ रहा है। शिक्षा व्यवस्था में स्थिरता और मनोबल बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है जितना गुणवत्ता सुनिश्चित करना।
हम सरकार से यह निवेदन करना चाहते हैं कि शिक्षा की गुणवत्ता केवल एक परीक्षा से नहीं, बल्कि अनुभव, समर्पण और सतत कार्य से भी आँकी जानी चाहिए। जो शिक्षक आरटीई लागू होने से पूर्व विधिवत नियुक्त हुए, जिन्होंने वर्षों तक सफलतापूर्वक अध्यापन किया, उनके अनुभव और सेवा को एक झटके में कमतर आंकना न्यायोचित नहीं है।
तार्किक पक्ष यह कहता है कि यदि नियुक्ति के समय जो नियम प्रभावी थे, उन्हीं के आधार पर चयन हुआ, तो बाद में नियमों में संशोधन का प्रभाव पूर्व नियुक्त शिक्षकों पर लागू करना न्यायसंगत पुनर्विचार का विषय होना चाहिए। शिक्षा व्यवस्था में स्थिरता और मनोबल बनाए रखना भी उतना ही आवश्यक है जितना गुणवत्ता सुनिश्चित करना।
एक शिक्षक का आत्मसम्मान ही उसकी सबसे बड़ी पूँजी है। जब वर्षों की सेवा के बाद उसे अपनी योग्यता सिद्ध करने की नई बाध्यता के साथ खड़ा किया जाता है, तो उसके मन में असुरक्षा और पीड़ा स्वाभाविक है। यह पीड़ा केवल एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि हजारों परिवारों की चिंता बन जाती है।
हम सरकार से टकराव नहीं, समाधान चाहते हैं। हम संवाद चाहते हैं, सहानुभूति चाहते हैं और ऐसी नीति चाहते हैं जो न्याय, संवेदनशीलता और व्यवहारिकता—तीनों का संतुलन बनाए।
आशा है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकार शिक्षक समाज की इस गुहार को संवेदनशीलता से सुनेगी और अतिशीघ्र ऐसा निर्णय लेगी जो शिक्षा की गुणवत्ता भी बनाए रखे और वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों के सम्मान और अधिकारों की भी रक्षा करे।
क्योंकि शिक्षक मजबूत होगा तो ही शिक्षा मजबूत होगी, और शिक्षा मजबूत होगी तो ही राष्ट्र सशक्त बनेगा।
- विपिन बिहारी
@DrDCSHARMAUPPSS@UPPSS1921
@TFI_2025
• गुरु समान शंकराचार्य से सर्टिफिकेट की माँग।
• माता समान वयोवृद्ध महिला को सदन में अभद्र शब्द से संबोधित किया।
• अपने से बड़े, सदन के सदस्य को - लठैत।
• CM यानी “करप्ट माउथ” ने नैतिकता और शिष्टाचार के सारे आयाम तोड़ दिए हैं। इसलिए बुद्ध काल की यह कथा बताना अत्यंत आवश्यक हो जाता है।
• आपने शायद जातक कथा के नीले सियार की कहानी सुनी होगी। एक सियार नील के टब में गिरकर नीला हो जाता है। उसके नीले रंग के कारण जंगल के अन्य जानवर उसे भगवान का दूत मानकर जंगल का राजा बना देते हैं। यह सियार राजा ज़रूर था, पर अपनी भाषा नहीं भूला था। समय बीतने पर जब उसने अन्य सियारों की हुआँ-हुआँ सुनी, तो वह खुद भी हुआँकने लगा। तभी सब जान गए कि वह सियार ही है और उसका छल खुल गया।
• आज के सीएम भी वही हैं। जिन्हें “करप्ट माउथ” का इतिहास न पता हो, उनके लिए यह दबायी गयी जानकारी :
• मीडिया रिपोर्ट के अनुसार 1994 के आसपास अजय सिंह बिष्ट अपने पारिवारिक परिवहन व्यवसाय में सहयोग कर रहे थे।
• उस समय उनके पास तीन बसें और एक ट्रक थे।
• उन्होंने यह सड़कछाप भाषा उसी समय, डग्गामार वाहन चलवाते समय ही सीखी थी।
• योगी आदित्यनाथ के पिता आनंद सिंह बिष्ट और गोरखनाथ मठ के पूर्व महंत अवैद्यनाथ (कृपाल सिंह बिष्ट) आपस में रिश्ते में भाई थे।
• बताया जाता है कि बाद में उनके चाचा ने ही उन्हें मठ में बुलाया।
• महंत अवैद्यनाथ ने अपने भतीजे अजय सिंह बिष्ट को कुछ ही वर्षों में मठ का उत्तराधिकारी बना दिया।
• अजय सिंह बिष्ट गोरखनाथ पीठ के माध्यम से योगी आदित्यनाथ बने, जबकि इस पीठ में हजारों संन्यासी मौजूद थे।
• सवाल उठता है कि उत्तराधिकारी के रूप में उन्हीं को क्यों चुना गया - क्या यह केवल योग्यता का निर्णय था या रिश्तेदारी का भी प्रभाव था।
• पहले उन्हें मठ की गद्दी सौंपी गई और कुछ ही वर्षों में लोकसभा की सीट भी दे दी गई।
• क्या मठ में महंत चुनने के लिए कोई औपचारिक चुनाव प्रक्रिया हुई थी?
• क्या 4 साल में डग्गामार चलवाने वाला योगी का सर्टिफिकेट कैसे पा सकता है?
• यदि नहीं, तो क्या इसे “भगवा परिवारवाद” कहा जा सकता है?
और अंत में - पद और परिधान तो रिश्तों और समय की मदद से मिल सकते हैं, पर भाषा और व्यवहार नहीं।
हवा हवाई हो गये हवाई अड्डे!
दरअसल भाजपा राज में कोई भी योजना या निर्माण सिर्फ़ सरकारी ख़ज़ाने से पैसे निकालने का ज़रिया होता है, जिससे भ्रष्टाचार को मुखौटा पहनाया जा सके। इसीलिए भाजपा की बनाईं:
- पानी की टंकियाँ गिर रही हैं या उनसे धारावाहिक धारा फूट रही है;
- मंदिर से लेकर संसद तक की छतें टपक रही हैं;
- सड़के बदहाल हैं,
- भाजपा के बनाएं एक्सप्रेसवे लागत व कमीशनख़ोरी का रिकॉर्ड बना रहे हैं;
- रेलवे स्टेशन की दीवारें धराशायी हो रही हैं;
- एयरपोर्ट के शेड्स गिर जाते हैं या उनके बंद होने की ख़बरें आ रही हैं।
भाजपाइयों और उनेक ठेकेदारों का गुप्त नारा है :
पैसा बँटा, बजट सफ़ा
भाजपा की तथाकथित डबल इंजन सरकार को अपना प्रचार बदल कर लिखना चाहिए:
विनाश की गति अपरंपार
डबल इंजन का भ्रष्टाचार
पहले NRC में अल्पसंख्यकों से काग़ज़ माँगे, अब भाजपाई लोग बहुसंख्यकों से काग़ज़ माँग रहे हैं। भाजपाइयों की साज़िश यही है कि किसी तरह से लोगों के वोट काटे और ये साबित करें कि ये नागरिक नहीं हैं और उनकी ज़मीन, खेत, मकान सब छीन लें। भाजपा ज़मीनजीवी लोगों का गिरोह है।
#JusticeForTeachers
शिक्षकों के साथ वार्ता में एक बात, संसद में ठीक उसके विपरीत बयान—यह कैसा दोहरापन है?
यदि राज्यों से आँकड़े और सूचनाएँ मँगाई गई थीं, तो उत्तर में उनका उल्लेख क्यों नहीं?
20–25 वर्षों से सेवा दे रहे, 50–55 वर्ष के शिक्षकों को फिर से परीक्षा में बैठने को मजबूर करना घोर अन्याय है।
क्या आज कोई न्यायाधीश CLAT देगा? क्या 20 साल पुराना सैनिक 10 किमी दौड़ेगा?
20 लाख शिक्षकों की पीड़ा पर शिक्षा मंत्रालय मौन क्यों?
20 लाख शिक्षकों के साथ यह मज़ाक बंद हो।