मैदान-ए-अराफ़ात में आप ﷺ ने 9 ज़िल-हिज 10 हिजरी(7 मार्च 632 ईस्वी) को आख़री ख़ुत्बा दिया और फ़रमाया:
ऐ लोगों! ज़ुबान की बुनियाद पर, रंग नस्ल की बुनियाद पर त'अस्सुब में मत पड़ जाना, काले को गोर पर और गोर को काले पर, अरबी को अजमी पर और अजमी को अरबी पर कोई फ़ौक़ियत हासिल नहीं है।
@FiltrationTime @munawar0018 :
Nikah mein miyan biwi ko bas do lafz bolne hote hain qubool hai... aur talaq me bhi do lafz bolne hote hain talaq, talaq, talaq. Matlab ek contract sign karna hai aur ek contract todna hai, dono easy process hai.
@FiltrationTime @munawar0018 :
Rozah me din bhar bhookhe pyaase rehna hai, magar shaam ko biryani aur kebab khaa kar sab recover kar lena hai. Matlab intermittent fasting free me.
@FiltrationTime उपन्यास में “वंदे मातरम्” का उपयोग पूजा या स्तुति के अलावा एक धमकी के रूप में भी किया गया है, न कहना, तो मार डालूंगा" जैसी भाषा से यह साफ़ होता है कि यह केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि वास्तविक हिंसात्मक स्थल क्रिया दर्शाता है।
@FiltrationTime वंदे मातरम् कहो, नहीं तो मार डालूंगा!
उस रात में गाँव-गाँव में, नगर-नगर में महाकोलाहल मच गया. सभी चिल्ला रहे थे– ‘मुसलमान हार गये; देश हम लोगों का हो गया. भाइयों! हरि-हरि कहो!’ गाँव में मुसलमान दिखाई पड़ते ही लोग खदेड़कर मारते थे… राहगीरों और गृहस्थों को पकड़कर कहने लगे
काका आवाज़ का नाम है
काका इन्क़लाबी जज़्बे का नाम है
काका हक़ का नाम है
काका कलम का नाम है
काका हिम्मत का नाम है
काका वो है जिनकी क़लम को देख कर 80%
हम जैसे युवा लिखना सीखें है और बोलना
तो आपको बता दु नाम नहीं काका ब्रांड है
@007AliSohrab#IStandWithAlishohrab
17 سالہ مسلم طالب علم، کو اودھ پور، راجستھان میں 24 جولائی 2025 کو یا اس کے قریب مبینہ طور پر لنچ کیا گیا، تین افراد ہرش وردھن پانڈے، دیپک سویتا، اور بھارت سرکار نے ان پر لوہے کی سلاخوں اور لاٹھیوں سے حملہ کیا، جس کے نتیجے میں ان کی موت ہو گئی۔
#JusticeForArishKhan
कोई भी हेट क्राईम,लिंचिंग या मोब वायलेंस सिर्फ एक व्यक्ति विशेष के साथ नहीं होता है बल्कि पूरे समाज के साथ होता है इसलिए जरूरी है कि ऐसे मामलों को गंभीरता से लिया जाए।
#JusticeforMaksood
बस ये सवाल नहीं पूछना है उलेमा से
चंदे का हिसाब क्यों नहीं देते
हुक्मरान का एहतेसाब क्यों नहीं करते
इक़ामत ए दिन का काम क्यों नहीं करते
कुफ़रिया निज़ाम और ताग़ुत की पैरवी क्यों
उलेमा का इस्लाम में एहतराम है
बेहद शर्म और अफसोस की बात है कि @pratapgarhpol की नजर में मा. उच्चतम न्यायालय के सर्वविदित गाइडलाइंस की कोई अहमियत नहीं बची है। अभी हाल में ही मा. उच्चतम न्यायालय के न्यायमूर्ति अभय एस. ओका और न्यायमूर्ति नोंगमईकापम कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा है कि +