तेरी हँसी में चाँद की नरमी भी उतरती थी,
सूरज-सा मगर इतना मुनव्वर नहीं देखा।
खुशबू तेरे अशआर की गुलाबों में बसी जैसे,
अल्फ़ाज़ का ऐसा कोई सागर नहीं देखा।
तन्हाई के जंगल में भी राहें थीं उजालों की,
तू जैसा किसी दर्द का रहबर नहीं देखा।
रोते हुए चेहरों को हँसाना तेरा फ़न था
🌙 अलविदा ऐ बशीर बद्र 🌹
तुझसे तो मुकम्मल कोई शायर नहीं देखा,
अल्फाज का तुझसा तो समंदर नहीं देखा।
महफ़िल में तेरी बात का जादू था कुछ ऐसा,
पत्थर भी हुआ मोम, वो मंज़र नहीं देखा।
हर शख़्स को सीने से लगाया था मोहब्बत से,
इंसाँ कोई तुझ-सा दिलावर नहीं देखा।
दर्द देंगे वो सिसकियां देंगे
हम है कागज वो कैंचियां देंगे,,
जगनु ओ ने शराब पीली,, है,,
अब ये सूरज को गलियां देंगे,,,
आप जो साजिशन बैठने नहीं देते,,
आप एक रोज कुर्सियां देंगे ,,,
मैं तो जलते हुए सहराओं का इक पत्थर था
तुम तो दरिया थे मिरी प्यास बुझाते जाते
मुझ को रोने का सलीक़ा भी नहीं है शायद
लोग हँसते हैं मुझे देख के आते जाते
हम से पहले भी मुसाफ़िर कई गुज़रे होंगे
कम से कम राह के पत्थर तो हटाते जाते
#Dr, Rahat indauri
हाथ ख़ाली हैं तिरे शहर से जाते जाते
जान होती तो मिरी जान लुटाते जाते
अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है
उम्र गुज़री है तिरे शहर में आते जाते
अब के मायूस हुआ यारों को रुख़्सत कर के
जा रहे थे तो कोई ज़ख़्म लगाते जाते