कल वैचारिकी फाउंडेशन के द्वारा जुलाई में शुरू हो रहे नये सत्र पर प्रा वि ख़िदरापुर प्रथम,बाराबंकी के बच्चों व गाँव के अन्य बच्चों को पाठ्य सामग्री वितरित की l
बच्चों की शिक्षा पर सहयोग के लिए वैचारिकी फाउण्डेशन से आप जुड़ सकते हैं l
#childeducation #
अरमान दिल के टूटते-दिल इन रिवाज़ों में रहे,
अब तो न हम तेरे सुरों में रहे, न साजों में रहे।
इस मुहब्बत ने बख़्शीं हैं ये सारी शोहरतें हमको,
हम तेरे दिल में रहे न रहे मगर किताबों में रहे।
शिवम् त्यागी ।। वैचारिकी
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तुम पे शक है! अरे नहीं जाना,
ऐसा हो सकता है कहीं जाना?
सबसे आला किया निराला किया,
इश्क़ तुमने किताबों वाला किया,
पर किताबे ही ये बताती हैं,
कश्तियाँ दिल की डूब जाती हैं।
इस से पहले भी ख़्वाब टूटे हैं
इस से पहले भी साथ छूटे हैं
तुम मुझे छोड़ तो नही दोगी?(४
@manojmuntashir
तुम मोहब्बत का एक जजीरा हो,
जैसे मंदिर में कोई मीरा हो,
जैसे दरगाह पर हो कुन फाया,
तुमने मुझको है ऐसे गाया,
प्यार करती हो, जितना है बस में,
दौड़ता हूँ तुम्हारी नस-नस में।
जानता हूँ जो अपना नाता है,
फिर भी यह डर सताये जाता है,
तुम मुझे छोड़ तो नही दोगी?(३
@manojmuntashir
यूँ तो दिन से भी मेरी अनबन है,
रात लेकिन पुरानी दुश्मन है,
शाम से बेगनी सी रहती है,
दिन में खलबली सी रहती है,
बेखबर कितना भी मैं हो जाऊँ,
नींद कितनी भी गहरी मैं सो जाऊँ।
दर्द सीने में जगा रहता है,
एक खटका सा लगा रहता है-
तुम मुझे छोड़ तो नही दोगी?(२)
#ManojMuntashir
आसमानों से जो अता है मुझे,
वो दुआ तुम हो ये पता है मुझे,
इश्क़ हो तुम ये मानता हूँ मैं,
तुम मेरी हो ये जानता हूँ मैं,
मेरा इमान-ओ-दीन है तुम पर,
मुझे पूरा यकीन है तुम पर।
फिर भी कमबख़्त दिल धड़कता है,
रोज यह सोच कर तड़पता है-
तुम मुझे छोड़ तो नहीं दोगी? (१
मनोज मुंतशिर
ना जाने कब से एक पागल घूम रहा है जंगल में
किसने इसके हाथ बांध कर छोड़ दिया है जंगल में
यारों बढ़ते बढ़ते अब ये बात कहां तक आ पहुंची
यही सोचकर एक दीवाना खौफ़ ज़दा है जंगल में
कान तरसते है परिंदो की चहचहाहट सुनने को
मतलब इसका फिर से कोई शहर बसा है जंगल में!
#WritingCommunity
जैसे होते है यार जंगल खामोश,
वैसे ही हो गया एक पागल खामोश!
मै भी दरिया की तरह छलक जाऊं क्या?
एक अरसे से हूं मै अब तलक खामोश!
कल तलक जो मौत संग खेल करता था,
इश्क़ में हो गया वहीं पागल खामोश!
कोई बताने का नहीं यहां दरवेश,
होते है इस दहर के दलदल खामोश!
अनुराग दरवेश