🔬 वैज्ञानिकों के साथ मेरे अनुभव
विज्ञान-जगत के अनेक प्रतिष्ठित व्यक्तियों और वैज्ञानिकों के साथ वर्षों तक संवाद और चर्चा करके आचार्य जी को अनेक महत्वपूर्ण अनुभव प्राप्त हुए।
इस वीडियो में उन्होंने अपने कुछ ऐसे अनुभव साझा किए हैं, जो विज्ञान, शोध और सत्य की खोज से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति के लिए विचारणीय हैं।
यदि आप वैज्ञानिक जगत और दृष्टिकोण की वास्तविकता को समझना चाहते हैं, तो यह वीडियो अवश्य देखें।
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अदृश्य वैश्विक षड्यन्त्र और वैदिक समाधान
(वैदिक एवं आधुनिक भौतिकी शोध संस्थान — वार्षिक कार्यक्रम)
📆 दिनांक— 25, 26 व 27 दिसम्बर (शुक्रवार, शनिवार एवं रविवार)
पौष कृ. २, ३ व ४ वि. सं. २०८३, सृष्टि सम्वत् १,९६,०८,५३,१२७
📑 कार्यक्रम के विषय—
1. आर्यावर्त का प्राचीन गौरव
2. विदेशी षड्यन्त्र
3. विनाश की ओर सभ्यता
4. अन्त की ओर सनातन धर्म
5. गौ आधारित कृषि
6. पूर्ण समाधान - वैदिक विज्ञान
7. फार्मा कम्पनियों का मकड़जाल
8. रुपये का खेल
9. मानसिक गुलामी
10. संयुक्त राष्ट्र एजेंडा 2030
...और भी ऐसे ही अनेक गम्भीर विषयों पर चर्चा होगी।
पंजीकरण करने के लिए लिंक—
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📍स्थान—
श्री विजयपताका महातीर्थ, सिरोही
अधिक जानकारी के लिए सम्पर्क करें—
☎️ 9829148400
एक अत्यन्त सुखद सूचना
हमारी चार पुस्तकें—
1. वैदिक रश्मि विज्ञान
2. परिचय वैदिक भौतिकी
3. वैदिक संध्या
4. सत्यार्थ प्रकाश (उभरते प्रश्न गरजते उत्तर)
का बंगला भाषा में अनुवाद पूर्ण हो चुका है। अब बंगला भाषी पाठक भी इन पुस्तकों का अध्ययन अपनी मातृभाषा में कर सकेंगे।
इस महत्त्वपूर्ण कार्य का श्रेय आशीष आर्य, कूचबिहार (पश्चिम बंगाल) को जाता है, जिन्होंने अत्यन्त परिश्रम, निष्ठा और समर्पण के साथ इस कार्य सम्पन्न किया। उनके इस योगदान के लिए हार्दिक धन्यवाद।
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এক অত্যন্ত আনন্দের সংবাদ
আমাদের চারটি গ্রন্থ—
১. বৈদিক রশ্মি বিজ্ঞান
২. পরিচয় বৈদিক ভৌতবিজ্ঞান
৩. বৈদিক সন্ধ্যা
৪. সত্যার্থ প্রকাশ (উদীয়মান প্রশ্ন গর্জনকারী উত্তর)
এর বাংলা ভাষায় অনুবাদ সম্পূর্ণ হয়েছে। এখন বাংলা ভাষাভাষী পাঠকরাও তাঁদের মাতৃভাষায় এই গ্রন্থগুলির অধ্যয়ন করতে পারবেন।
এই গুরুত্বপূর্ণ কাজের সম্পূর্ণ কৃতিত্ব আশীষ আর্য, (কোচবিহার,পশ্চিমবঙ্গ)-এর প্রাপ্য, যিনি অত্যন্ত পরিশ্রম, নিষ্ঠা ও সমর্পণের সঙ্গে এই কাজ সম্পন্ন করেছেন। তাঁর এই অবদানের জন্য আন্তরিক ধন্যবাদ।
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विकास की दौड़ विनाश की ओर
आज संसार में विकास का सबसे बड़ा मानदण्ड ऊर्जा की खपत को बना दिया गया है। जो देश जितनी अधिक ऊर्जा का उपयोग करता है, उसे उतना ही अधिक विकसित माना जाता है। अन्तर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेन्सी (IEA) की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार वैश्विक विद्युत-उपभोग में तीव्र वृद्धि हो रही है और 2025 से 2027 तक प्रतिवर्ष लगभग 4% वृद्धि का अनुमान व्यक्त किया गया है। आधुनिक उद्योग, एयर कण्डीशनर, डाटा सेन्टर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), इलेक्ट्रिक वाहन और डिजिटल तन्त्र इस बढ़ती हुई ऊर्जा-आवश्यकता के प्रमुख कारण बताए जा रहे हैं।
इसका अर्थ यह हुआ कि यदि किसी देश को विकसित बनना है, तो उसे अत्यधिक मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न भी करनी होगी और उसका उपभोग भी बढ़ाना होगा। यही कारण है कि आज सब कुछ बिजली से चलाने की बात की जा रही है— वाहन, रेलें, उद्योग, घर, मशीनें और सम्पूर्ण जीवन-व्यवस्था। आज अनेक देशों में पेट्रोल और डीजल वाहनों को धीरे-धीरे हटाकर इलेक्ट्रिक वाहनों की ओर बढ़ने की नीतियाँ बनाई जा रही हैं। कनाडा जैसे देश तो 2050 तक अपनी विद्युत-ग्रिड क्षमता को लगभग दुगुना करने की योजनाएँ प्रस्तुत कर चुके हैं, क्योंकि भविष्य की सम्पूर्ण अर्थव्यवस्था को बिजली-आधारित माना जा रहा है।
किन्तु प्रश्न यह है कि इतनी ऊर्जा आएगी कहाँ से? कहा जाता है कि परमाणु ऊर्जा होगी, सोलर प्लांट होंगे, बैटरियाँ होंगी। किन्तु हर प्रकार की ऊर्जा के साथ कोई न कोई प्रदूषण और असन्तुलन जुड़ा हुआ है। यदि पेट्रोलियम, डीजल और कोयले से ऊर्जा बनेगी, तो वायु प्रदूषण बढ़ेगा। विश्व के अनेक देशों में आज भी विद्युत उत्पादन का बड़ा भाग कोयले और गैस से ही होता है। भारत में भी 2024 में लगभग 74% विद्युत उत्पादन कोयले पर आधारित बताया गया। यदि धरती के भीतर से निरन्तर खनिज, कोयला और तेल निकाला जाएगा, तो धरती भीतर से खोखली होती जाएगी और खनन से भूमि, जल तथा वन-तन्त्र पर भी प्रभाव पड़ेगा।
यदि बड़े-बड़े सोलर प्लांट लगाए जाएँगे, तो भूमि और स्थानीय तापमान प्रभावित होंगे। विशाल सौर-पार्कों के लिए हजारों एकड़ भूमि की आवश्यकता होती है। राजस्थान, गुजरात, चीन और अमेरिका में बने विशाल सौर-उद्यानों के कारण स्थानीय जैव-विविधता, भूमि-ताप और पारिस्थितिकी पर प्रभाव सम्बन्धी अध्ययन सामने आए हैं। यदि सब कुछ बैटरी पर आधारित होगा, तो भविष्य में लिथियम, कोबाल्ट और बैटरियों के विशाल कचरे का संकट उत्पन्न होगा। वैज्ञानिकों ने चेतावनी दी है कि आने वाले दशकों में प्रयुक्त बैटरियों के पुनर्चक्रण और निस्तारण की समस्या अत्यन्त बड़ी हो सकती है।
ऊर्जा का उत्पादन जितना बढ़ेगा, उतनी ही ऊष्मा भी बढ़ेगी। किसी भी प्रकार की ऊर्जा में ऊष्मा अवश्य होती है। ऊष्मागतिकी के सिद्धान्तों के अनुसार ऊर्जा-परिवर्तन के साथ ऊष्मा उत्पन्न होना स्वाभाविक प्रक्रिया है। जहाँ ऊर्जा उत्पन्न होती है, वहाँ भी ताप बढ़ता है और जहाँ उसका उपयोग होता है, वहाँ भी ताप उत्पन्न होता है। ताप-विद्युत संयन्त्रों, डाटा सेन्टरों, भारी मशीनों और औद्योगिक इकाइयों से निरन्तर ऊष्मा वातावरण में जाती रहती है। आज बड़े-बड़े AI डाटा सेन्टरों की बिजली-खपत इतनी अधिक हो चुकी है कि ब्रिटेन और अमेरिका में कुछ अध्ययनों के अनुसार डाटा सेन्टर कुल बिजली-आपूर्ति का लगभग 6% तक उपयोग कर रहे हैं।
एसी और फ्रिज जैसे उपकरण भीतर की गर्मी को बाहर फेंकते हैं। वे वास्तव में शीत उत्पन्न नहीं करते, बल्कि ताप को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेजते हैं। यही कारण है कि अत्यधिक एसी उपयोग वाले महानगरों में बाहरी तापमान और “अर्बन हीट आइलैण्ड” प्रभाव बढ़ने की चर्चा की जाती है। यदि सम्पूर्ण सभ्यता निरन्तर ऊर्जा-उपभोग पर आधारित होगी, तो धरती का तापमान बढ़ना स्वाभाविक माना गया।
आज वायुमण्डल को रेडियो वेव्स, माइक्रोवेव्स और असंख्य कृत्रिम तरंगों से भर दिया गया है। मोबाइल, टावर, वायरलेस तन्त्र, उपग्रह और डिजिटल उपकरण लगातार तरंगें उत्पन्न कर रहे हैं। 5G नेटवर्क, उपग्रह इंटरनेट और निरन्तर बढ़ते डिजिटल संचार ने विद्युत-उपभोग को और अधिक बढ़ाया है। जब किसी पदार्थ के अणुओं की गति और कम्पन बढ़ते हैं, तो तापमान बढ़ता है। माइक्रोवेव तकनीक भी इसी सिद्धान्त पर कार्य करती है, जहाँ तरंगें अणुओं की गति बढ़ाती हैं। यदि वायुमण्डल में निरन्तर कृत्रिम तरंगें भरी जाएँगी, तो वे वायु के कणों से टकराएँगी और उनकी ऊर्जा तथा कम्पन को बढ़ाएँगी। परिणामस्वरूप तापमान भी बढ़ेगा।
इस कारण धरती का तापमान केवल औद्योगिक धुएँ से ही नहीं बढ़ रहा, बल्कि सम्पूर्ण आधुनिक ऊर्जा-केन्द्रित जीवनशैली उससे जुड़ी हुई है। जितनी अधिक ऊर्जा उत्पन्न होगी और जितना अधिक उसका उपयोग होगा, उतनी ही अधिक गर्मी बढ़ेगी। यही बढ़ती हुई गर्मी कभी कैलिफोर्निया के जंगलों में आग के रूप में दिखाई देती है, कभी ऑस्ट्रेलिया और ब्राजील के वनों में, तो कभी हीट वेव्स और जलवायु असन्तुलन के रूप में।
आज संसार के अनेक भागों में हीट वेव्स की आवृत्ति और तीव्रता बढ़ती दिखाई दे रही है। भारत में भी दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्य भारत के अनेक क्षेत्रों में 45°C से अधिक तापमान सामान्य होता जा रहा है। वैज्ञानिक संस्थाएँ इसे बढ़ती ऊर्जा-खपत, औद्योगिकीकरण, शहरीकरण और ग्रीनहाउस गैसों की वृद्धि से जोड़कर देखती हैं।
पहले मनुष्य और पशुओं की ऊर्जा का उपयोग अधिक होता था। बैल हल चलाते थे, कोल्हू चलाते थे। मनुष्य अपने हाथों से कार्य करता था। उस व्यवस्था में न वायु प्रदूषण था, न भारी ऊर्जा की आवश्यकता। बैल खेत में चलते हुए गोबर और मूत्र के माध्यम से भूमि को उर्वर भी बनाते जाते थे। गाँवों की अर्थव्यवस्था स्थानीय और प्रकृति-सापेक्ष थी। किन्तु ट्रैक्टर और मशीनों के आने के बाद डीजल, पेट्रोल और भारी उद्योगों पर निर्भरता बढ़ गई। अब जहाँ मशीनें हैं, वहाँ ईंधन है; जहाँ ईंधन है, वहाँ प्रदूषण है।
रीसाइकलिंग को भी समाधान के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, किन्तु उसमें भी ऊर्जा लगती है। यदि प्लास्टिक बनाया गया, तो उसमें प्रदूषण हुआ। उसे गलाकर पुनः उपयोग में लाया जाएगा, तब भी ऊर्जा और प्रदूषण होगा। फिर उससे नई वस्तु बनेगी, उसमें भी ऊर्जा और प्रदूषण होगा। एल्यूमिनियम, इस्पात, प्लास्टिक और इलेक्ट्रॉनिक कचरे के पुनर्चक्रण में बड़ी मात्रा में बिजली और तापीय ऊर्जा की आवश्यकता होती है। इस प्रकार आधुनिक सभ्यता एक ऐसे चक्र में फँस गई है जहाँ हर समाधान के भीतर भी ऊर्जा-उपभोग और प्रदूषण छिपा हुआ है।
आज डिजिटल सभ्यता स्वयं भी विशाल ऊर्जा-उपभोग का स्रोत बन चुकी है। इंटरनेट, क्लाउड कम्प्यूटिंग, क्रिप्टोकरेंसी, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डाटा भण्डारण के लिए विश्वभर में विशाल डाटा सेन्टर बनाए जा रहे हैं। कुछ रिपोर्टों के अनुसार AI आधारित डाटा सेन्टरों के कारण अमेरिका और यूरोप में बिजली की माँग तेजी से बढ़ रही है।
इसलिए प्रकृति-सम्मत ऊर्जा और कृत्रिम ऊर्जा में अन्तर समझना आवश्यक है। मनुष्य और पशुओं की स्वाभाविक ऊर्जा निरापद थी, किन्तु आधुनिक ऊर्जा-व्यवस्था ने वायु, जल, भूमि और यहाँ तक कि आकाश तक को प्रभावित कर दिया। यदि विकास का अर्थ केवल ऊर्जा-उपभोग बढ़ाना बन जाएगा, तो अन्ततः उसका परिणाम प्रदूषण, तापवृद्धि और प्रकृति के असन्तुलन के रूप में सामने आएगा। अतः आवश्यक यह है कि विकास की परिभाषा केवल अधिक उत्पादन, अधिक उपभोग और अधिक ऊर्जा-व्यय तक सीमित न रहे, बल्कि प्रकृति-सन्तुलन, स्थानीय जीवन-पद्धति, सीमित उपभोग और पर्यावरणीय सामञ्जस्य को भी उसमें सम्मिलित किया जाए, अन्यथा विनाश निश्चित है।
—आचार्य अग्निव्रत
प्रमुख, वैदिक एवं आधुनिक भौतिकी शोध संस्थान
(श्री वैदिक स्वस्ति पन्था न्यास द्वारा संचालित)
🌍 https://t.co/MconyKFCFl
सन्दर्भ—
1. International Energy Agency (IEA) — Electricity 2025 Report
https://t.co/nIUsVjehEl
2. Reuters — Global electricity demand to grow by 4% through 2027
https://t.co/CSQlrl0YOA
3. Reuters — Canada plans to double electricity grid by 2050
https://t.co/Bi158TkOJb
4. Reuters — US power use expected to hit record highs due to AI and data centres
https://t.co/zHOl8EAYTw
5. The Guardian — Data centres consuming massive electricity
https://t.co/XhIHSjEPfR
विकास और जीडीपी : आधुनिक सभ्यता का संकट
आज संसार में विकास की जो परिभाषा प्रस्तुत की जा रही है, उसके अनुसार जहाँ चौड़ी सड़कें हों, बड़े-बड़े एयरपोर्ट हों, तीव्र गति से चलने वाली रेलें हों, आधुनिक बसें हों और जहाँ प्रत्येक कार्य बिजली तथा मशीनों से होता हो, वही देश विकसित माना जाता है। कहा जाता है कि पेट्रोलियम का उपयोग कम होगा और सब कुछ बिजली से चलेगा। किन्तु प्रश्न यह है कि इतनी विशाल मात्रा में बिजली आएगी कहाँ से? कहा जाएगा कि बिजली यूरेनियम से बनेगी, परमाणु ऊर्जा से बनेगी, सोलर प्लांट लगाए जाएँगे। आज स्थिति यह हो गई है कि जो देश जितनी अधिक ऊर्जा की खपत करता है, उसे उतना ही अधिक विकसित माना जाता है।
यदि ऊर्जा की खपत ही विकास का मानदण्ड है, तो इसका अर्थ स्पष्ट है कि इस धरती पर ऊर्जा का उत्पादन निरन्तर बढ़ाना पड़ेगा। किन्तु ऊर्जा के जो प्रमुख स्रोत हैं— डीजल, पेट्रोलियम, कोयला वे सब प्राकृतिक संसाधन हैं और एक दिन समाप्त हो जाएँगे। इन्हें धरती के भीतर से निकालने का परिणाम यह होगा कि धरती के भीतर खोखलापन उत्पन्न होगा। जब निरन्तर पानी निकाला जाएगा, पेट्रोलियम निकाला जाएगा, कोयला निकाला जाएगा, खनिज निकाले जाएँगे, तब धरती के भीतर रिक्त स्थान अर्थात् वैक्यूम उत्पन्न होगा।
आज यदि सरकार को यह पता चल जाए कि किसी खेत के नीचे गैस है, तो तुरन्त वहाँ गैस निकालने की प्रक्रिया प्रारम्भ कर दी जाएगी अर्थात् धरती के भीतर जो कुछ भी मूल्यवान दिखाई दे, उसे निकाल लेना ही विकास माना जा रहा है। फिर चाहे उसके कारण भूकम्प आएँ, चाहे पर्यावरण असन्तुलित हो जाए, चाहे वायु प्रदूषण बढ़े, चाहे तापमान बढ़ता चला जाए। इन सबकी चिन्ता गौण हो जाती है, क्योंकि मुख्य लक्ष्य केवल ‘विकसित’ होना रह गया है।
आज विकास और जीडीपी की वर्तमान अवधारणा ने धरती को एक ऐसे मार्ग पर ला खड़ा किया है, जहाँ विकास का अर्थ ही मानो धरती को आग की ओर ले जाना बन गया है और जीडीपी का अर्थ धरती को धीरे-धीरे श्मशान में परिवर्तित करना। यदि विकास हमें रोगी बना रहा है, यदि विकास प्राकृतिक आपदाओं को बढ़ा रहा है, यदि विकास मनुष्य को भय, तनाव और मृत्यु की ओर धकेल रहा है, तो फिर ऐसा विकास किस काम का? वह विकास नहीं ‘विनाश’ है।
आज जीडीपी बढ़ाने के लिए मनुष्य को बाज़ार पर निर्भर बनाया जा रहा है। यदि कोई व्यक्ति अपने हाथों से भोजन बनाता है, अपने खेत का अन्न खाता है, हाथ की चक्की से आटा पीसता है, हाथों से बिलोना करता है, तो उसमें बाज़ार की भागीदारी नहीं है। इसलिए उसे पिछड़ापन कहा जाता है। किन्तु यदि वही व्यक्ति होटल में भोजन करे, पैक फूड खरीदे, मशीनों पर निर्भर हो जाए, तो जीडीपी बढ़ती है अर्थात् दूसरों पर निर्भर रहना विकास माना जा रहा है और आत्मनिर्भरता पिछड़ेपन की निशानी बन गई है।
आज बड़े-बड़े अस्पताल, बड़ी-बड़ी इमारतें, चौड़ी सड़कें और विशाल उद्योग विकास के प्रतीक माने जाते हैं। किन्तु यदि यही विकास मनुष्य को रोगी बना दे, प्रकृति को नष्ट कर दे, जल, वायु और भूमि को प्रदूषित कर दे, तो फिर यह विकास नहीं, एक गहरा असन्तुलन है। जीडीपी बढ़ रही है, किन्तु नागरिक भय, तनाव, रोग और अशान्ति में जी रहे हैं। यदि विकास मनुष्य को भीतर से अस्थिर और दुखी बना दे, तो उस विकास का क्या लाभ?
वास्तविक विकास सत्य का विकास है, ईमानदारी का विकास है, शान्ति का विकास है, भाईचारे का विकास है, परस्पर मैत्री का विकास है, सादगी का विकास है और आत्मनिर्भरता का विकास है। यदि मनुष्य अपनी आवश्यकताओं को सीमित करके, प्रकृति के साथ सन्तुलन बनाकर, सरल और संयमित जीवन जीना सीखे, तभी वास्तविक सुख और स्थायी विकास सम्भव हो सकता है।
—आचार्य अग्निव्रत
प्रमुख, वैदिक एवं आधुनिक भौतिकी शोध संस्थान
(श्री वैदिक स्वस्ति पन्था न्यास द्वारा संचालित)
🔥 आखिर पृथ्वी इतनी गर्म क्यों हो रही है?
क्या सिर्फ Global Warming जिम्मेदार है या इसके पीछे कोई गहरा वैज्ञानिक रहस्य छिपा है?
देखें पूरा वीडियो—
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विनम्र श्रद्धांजलि: आर्यजगत् के अनमोल रत्न विनम्र भामाशाह माननीय दीनदयाल जी गुप्ता
अभी-अभी हमें डॉलर फाउंडेशन (कोलकाता) के अध्यक्ष माननीय दीनदयाल जी गुप्ता के निधन का अत्यन्त दुःखद एवं हृदय विदारक समाचार प्राप्त हुआ। गुप्ता जी आर्यजगत् के एक ऐसे 'भामाशाह' थे, जिनके भीतर दान देते समय मैंने कभी अहंकार का लेशमात्र भी भाव नहीं देखा। वे अत्यन्त विनम्र और सहयोगी स्वभाव के धनी थे। चाहे कोई विद्यार्थी हो, गुरुकुल, विद्वान्, संन्यासी या कोई भी संस्था— जैसे ही उन्हें किसी की आवश्यकता की जानकारी मिलती और उन्हें कार्य उचित लगता, वे तुरन्त सहयोग के लिए तत्पर हो जाते थे।
मेरी उनसे पहली मुलाकात वर्ष 2008 में अजमेर के ऋषि मेले में हुई थी। मेरे व्याख्यान के पश्चात् उन्होंने पीछे से आकर बड़े ही सरल भाव से अभिवादन किया और अपना परिचय दिया। उसके बाद वे मुझे अपने कमरे में ले गए और उस दिन से वे हमारे होकर रह गये और वह जीवनपर्यंत हमसे जुड़े रहे। वे हमारे ट्रस्ट के ट्रस्टी बने और वर्षों से उपाध्यक्ष पद की गरिमा बढ़ाते रहे।
कई बार कुछ लोगों ने उन्हें हमारे विरुद्ध भड़काने का प्रयास भी किया, परन्तु गुप्ता जी अपनी अन्तरात्मा से निर्णय लेने वाले व्यक्तित्व थे। उन्होंने कभी भी हम पर संदेह नहीं किया, बल्कि सदैव यही चिंतन किया कि संस्था को आगे कैसे बढ़ाया जाए? यद्यपि हमारा अनुसंधान कार्य बहुत कठिन है, फिर भी उन्होंने बड़े उत्साह के साथ हमेशा सहयोग किया। वे हमारे कार्यक्रम में जब भी आते, बहुत उत्साहित होते। जब भी कोई बड़ा वैज्ञानिक या विशिष्ट व्यक्ति हमसे जुड़ता, तब वे बहुत प्रसन्न होते। जाते-जाते भी, जब भी मेरी उनसे फोन पर बात होती, वे यही पूछते— "आचार्य जी! सिरोही में अनुसंधान भवन कब बनने जा रहा है?" वे उसमें बड़ा सहयोग करना चाहते थे, पर दुर्भाग्यवश उनके रहते भूमि के कन्वर्जन (परिवर्तन) का कार्य पूरा नहीं हो पाया। इस विलम्ब से वे काफी दुःखी रहते थे और बार-बार कहते थे— "आचार्य जी! अनुसंधान केन्द्र बनने में बहुत देर हो रही है।" वे केवल स्वयं ही सहयोग नहीं करते थे, बल्कि दूसरों को भी सहयोग के लिए प्रेरित करते थे।
वर्तमान शोध संस्थान के निर्माण में भी उनका बहुत बड़ा योगदान रहा। वे हमारे प्रमुख आर्थिक आधार स्तम्भ थे। केवल हमारी ही नहीं, बल्कि आर्यसमाज की अनेकों संस्थाओं, गुरुकुलों और गौशालाओं को वे पल्लवित करते थे। वे स्वयं फोन करके पूछते थे कि आर्थिक स्थिति कैसी चल रही है? आज समाज में ऐसा निरहंकारी और निःस्वार्थ दानी मिलना अत्यन्त दुर्लभ है।
ईश्वर की इच्छा के आगे किसी का वश नहीं चलता, पर यह निश्चित है कि हमारे ट्रस्ट के साथ-साथ आर्यजगत् की अनेक संस्थाओं को उनकी कमी सदैव खलती रहेगी। उनकी सेवा की प्रवृत्ति और हर कार्य के प्रति उनकी सहयोग करने की भावना हमें हमेशा याद आएगी।
मैं श्री वैदिक स्वस्ति पन्था न्यास एवं समस्त वैदिक भौतिकी परिवार की ओर से माननीय गुप्ता जी को विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ। ईश्वर पुण्यात्मा को सद्गति प्रदान करे और उनके परिवार सहित हम सभी को इस अपार दुःख को सहने की शक्ति दे।
ओम् शम्।
—आचार्य अग्निव्रत
प्रमुख, वैदिक एवं आधुनिक भौतिकी शोध संस्थान
(श्री वैदिक स्वस्ति पन्था न्यास द्वारा संचालित)
भागलभीम, भीनमाल (राजस्थान)
अन्तर्राष्ट्रीय कृषि वैज्ञानिक का वेद विज्ञान मन्दिर में आगमन
आज हमारे संस्थान में अन्तर्राष्ट्रीय कृषि वैज्ञानिक डॉ. चन्द्रशेखर जी बिरादर, बेंगलुरु अपने जन्मदिन के अवसर पर पधारे और अपना जन्मदिन यज्ञ करके मनाया। उनके साथ प्रसिद्ध समाजसेवी श्री दिनेश कुमार जी जैन, बेंगलुरु का भी आगमन हुआ। डॉ. बिरादर नासा के अतिरिक्त संयुक्त राष्ट्र संघ के अन्तर्गत विश्व के लगभग 50 देशों में कार्य कर चुके हैं।
आप नंदी (बैल) आधारित कृषि के गहन अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिक हैं। इन्होंने अरब के रेगिस्तान एवं अमेरिका के अत्यन्त गर्म व मरुस्थलीय क्षेत्रों में गोवंश के गोबर से हरित क्रान्ति की है। अब आपने करोड़ों रुपए की आय एवं अन्तर्राष्ट्रीय जॉब को ठुकरा कर भारत में श्री दिनेश कुमार जी जैन के साथ मिलकर भारत के 6 लाख गाँव में नंदी आधारित कृषि के द्वारा किसानों को समृद्ध बनाने का अभियान प्रारम्भ किया है।
आपने संस्थान प्रमुख पूज्य आचार्य अग्निव्रत जी के साथ कृषि एवं वैदिक रश्मि सिद्धान्त पर व्यापक चर्चा की। इस चर्चा की वीडियो वैदिक फिजिक्स यूट्यूब चैनल पर शीघ्र ही अपलोड की जायेगी।