@mediacellsp कहानी गढ़ने और अपराध साबित करने में फर्क होता है। यदि आरोपों के समर्थन में ठोस साक्ष्य हैं, तो उन्हें जांच एजेंसियों और अदालत के सामने रखिए। बिना प्रमाण के आरोपों को तथ्य बताना केवल राजनीतिक प्रचार है।
@mediacellsp यदि इतने गंभीर आरोपों के ठोस प्रमाण हैं, तो कानूनी कार्रवाई का रास्ता अपनाइए। बिना प्रमाण के आरोप लगाना राजनीतिक बयान हो सकता है, लेकिन सत्य का प्रमाण नहीं।
@mediacellsp बार-बार बिना प्रमाण के एक ही आरोप दोहराने से वह सच नहीं बन जाता। यदि किसी के पास किसी व्यक्ति, संगठन या पदाधिकारी के खिलाफ ठोस साक्ष्य हैं, तो उन्हें संबंधित जांच एजेंसियों और न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिए।
@mediacellsp अगर आरोपों से ही सच तय होता, तो अदालतों और जांच की जरूरत ही नहीं पड़ती। लोकतंत्र में संविधान सर्वोपरि है और आस्था का सम्मान भी। राजनीतिक मतभेद हो सकते हैं, लेकिन बिना प्रमाण के गंभीर आरोप लगाना स्वस्थ लोकतांत्रिक संवाद को कमजोर करता है।
@mediacellsp भगवान के द्वार सबके लिए खुले हैं। लेकिन पूछना ये है कि क्या यह श्रद्धा का विषय है या चुनावी संदेश का? आस्था जितनी निजी और सच्ची होती है, उतनी ही उसे राजनीतिक प्रमाणपत्र की आवश्यकता नहीं होती।
@samajwadiparty दर्शन करने में किसी को रोक नहीं है, लेकिन जनता यह भी याद रखती है कि इतिहास में किसने क्या कहा, क्या किया और आज क्या कह रहा है। राजनीति में बदलते बयान हो सकते हैं, लेकिन जनता की स्मृति इतनी कमजोर नहीं होती।
@samajwadiparty संविधान और आस्था पर भाषण देने से पहले जनता यह भी पूछती है कि सत्ता में रहते हुए कानून-व्यवस्था, विकास और सुशासन के लिए क्या किया गया था। लोकतंत्र में आरोप लगाना आसान है, लेकिन जनता काम, नीतियों और परिणामों के आधार पर फैसला करती है।
@samajwadiparty अगर किसी भंडारे में जाने से ही राजनीतिक भविष्य तय होने लगे, तो चुनाव आयोग की नहीं, भंडारों की जरूरत पड़ जाए। लोकतंत्र में फैसला जनता करती है, किसी एक नेता की घोषणा नहीं।
@mediacellsp जनता को गुमराह करने के बजाय यह बताइए कि वर्षों से चली आ रही शहरी अव्यवस्था की जिम्मेदारी किन-किन सरकारों की रही है। किसी प्रशासनिक मुद्दे को चुनावी भय में बदल देना राजनीति है, लेकिन तथ्य नहीं। अगर कोई कार्रवाई होती भी है, तो वह न्यायालय के आदेश और लागू नियमों के अनुसार होती है।
@mediacellsp भगवान श्रीराम की आस्था को राजनीतिक आरोपों का मंच बनाना दुर्भाग्यपूर्ण है। यदि किसी के पास किसी भी अनियमितता के ठोस प्रमाण हैं, तो उन्हें जांच एजेंसियों और न्यायालय के सामने प्रस्तुत करना चाहिए, न कि पूरे संगठन या लाखों कार्यकर्ताओं को बिना सबूत अपराधी घोषित करना चाहिए।
@mediacellsp कुछ खबरों या घटनाओं के आधार पर पूरी पुलिस व्यवस्था और सीधे मुख्यमंत्री पर दोष मढ़ देना न तो न्यायसंगत है और न ही तथ्यात्मक। यदि कहीं किसी पुलिसकर्मी ने कानून तोड़ा है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन पूरे तंत्र को अपराधी घोषित करना केवल राजनीतिक बयानबाज़ी है।
@samajwadiparty जन्मदिन मुबारक हो, टोटी चोर!
उम्मीद है इस साल चोरी नहीं, बल्कि अच्छी आदतें और ईमानदारी तुम्हारे हिस्से आएँ। जीवन में सही रास्ता चुनो और खुशहाल रहो।
@mediacellsp राजनीति चमकाने के लिए भगवान के नाम पर भ्रम फैलाना बंद कीजिए। आरोप और दोष सिद्ध होने में फर्क होता है। जांच पूरी होने दीजिए, सच सामने आ जाएगा।
@mediacellsp सरकार से जवाब मांगना उचित है, लेकिन बिना जांच पूरी हुए मुख्यमंत्री, RSS या भाजपा पर आपराधिक आरोप लगाना जिम्मेदार सार्वजनिक विमर्श नहीं माना जा सकता।
@samajwadiparty शिक्षा पर चिंता अच्छी बात है, लेकिन जनता यह भी पूछती है कि जब अवसर था तब आपके समाधान क्या थे? केवल आरोपों से शिक्षा व्यवस्था बेहतर नहीं होती।