USP of food item should be Nutrition,Taste and cleanliness but here it puts gimmick in first place.
The food bloggers highlight the gimmick and people crowd in.They must stop it !
बिल्कुल सही बात है ।
पहले जब बैंक जाकर पैसा निकालना पड़ता था तब खर्चे पर अंकुश तो था।
अब जो पैसा हाथ ने है वो भी जा रहा और बैंक से भी उड़ रहा।खर्च कितना हो गया पता ही नहीं चलता और बचत पर भी प्रभाव पड़ता है ।
मैंने कोशिश की है कि छोटे payments डायरेक्ट कैश में किए जाएँ ।पाया कि ये संभव है ।जब साधारण लोग अभी छोटी दुकानों से कैश में ख़रीदारी करते हैं तब मितव्ययिता व्यावहारिक लगती है ।
जो बिल इत्यादि ऑनलाइन जमा होते हैं उनके अलावा छोटे खरीदारी के पेमेंट्स कैश में /कैश ऑन डिलीवरी करने से कुछ फ़र्क़ तो आया है ।
हम एक UPI संकट में हैं।
अब आप कहीं भी जाएँ , एक QR कोड आपका इंतज़ार कर रहा है, आपकी जेब खाली करने के लिए।
सब्ज़ीवाले, रिक्शावाले, पान की दुकान, महंगे शोरूम, हर कोई बस एक स्कैन की दूरी पर है।
ना कोई झिझक, ना कोई सोच-विचार। सिर्फ दो टैप… और पैसे निकल गए।
हमेशा ऐसा नहीं था।
पैसे का एक वज़न हुआ करता था। आप उसे महसूस करते थे।
दस रुपए के नोट की बनावट, नए ₹500 के नोट को खर्च करते वक़्त होने वाली हिचक…
बटुआ खोलना और दो बार सोचना, यही था ‘विवेक’।
ये छोटी-सी रुकावट ही हमें बचाती थी।
वो एक पल जिसमें हम खुद से पूछते थे: क्या ये वाकई ज़रूरी है??
UPI ने वो रुकावट हटा दी।
और उसके साथ ही, दिमाग का एक जरूरी भावनात्मक हिस्सा भी चला गया।
Behavioural scientists इसे कहते हैं "the pain of paying",
वो हल्की-सी मनोवैज्ञानिक चुभन, जो हमें सोच-समझकर खर्च करने में मदद करती थी।
कैश में वो दर्द था।
UPI में नहीं।
आप अपने महीने का खर्चा ट्रैक करिए और देखेंगे तो आपके होश उड़ जाएंगे।
बेवजह की फूड डिलीवरी, बेकार के लेन-देन, भूली हुई सब्सक्रिप्शन, अचानक किए गए खर्च…
सबकुछ चुपचाप जुड़ते रहे , और आप सुविधा के नशे में सोते रहे।
महीने में एक बार पैसा निकाल कर खर्च करने के लिए पत्नी को देने का मनोविज्ञान बहुत अच्छा था और मितव्ययिता पर आधारित था।
UPI हमें एक झूठा भरोसा देता है, कि हम खर्च कर सकते हैं।
क्योंकि पैसे जाते नहीं दिखते।
अफसोस महसूस नहीं होता।
जबकि अफसोस कोई दुश्मन नहीं, वो एक फीडबैक है।
एक स्मृति।
इसके बिना खर्च का कोई अर्थ नहीं बचता।
और बिना अर्थ के पैसा, जीवन से कनेक्शन तोड़ देता है।
सुविधा की एक कीमत होती है।
वो कीमत है, जागरूकता।
कैशलेस का मतलब अक्सर बेशऊर खर्च होता है।
और एक बार खोई हुई चेतना…
वापस लाना बहुत महँगा पड़ता है।
यह पोस्ट तकनीक को दोष देने के लिए नहीं है बल्कि मैं तो तकनीक को साध कर आगे चलने वाला व्यक्ति हूं।
बल्कि यह पोस्ट आपको याद दिलाने के लिए है कि लेन-देन की रफ्तार, सोच की गति से तेज़ नहीं होनी चाहिए।
UPI रहेगा, और रहना भी चाहिए...
लेकिन वह धीमी-सी आवाज़ भी रहनी चाहिए, जो कहती थी: "फिर से सोचो!"
क्योंकि असली संकट बटुए में नहीं है,
बल्कि खर्च और एहसास के बीच आती शून्य में है।
बहुत सारे लोगों को देखा है जिनका भगवान से बड़ा मित्रवत संबंध होता है। कभी रूठ गए तो मंदिर नहीं जाते, बात नहीं करते, यहां तक कि उलाहना भी देते हैं। भगवान भी ये सब प्रेम से आनंद लेते हैं। ये भक्ति का साख्य भाव है। इसमें भी प्रेम है। हम रूष्ट भी उसी से हो जाते हैं जिनसे आशा होती है।
Every time a food video appears ,the glove brigade arrives on the scene😄😄
Do we wear gloves at home while cooking?Do the vendors wearing gloves change these on every turn?Gloves will also essentially catch dirt and germs and can get dirty as well.What matters is clean hands.If this place were other than India, people wouldn’t bother about gloves.
Indore Crispy Sandwich recipe -
"A trip to Indore isn't complete without tasting this sandwich! One of the stars of the city's famous street food street, it's bursting with chatpata flavors that'll keep you coming back for more."
😋😋😋🥪
बिल्कुल सही बात है ।
पहले जब बैंक जाकर पैसा निकालना पड़ता था तब खर्चे पर अंकुश तो था।
अब जो पैसा हाथ ने है वो भी जा रहा और बैंक से भी उड़ रहा।खर्च कितना हो गया पता ही नहीं चलता और बचत पर भी प्रभाव पड़ता है ।
मैंने कोशिश की है कि छोटे payments डायरेक्ट कैश में किए जाएँ ।पाया कि ये संभव है ।जब साधारण लोग अभी छोटी दुकानों से कैश में ख़रीदारी करते हैं तब मितव्ययिता व्यावहारिक लगती है ।
जो बिल इत्यादि ऑनलाइन जमा होते हैं उनके अलावा छोटे खरीदारी के पेमेंट्स कैश में /कैश ऑन डिलीवरी करने से कुछ फ़र्क़ तो आया है ।
@choga_don आम आदमी भी आजकल टैक्सी app से टैक्सी मंगवा लेता है लोकल teavelling /out station के लिए ।पैसे भी इतने नहीं लगते हैं ।मुंबई में तो बहुत पहले से टैक्सी सिस्टम बहुत सुदृढ़ है ।ये paps को पैसे दे कर उनको साथ ले के ऑटो में घूम रहे हैं 😄🤭
इसे बघार लगाना कहेंगे ।घरों में हम लोग पुराने समय से मिट्टी के दिए में घी /तेल कड़का कर उसमें जीरा/राई/हींग डाल कर तड़का /बघार तैयार कर लेते हैं और दाल,रायता आदि बघारते हैं ।बड़े रेस्टोरेंट अलग विधि से smoked dishes बनाते हैं ।ये quantity बहुत ज़्यादा है इसलिए ईंट का उपयोग किया गया है शायद क्योंकि कोई उपयुक्त पात्र उपलब्ध नहीं होगा ।