मैं लड़ चुका हूँ, इसलिए बोल रहा हूँ।
जीवन में संघर्ष तो होगा, पर सही संघर्ष चुनो।
दुनिया से लड़ना आसान है, खुद से लड़ना कठिन।
छोटी-छोटी लड़ाइयों में ज़िंदगी मत हारो।
सबसे बड़ा युद्ध अपने विरुद्ध है।
जो खुद पर जीत गया, उसे दुनिया नहीं हरा सकती।
जो खुद पर जीत गया, उसे कोई हरा नहीं सकता।
~ आचार्य प्रशांत
अगला वायरस
ना जाने कितनी बड़ी से बड़ी आपदाएँ हैं, जो इन ग्लेशियर्स के पिघलने के कारण बस अब हमारा इंतज़ार कर रही हैं। और हम बेखबर हैं। हम ऐसे हैं जैसे कि सब कुछ ठीक चल रहा है - बिजनेस ऐज़ यूज़ुअल।
ये जो गफ़लत है, ये हमें बहुत-बहुत भारी पड़ने वाली है।
समाज में रहना मजबूरी है या चुनाव?
हम अक्सर कहते हैं, “मुझे तो समाज में रहना ही है,” जैसे यह कोई मजबूरी हो। लेकिन क्या कभी विचार किया कि समाज माने क्या? क्या समाज में रहना ही एकमात्र विकल्प है, या चुनाव भी उपलब्ध है? अगर चुनाव है, तो समस्या क्या है?
गणेश चतुर्थी
गणेश चतुर्थी, मैं देख रहा था कि कैसे गणेश प्रतिमाओं का विसर्जन होता है। उसमें एक बड़ी भारी मैंने देखी प्रतिमा, उसका विसर्जन कैसे किया जा रहा था। उसको पुल से नीचे फेंक रहे थे। पुल से नीचे फेंक रहे थे, वो तो है ही एक बहुत कुरूप बात। लेकिन जिनको वक्रतुंड महाकाय बोला जाता है, उनके एब्स दिखा रखी थी।
गणपति के रूप के वर्णन में ही यह निहित है कि उनका पेट निकला हुआ है। लेकिन भक्त ने अपनी छवि उनके ऊपर लाद दी। बोले, आजकल तो एब्स होना माँगता। तो गणपति एब्स और यह एक भक्त ने नहीं किया होगा। इतने लोग आए होंगे प्रतिमा का दर्शन करने, प्रणाम करा होगा, नमन करा होगा। किसी ने भी आपत्ति नहीं करी कि वक्रतुंड महाकाय के एब्स कहाँ से आ गई?
क्योंकि मामला बहुत सीधा है। हम जैसे होते हैं, वैसा ही हम अपने भगवान को भी रख देते हैं। अपनी पसंद-नापसंद के अनुसार। जैसे जब कोई रेसिपी होती है, तो उसमें अंत में लिखा होता है, नमक स्वादानुसार। सब कुछ बता देंगे, अंत में नमक स्वादानुसार। वैसे ही हमारा रहता है - नमन स्वादानुसार। जहाँ स्वाद आया, वहाँ नमन कर लिया।
जन्माष्टमी और जुआ
जिन्हें जुआ खेलना ही है, वो त्योहार को भी जुआ खेलने का बहाना बना लेंगे। जिन्हें मांस खाना ही है, वो त्योहार को भी बकरा काटने का बहाना बना लेंगे। त्योहार ने नहीं कहा है कि तुम यह सब उपद्रव करो। तुम्हें करना है तो तुम कोई ना कोई तरीका निकाल लोगे कि कामना कैसे पूरी करूँ।
कृष्ण को नहीं, खुद को जगाइए।
हर पर्व आपको यही बताने के लिए आता है कि बदलो, रुको, देखो, तुम ज़िंदा नहीं हो, उठ जाओ, जी जाओ। कृष्ण का भी यही संदेश है।
कृपा करके कृष्ण को न झुलाएँ, उनके लिए पालना न बनाएँ। अरे, कृष्ण को नहीं आवश्यकता इन सब चीज़ों की। अपनी ओर देखिए कि हम कैसे हैं।
और जब आप अपनी ओर देखते हैं ना, तब आपकी आँखों के पीछे जो होता है, उसे कृष्ण कहते हैं। बात समझ में आ रही है?
कृष्ण वो स्रोत हैं जो आपको ताक़त देते हैं कि आप बिना डरे देख पाएँ। आप एक बार फ़ैसला तो करिए कि सच्चाई में जीना है, फिर जो ताक़त अपने आप उभरती है, उस ताक़त का नाम कृष्ण है।
कृष्ण आँखों के आगे कम, आँखों के पीछे ज़्यादा होते हैं। कृष्ण सत्य हैं।
ये हैं राम
युवराज थे, अपना राज्य मिलने वाला था, 14 साल तक भटकते रहे और सोने की लंकाएँ जीत ली, उसको भी फिर छोड़ दिया।
और एक मैं हूँ कि मुझसे आधा ग्राम चाँदी भी ना छोड़ी जाए। लाज आनी चाहिए।
इसलिए नहीं कि तुमने आरती उतार दी और कह दिया, राजा रामचंद्र की जय, और वापस आ गए जैसे थे वैसे ही। वापस आ गए, नहीं।
वह तुम्हें कुछ याद दिलाने के लिए हैं। वह तुम्हें तुम्हारी क्षुद्रता का यथार्थ और महानता की संभावना याद दिलाने के लिए हैं।
यह है मूर्ति पूजा।
कृष्ण या मनोकामना
मनोकामना पूरी करनी है, मूर्ति के पास जाऊंगा। प्रताड़ित हूं, संवेदना, सहानुभूति चाहिए। ऐसा महसूस करना चाहता हूँ, किसी का हाथ है मेरे सर पर। मूर्ति के पास जाऊंगा।
इस संसार में सब तरफ से मार खा के मैं किसी और लोक की कल्पना करना चाहता हूं, मूर्ति के पास जाऊंगा। इसमें मूर्ति की क्या गलती है?
हिमालय की बर्बादी
हर हिमालयन डिजास्टर के बाद एक ही कहानी चलती है - जांच बैठती है, रिपोर्ट बनती है, सायरन लगाने का वादा होता है, बजट घोषित होता है।
और ठीक उसी समय उसी पहाड़ पर सड़कें चौड़ी की जाती हैं, हेलीपैड बनते हैं, रेलवे ऊपर चढ़ाई जाती है।
एक हाथ से हम पहाड़ का इलाज लिखते हैं और दूसरे हाथ से उसी के घाव को रेतते हैं।
समझिए कि हिमालय है क्या।
यह दुनिया के सबसे युवा पहाड़ हैं। भूगर्भ की दृष्टि से अभी बच्चे हैं - कमजोर, कच्चे, अनगढ़े।
इन्हें जोड़कर रखती है बर्फ, ग्लेशियर और परमाफ्रॉस्ट (यानी जमी हुई जमीन), जो ढलानों पर सीमेंट का काम करती है।
अब उस सीमेंट को गर्मी पिघला रही है, यानी पहाड़ पहले से ही कमजोर है।
और ऐसे में हम क्या कर रहे हैं? पर्यटन का मेला, चौड़े हाईवे ताकि SUV सीधी चोटी तक चढ़े, चार्टर्ड बसें और जैसे इतने से भी ना हो, उनके लिए पहाड़ काटकर हेलीपैड!
तीर्थ यात्री पहले पैदल चलता था, उसकी बात अलग है।
पर यह वो व्यवस्था है जो बिना चले, बिना श्रम के, बिना श्रद्धा के, भारी भीड़ को बेहद संवेदनशील इलाके में लाकर भर रही है।
और इस सब का नाम रखा है 'विकास'।
पिघलते पहाड़ में बनाई गई हर एक नई सड़क पहले से घायल शरीर पर एक और घाव है।
और हम उसी को न्योता दे रहे हैं - आओ आओ, अपनी गाड़ियों पर। नदी है, बर्फ है, मैगी है, मौज है!
तो पहला ईमानदार कदम क्या होगा?
टोल गेट पर सच बोलना। हिमालय सस्ते पर्यटन की जगह नहीं है।
जो ऊपर जाएगा वो चढ़ाई की पूरी कीमत चुकाएगा, और पूरी कीमत में वह कीमत भी शामिल है जो पहाड़ चुकाता है।
हर चढ़ती सड़क पर भारी एंट्री फी हो, हर चढ़ते वाहन पर भारी टोल टैक्स हो।
यह दंड नहीं, न्याय है।
कोई कहेगा - यह तो तीर्थ को अमीरों तक सीमित करना हो गया?
नहीं, यह तीर्थ को तीर्थ रहने देना हुआ।
देवभूमि कहते हैं ना इन पहाड़ों को, देवताओं का घर।
तो सोचिए, घर में घुसने की मशीन बनाना भक्ति है या घर को गिरने से बचाना?
आज का असली धर्म हिमालय पर चढ़ना नहीं है, उसे बचाना है।
यह समय पहाड़ चढ़कर शेखी बघारने का नहीं है, नम्र होकर उसे बचाने का समय है।
वरना यह पहाड़ बंजर चट्टानों के विशाल स्मारक बन जाएंगे - गिरते हुए स्मारक, क्योंकि जो बर्फ इन्हें जोड़े रखी थी वही नहीं रहेगी।
आओ आओ, यही विकास है?
नहीं, यह मृत्यु है।
यह ऐसी व्यवस्था है जो बिना किसी मेहनत, विचार या समझ के भारी भीड़ को बेहद संवेदनशील इलाके में ला-लाकर भर रही है।