Hahahahaha... this is lovely 😁 Made me smile! Terrific use of all three brands, blending them into a conversation, and particularly the cameo by District in the end.
Whenever I feel sad about youth taunting, or abusing the security forces, I remember this video.
During Op Sindoor last year, the Chandigarh administration called for Civil Defence Volunteers as the city's second line of defense for emergency and disaster response. Thousands of young men and women turned up, purely as unpaid volunteers.
The turnout far exceeded expectations. As the crowd spilled onto the roads shouting pro-Army and anti-Pakistan slogans, police had to step in, call reinforcement and open a parallel site at Tiranga Urban Park to handle the registration and orientation rush.
This reflects the true spirit of our youth and their deep respect for the country and the armed forces. For every "We're GenZ, we will not tolerate this nonsense. They (soldiers) get paid from our tax money, they are not more important than us" individual, there are lakhs of youth ready to step up.
@PSPCLPb no electricity in mohalla Gobindgarh from last hour or so
This after there was no supply whole day and just around 20-30 min of supply resumed in evening… when tried to call line goes buzy always
Please support to check and resume
@BhagwantMann@ArvindKejriwal
उनका नाम मोहम्मद आमिर खान था।
20 फरवरी 1998 की रात, उनकी मां ने उन्हें पुरानी दिल्ली में दवा लेने भेजा था। वह सिर्फ 18 साल के थे।
लेकिन वह कभी दुकान तक नहीं पहुंच पाए।
सादे कपड़ों में कुछ लोगों ने रास्ते में उन्हें रोक लिया। आमिर को नहीं पता था कि वे पुलिस वाले हैं। उन्हें एक सुनसान इमारत में ले जाया गया। सात दिनों तक गैरकानूनी हिरासत में रखा गया। यातनाएं दी गईं। खाली कागज़ों पर जबरन हस्ताक्षर करवाए गए।
फिर दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल ने उन्हें अदालत में पेश किया और 1996 से 1997 के बीच दिल्ली, गाज़ियाबाद, रोहतक और सोनीपत में हुए 19 बम धमाकों का आरोपी बना दिया।
मीडिया के सामने उन्हें आतंकवादी घोषित कर दिया गया।
परिवार को कोई सूचना नहीं दी गई। उनके घरवाले कई दिनों तक थानों के चक्कर लगाते रहे।
आमिर ने 14 साल जेल में बिताए। टॉर्चर सहा। एकांत कैद झेली। अदालत में एक-एक कर केस टूटते गए, सबूत फर्जी साबित होते गए।
2012 में उन्हें 19 में से 17 मामलों में बरी कर दिया गया। बाकी दो केस लंबित रहे। तब तक वह जेल में उतना समय काट चुके थे, जितनी सजा सभी मामलों में दोषी साबित होने पर भी नहीं होती।
जनवरी 2012 में वह जेल से बाहर आए।
लेकिन तब तक उनके पिता की मौत हो चुकी थी। उनकी मां को इतना गहरा स्ट्रोक आया था कि वह अपने बेटे को पहचान तक नहीं पाईं।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने दिल्ली सरकार को उन्हें मुआवज़ा देने का आदेश दिया।
राशि थी सिर्फ 5 लाख रुपये।
दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल के किसी अधिकारी पर कार्रवाई नहीं हुई। कोई निलंबन नहीं। कोई जांच नहीं।
आमिर ने अपनी कहानी पर एक किताब लिखी
“Framed As A Terrorist: My 14 Year Struggle To Prove My Innocence”
आज वह उन लोगों की मदद करते हैं जिन्हें झूठे मामलों में फंसाया गया है।
भारत ने उन्हें 5 लाख रुपये दिए…
और उसे इंसाफ कह दिया।
ऐसी सच्ची कहानियों के लिए फॉलो करें, जो कभी सुर्खियां नहीं बनतीं।
आपका नाम राजू नारायणस्वामी है।
1991 में आपने UPSC में AIR 1 हासिल की थी। पूरे देश में पहला स्थान।
आप IIT मद्रास से कंप्यूटर साइंस ग्रेजुएट थे। MIT ने स्कॉलरशिप ऑफर की। लेकिन आपने ठुकरा दी। आपने कहा — IIT की पढ़ाई गरीब भारतीयों के टैक्स से हुई है, अब देश को लौटाना मेरा कर्तव्य है।
फिर आपने IAS जॉइन किया।
पहली पोस्टिंग में एक बिल्डर धान के खेत को भरना चाहता था। 60 गरीब परिवारों ने कहा इससे उनका इलाका डूब जाएगा। आपने अनुमति नहीं दी। आपका ट्रांसफर हो गया।
केरल के PWD मंत्री के बच्चों के अवैध जमीन सौदे उजागर किए। मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा। आपका ट्रांसफर हो गया।
Coconut Development Board में भ्रष्टाचार पकड़ा। अफसर सस्पेंड हुए। आपका ट्रांसफर हो गया।
सिविल सप्लाई विभाग में भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई शुरू की। जांच पूरी होने से पहले हटा दिए गए।
34 साल की सेवा में 32 ट्रांसफर।
एक बार आपने सरकार को चिट्ठी लिखकर पूछा “जब मुझे कोई काम ही नहीं दिया जा रहा, तो मुझे वेतन क्यों दिया जा रहा है?”
2025 में सुप्रीम कोर्ट ने उनकी Chief Secretary पदोन्नति की याचिका खारिज कर दी।
AIR 1 होने के बावजूद।
30 साल की ईमानदार सेवा के बावजूद।
उन्होंने 34 किताबें भी लिखीं। साहित्य अकादमी पुरस्कार जीता। कानून में PhD की।
MIT उन्हें अमेरिका देना चाहता था।
उन्होंने भारत के लोगों को चुना।
लेकिन भारत की व्यवस्था ने उन्हें 34 साल तक सिर्फ एक संदेश दिया
“ईमानदारी की कीमत सब कुछ खोकर चुकानी पड़ती है।”
और उन्होंने हर बार वो कीमत चुकाई।
ऐसी कहानियों के लिए फॉलो करें, जिन्हें भारत की सुर्खियाँ कभी जगह नहीं देतीं।
Her name is Aradhana Prakash.
She was 14 years old in August 1990. Ruchika Girhotra’s best friend. A fellow tennis trainee at the Haryana Lawn Tennis Association.
She was in the room when S P S Rathore called them both to his office. He sent her out on a pretext. When she returned she found Ruchika distressed.
She was the sole eyewitness. The only person who could testify to what happened that day.
For 19 years Rathore tried to silence her.
He filed civil case after civil case against her family. Cases against journalists covering the story. Cases against the lawyers fighting it.
Ruchika died in December 1993. Her father and brother were harassed so badly they had to leave Panchkula entirely.
Aradhana and her parents stayed.
Her father Anand Prakash and mother Madhu Prakash attended over 400 hearings across 19 years. Every single one. They never settled. They were never intimidated.
The court found Aradhana’s testimony unimpeachable. The judgment relied on her as the sole witness to convict Rathore in December 2009.
When Rathore was attacked outside court by a member of the public she went on television and asked people not to take the law into their own hands. She said that for 19 years they had always worked within the law.
Her father Anand Prakash died of prostate cancer in January 2018 aged 74. He had attended more than 400 hearings. He lived long enough to see Rathore convicted. He did not live long enough to see justice feel complete.
Yesterday, many people here read the story of Ruchika Girhotra for the first time.
Most of them had never even heard her name before.
They should.
Follow for stories India deserves to remember.
उसका नाम रुचिका गिरहोत्रा था।
वह 14 साल की थी। हरियाणा के पंचकूला की एक टेनिस खिलाड़ी।
12 अगस्त 1990 को वह S.P.S. राठौड़ से मिलने उनके ऑफिस गई। वह हरियाणा लॉन टेनिस एसोसिएशन के प्रमुख और आईजीपी थे। उन्होंने उसके पिता से वादा किया था कि वह उसे खास कोचिंग दिलवाएंगे।
जैसे ही उसकी दोस्त कमरे से बाहर गई, उसने रुचिका के साथ छेड़छाड़ की।
तीन दिन बाद परिवार ने शिकायत दर्ज कराई।
इसके बाद प्रताड़ना शुरू हुई।
राठौड़ ने उसे स्कूल से निकलवा दिया। उसके पिता को बैंक की नौकरी से सस्पेंड करवा दिया गया। उसके भाई आशु पर छह झूठे केस दर्ज किए गए। परिवार का घर बिकवा दिया गया।
परिवार को शिमला के बाहरी इलाके में जाकर मिट्टी भराई का काम करके गुज़ारा करना पड़ा।
28 दिसंबर 1993 को, जब आशु को हथकड़ी लगाकर मोहल्ले में घुमाया गया, कुछ ही दिनों बाद रुचिका ने ज़हर खा लिया।
अगले दिन उसकी मौत हो गई। वह सिर्फ 17 साल की थी।
उसी रात राठौड़ ने पार्टी की।
उसने रुचिका के पिता को उसकी लाश देने से मना कर दिया, जब तक कि वे खाली कागज़ों पर साइन न करें। बाद में उन्हीं कागज़ों से झूठी पोस्टमार्टम रिपोर्ट तैयार की गई।
पुलिस जांच में FIR की सिफारिश हुई, फिर भी राठौड़ को प्रमोशन मिलते रहे।
1999 में वह हरियाणा का डीजीपी बन गया।
यह केस 19 साल चला।
40 से ज्यादा स्थगन और 400 से ज्यादा सुनवाई।
दिसंबर 2009 में उसे छेड़छाड़ का दोषी ठहराया गया।
सिर्फ 6 महीने की सजा और ₹1000 का जुर्माना।
बाद में सजा 18 महीने की हुई।
2016 में सुप्रीम कोर्ट ने दोष कायम रखा, लेकिन सजा पहले ही काटी हुई मानकर उसे छोड़ दिया गया।
जिस जज ने आत्महत्या के लिए उकसाने का आरोप जोड़ने की कोशिश की, उसे समय से पहले रिटायर कर दिया गया।
जिस जज ने ये आरोप खारिज किए, वह रुचिका के परिवार का पड़ोसी था और संपत्ति विवाद में शामिल था।
बाद में S.P.S. राठौड़ को पंचकूला के गणतंत्र दिवस कार्यक्रम में VIP गेस्ट के रूप में बुलाया गया।
रुचिका 14 साल की थी जब उसके साथ छेड़छाड़ हुई।
17 साल की थी जब उसने दम तोड़ा।
ऐसी कहानियां जिन्हें भारत को याद रखना चाहिए।
@tiyadec07@GabbbarSingh Its not only delhi mumbai… anyone who has to leave home for opportunity at place where they cant come bk home same day is almost similar story… and i wonder is there a way to change it?
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