जिस देश में चाण्डाल, जो समाज का सबसे पतित वर्ग हुआ करता था, भी इतना सामर्थ्य रखता था कि जब स्वयं राजा हरिश्चंद्र बिकने को खड़े हुए तो चाण्डाल ने मोल लगाया। वहाँ हमें हमारे शास्त्रों के प्रति जातिय भेद और वैमनस्य के लिए झूठा अपराधबोध कराया जाता है।
बहुत दुखद और चिंतनीय।
The side that believes it's upholders enjoying socio-political power and influence will result in dark days will always lose to the side that believes it's upholders having power will result in a glorious sunrise.
No wonder the children from conservative houses become liberal.
कोई मुझे समझाएगा कि चंपत और वो गोविंद देव गिरि निर्दोष कैसे हैं?कोष में लूट हुई है तो कोषाध्यक्ष जिम्मेदार कैसे नहीं है?निर्लज्जता ऐसी है कि कह रहा है मेरे पास चेकबुक भी नहीं रहती, तो फिर तू कोषाध्यक्ष झुनझुना बजाने के लिए बना था पार्टी के चाटुकार? @HindiFirstLang@old_cricketer
@Vats1080 सोचो किसी हाइवे के लिए 10 करोड़ के पेड लगने, वर्तमान में उन्हें किसी प्री एग्जिस्टिंग जंगल मे 10 लाख के पेड़ लगाकर बाकी डकार लेते हैं क्योंकि जंगल मे पहचान मुश्किल है कि कौनसा पौधा लगाया,कौनसा स्वतः उगा
इज़की जगह 8 करोड़ की फ्रेश धरती लेकर 2 करोड़ के इंडिजेनस पेड़ लगाओ
पता तो लगे
@Vats1080 हाइवे बनाने के लिए जितने पेड़ कटे/ जितना कार्बन फुटप्रिंट हुआ इतने ही पेड़ वर्तमान में सरकार पुराने जंगलों में लगवाती है, नए पौधे पुराने जंगल में 10 लगाकर 100 गिने जाते हैं
कम्पनियों को बोलो के जहां हाइवे बना वहां इतना बीघा जमीन खरीदकर उसमे पेड़ लगाओ
फ्रेश जमीन पर प्रोगेस दिखेगी
@Vats1080 पेड़ चाहे कम लगाओ लेकिन फॉलोअप ले सको उन जगह के लगाओ
बिन केयर के उगने वाले लगाओ
पिलखन,बरगद,पीपल,डेग लगाओ जिन्हें एकबर गाड़ दो जमीन में तो 90% पेड़ मरेंगे नही
35 करोड़ की जगह 5 करोड़ पेड़ लगाओ
शेष 30 करोड़ पेड़ की जगह उतने धन के सीड बम फिंकवाओ सड़को के किनारे
@HindiFirstLang भाई आप बताओ क्या उपाय है इसका, सरकार तो पर्यावरण संरक्षण के नाम पर ढोंग करती है और आम आदमी कितने ही पेड़ लगाकर उनका संरक्षण करता है सबको पता है।
फिर वृक्षारोपण अभियान चलाया जाएगा,हर साल की तरह फिर नया कीर्तिमान भी बनेगा।सारे विभाग काम पर लगाए जाएँगे,लोग भी पेड़ लगाएँगे।लेकिन कोई बताओ कि इस सारी जद्दोजहद का फ़ायदा क्या है जब लगाए हुए करोड़ों पेड़ों में से ज़्यादातर तो जीवित ही नहीं बचते।फिर ये क्या तमाशा होता है हर साल।
अबे असल देहात का खेल तो फुटबॉल ही है जिसमें कोई बल्ला,पैड आदि नहीं लगता। गिनती की दो-चार चीज़ें लगती है- एक गेंद, मैदान और बस खिलाड़ी। Minimum equipment sport है जोकि विश्व में गाँव-देहात के बच्चे आसानी से खेल पाते थे इसलिए इतना पापुलर खेल है पूरी दुनिया में।
@HindiFirstLang@old_cricketer मैंने थोड़ी कहा कि वो दोनों निर्दोष है। बल्कि मैं तो पूरे दोनों-तीनों संगठनों को बराबर का दोषी मान रहा हूँ। लूट में सारे हिस्सेदार हैं, इतना सारा निर्माण जो एक संगठन ने देश में हाल के सालों में करवाया है सब लूट से है।
साले बेटीचोद के पिल्ले, लेकिन तेरी अम्मा तो शोषित वंचित पीड़ित थी न हरामखोर? एक तरफ शोषण का रंड रोना करता है, कहता है कि ठाकुरों ने तुम्हारी अम्मा खोद दी थी, थन टैक्स ले लिया और फिर ये सब बकवास। दोनों तरह के झूठ एक साथ बस नीलमानव ही बोल सकते हैं।
सुवर वर्ण में जन्मा अजीत कह रहा है, 3 हज़ार साल से पानी नहीं पिया तो इतने सालों से जीवित कैसे रहे ?
इस चाइनीज़ चिलगोदे को कोई जाकर बता दे कि दलित पानी नहीं दूध पीकर जीवित रहे हैं, वह दूध इसकी पूर्वज महिलाएं देती थी,
रोज दो ग्लास दूध पीकर दलित तरोताज़ा रहते थे, हांडी में भी दलित दूध भरकर घुमा करते थे 🔥🔥