A total of 77,909 HPV vaccine-related AE reports were analyzed, with 68.4% involving females and 48.7% affecting individuals under 18. Serious AEs accounted for 11,659 reports, with headache and fatigue being the most common. Syncope was the most frequent signal, while postural orthostatic tachycardia syndrome (POTS) exhibited the strongest signal strength. Approximately 90% of AEs occurred within 30 days post-vaccination. Among vaccine types, HPV4 had the highest number of reports, and intramuscular injection was the most common administration route.
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बंदूकों से डराकर लगाए जा रहे है स्मार्ट मीटर l
भारत के लोगों, जागो, सरकार गुंडागर्दी की सारी हदे पार कर चुकी है।
ये सरकारें NWO के हाथों बिक चुकी हैl
भारत को गुलामी से मुक्त करने के लिए एक और बड़े संग्राम की जरूरत है l यह तीसरा स्वतंत्रता संग्राम अंतिम होगा l विजय हमारी होगी l
जरा विचार कीजिए
अभी तो सिर्फ Draft Adopt हुआ है, Signature या Ratification नहीं — फिर डर क्यों फैलाया जा रहा है? विचार करने हेतु इस पोस्ट को व्यक्तिगत अपने ऊपर लेने की कोई जरूरत नहीं है।
(1) अब तक तो सिर्फ draft adopt हुआ है, signature या ratification नहीं — फिर डर क्यों?”
जवाब: जब कोई विषकंठी सर्प फन फैलाता है, तो क्या हम तब तक प्रतीक्षा करें जब तक वह डस न ले? इतिहास गवाह है — नाजी जर्मनी ने जब "Nuremberg Laws" का ड्राफ्ट तैयार किया, तो यह महज "नीति" थी, sign और ratify बाद में हुआ। लेकिन यह "ड्राफ्ट" ही बाद में लाखों यहूदियों की कब्र का कारण बना। सन 1974 में — अमेरिका में Rockefeller Commission Report का पहला ड्राफ्ट CIA की मानसिक नियंत्रण तकनीकों (MK-Ultra) पर था। उसके sign होने तक तो सब कुछ "Adopt" ही था। लेकिन उस ‘adoption’ के बाद CIA ने हज़ारों नागरिकों पर non-consensual प्रयोग कर दिए — जिनमें LSD इंजेक्शन से लेकर electroshock torture तक शामिल था।
भारत में भी — 1984 में भोपाल गैस त्रासदी के बाद, जो समझौता अमेरिका की Union Carbide से "policy level" पर हुआ था, वह शुरू में सिर्फ सहमति का ड्राफ्ट था। Signature बाद में हुआ, लेकिन तब तक 20,000 से ज़्यादा लाशें मिट्टी में समा चुकी थीं।
तो प्रश्न यह नहीं है कि Signature हुआ या नहीं, प्रश्न यह है कि तयशुदा दिशा क्या है। और जब दिशा जनविरोधी, असंवैधानिक और वैश्विक तानाशाही की ओर हो — तो चुप्पी पाप है, चेतावनी धर्म है।
(2) आप आधी अधूरी जानकारी देकर समाज को डरा रहे हैं?
जवाब: जिसे आप “डराना” कह रहे हैं, बरसात से पहले त्रिपाल का इंतजाम उसे पुरखे “चेतावनी” कहते थे। आपके अपने शब्दों में — “अभी Signature नहीं हुए” — तो क्या हम तब जागेंगे जब बच्चों के गले में Digital Health ID का पट्टा बंध जाएगा? जब हर व्यक्ति की यात्रा पर WHO की मंजूरी लगेगी? क्या तब सच बताना अधूरी जानकारी नहीं कहलाएगा? आपको डर लग रहा है — लेकिन डर उस चेतावनी से नहीं, बल्कि उस सच्चाई से है जो वर्षों तक दबाई गई।
(3) “आप जैसे बहुत से लोग चुप क्यों हैं?”
जवाब: यदि कोई चुप है, तो शायद वह तथ्यों को इकट्ठा करने में लगा है। हर योद्धा तुरन्त तलवार नहीं खींचता — कुछ घावों की गिनती करता है, तो कुछ शत्रु की चालें पढ़ता है। प
(4) “हम सब Treaty के विरुद्ध हैं (यहां आपकी बात में विरोधाभास है), पर एक व्यक्ति समाज को दीमक की तरह खा रहा है?
जवाब: यदि एक व्यक्ति इतना ताक़तवर हो गया कि वह अकेले ही समाज का विश्वास खा रहा है, तो प्रश्न उस व्यक्ति से अधिक बाकियों की निष्क्रियता पर उठता है। दीमक का दोष देने से पहले लकड़ी को सींचने वालों का आत्मनिरीक्षण भी आवश्यक है। यदि वो व्यक्ति गलत है,(मेरा यहां व्यक्तिगत रूप से किसी व्यक्ति को एक्सपोज या उसकी प्रशंसा करना नहीं है ना ही उसका पक्ष यह मेरे स्वतंत्र विचार है) तो आपके पास भी सोशल मीडिया है, संविधान है, कलम है — उसके प्रचार का तोड़ तथ्यों से करो, न कि कुंठा से।
(5) “आप लोग उसका विरोध क्यों नहीं करते?
जवाब: यदि कोई व्यक्ति झूठ फैला रहा है, तो हमें उसके झूठ का वैज्ञानिक खंडन करना होगा — व्यक्तिगत नहीं। वरना यह बहस विचारों की नहीं, ईगो की कुश्ती बन जाएगी(और बन भी गई है)। हम विरोध करेंगे — पर शास्त्रार्थ से, तथ्य से, और तर्क से। निंदा से नहीं, व्यक्तिवादी विष-वमन से नहीं।
अब एक अंतिम ऐतिहासिक चेतावनी:
1933: हिटलर का पहला "Enabling Act" सिर्फ एक “policy adoption” था। उसके बाद जर्मनी ने लोकतंत्र खो दिया।
1947: CIA के Mental Control programs (MK-Ultra) का पहला “proposal” सिर्फ draft था — Signature बाद में हुए। तब तक लोगों की मानसिक आज़ादी छीन ली गई।
2020: COVAX नामक WHO initiative भी “non-binding” policy थी — पर उसी के बहाने लाखों लोगों को अनजान टीकों की ज़बरदस्ती दी गई। इसलिए आज चेताना जरूरी है — Signature का इंतज़ार आत्मघात होगा। जो Treaty अभी केवल “adopt” हुई है, वही कल आपका Constitution replace कर सकती है। और जब WHO आपके घर की आहट तक नापने लगेगा, तब पूछिएगा — “क्यों नहीं बताया पहले?” हम इसलिए बता रहे हैं, ताकि कल आपकी आंखों में आंसू नहीं, आग हो।
1. Nazi Germany – “अभी तो क़ानून पास हुआ है” तब कहा गया था: "Enabling Act अभी तो पास हुआ है, उससे क्या होगा?" पर 6 महीने में: हिटलर ने पूरे जर्मनी में तानाशाही थोप दी — प्रेस, कोर्ट, चुनाव सब खत्म। Pandemic Treaty का adoption draft भी वैसा ही enabling framework है — आज दस्तख़त, कल हुक्मनामे। जो इसे "अभी तो sign हुआ है" कह रहे हैं, वो 1933 के जर्मनी को गूगल कर लें।
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राज्यसभा सांसद श्री अनील प्रसाद हेगड़े को 2024 में WHO की वैश्विक महामारी संधि पर बोलते हुए सुनिए जहाँ उन्होंने इस संधि को लेकर हमारी राष्ट्रीय संप्रभुता के लिए गंभीर खतरे की बात उठाई
https://t.co/11pCWCK1DG
इस संधि के खतरों को लेकर श्री हेगड़े द्वारा की गई पत्राचार यहाँपढ़ें -
https://t.co/773NqlJv6U
प्रख्यात ब्रिटिश-भारतीय हृदय रोग विशेषज्ञ डॉअसीम मल्होत्रा ने भी यह कहा कि भारत को WHO से बाहर निकल जाना चाहिए -
https://t.co/crsEBH6MQj
सभी विदेशी पेयों का बहिष्कार करो और नींबु पानी व गन्ने का जूस, फ्रूट जूस आदि पेय पीना चालू करो सेहत भी अच्छी रहेगी हमारे किसान भी समृद्ध होंगे और हमारा देश भी समृद्ध होगा |
#deepgurukulam