बंगाल में नजरबंदी शिविरों की घोषणा के तुरंत बाद, अवैध बांग्लादेशी अपने घर लौटने के लिए बांग्लादेश की सीमा की ओर बढ़ रहे हैं।
अगला कदम टीएमसी सरकार के शासनकाल में जारी किए गए अवैध जन्म प्रमाण पत्रों की पहचान करना है।
इससे एक बड़ी राष्ट्रीय समस्या का समाधान हो सकता है।
��ारत माता के वीर सपूत चंद्रशेखर आजाद के बलिदान दिवस पर उन्हें मेरी आदरपूर्ण श्रद्धांजलि। उन्होंने मां भारती को गुलामी की बेड़ियों से आजाद कराने के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, जिसके लिए वे सदैव स्मरणीय रहेंगे।
महान क्रांतिकारी वीर सावरकर जी को उनकी पुण्यतिथि पर सादर नमन। देश को गुलामी की जंजीरों से मुक्त कराने के लिए उन्होंने अपना जीवन समर्पित कर दिया। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व हर पीढ़ी को राष्ट्रसेवा के लिए प्रेरित करता रहेगा।
मुस्लिम 85% हैं, जाटव 15%, हमारी यात्रा रोक दी, हम चंद्रशेखर के पास गए उन्होंने मना कर दिया, क्यों? क्योंकि सामने मुस्लिम हैं, ब्राह्मण होते, ठाकुर होते तो चंद्रशेखर वही खड़े रहते : अंकित कुमार
यही है इनकी असलियत। नहीं भरोसा तो एक बार जोगेंदर नाथ मंडल को भी पढ़ लें। उसी के कारण पाकिस्तान और बांग्लादेश में दलित मारे जा रहे हैं।
अस्पताल का बिस्तर। जेब एकदम खाली। शरीर कैंसर से लड़ रहा था।
डॉक्टरों ने पूछा, "���लाज के लिए पैसे नहीं हैं, तो भर्ती क्यों हुए? तुम हो कौन?"
वह बूढ़ा व्यक्ति चुप रहा। बस आंखों से आंसू बह निकले।
तभी एक पत्रकार ने पहचाना। यह कोई भिखारी नहीं था। यह वह शख्स था जिसने भगत सिंह के साथ असेंबली में बम फेंका था।
जी हाँ, हम बात कर रहे हैं 'बटुकेश्वर दत्त' की।
वही बी.के. दत्त, जो चाहते तो बम फेंककर भाग सकते थे। लेकिन वे वहां डटे रहे, ताकि दुनिया को बहरे कानों तक अपनी आवाज पहुंचा सकें।
भगत सिंह को फांसी मिली और वो अमर हो गए। लेकिन बटुकेश्वर दत्त को मिली 'काला पानी' की सजा।
अंग्रेजों की जेल में उन्होंने यातनाएं सही। लगा कि आजादी के बाद सब ठीक हो जाएगा।
लेकिन विडंबना देखिए।
आजाद भारत में इस क्रांतिकारी को पेट पालने के लिए एक सिगरेट कंपनी में एजेंट की नौकरी करनी पड़ी। बिस्कुट बनाने का काम करना पड़ा।
हद तो तब हो गई जब बिहार सरकार ने उनसे स्वतंत्रता सेनानी होने का 'प्रमाण पत्र' मांग लिया।
सोचिए, जिसने जवानी जेल में बिता दी, उससे कागज मांगे गए।
पटना के अस्पताल में जब उनकी हालत बिगड़ी, तो उनके पास इलाज तक के पैसे नहीं थे। जब तक सरकार को होश आया, तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
मरते वक्त उनकी बस एक ही इच्छा थी- "मेरा अंतिम संस्कार उसी जगह करना जहां मेरे दोस्त भगत सिंह का हुआ था।"
आज हम भगत सिंह की फोटो टी-शर्ट पर लगाकर घूमते हैं। लेकिन उस साथी को भूल गए जो ताउम्र तिल-तिल कर मरा।
अंग्रेजों ने उन्हें जेल दी, लेकिन अपने ही देश ने उन्हें उपेक्षा दी।
क्या आजादी सिर्फ उन्हीं की है जो फांसी पर झूल गए? क्या जो बच गए और घुट-घुट कर जिए, उनका कोई मोल नहीं?
अगली बार जब आजाद�� का जश्न मनाएं, तो एक पल रुककर सोचिएगा जरूर।
शायद हमें आजादी तो मिल गई, लेकिन हम अपने नायकों को सम्मान देना भूल गए।
इस सच को साझा करें, ताकि इतिहास की किताबों के बाहर भी लोग बटुकेश्वर दत्त को जान सकें।
NCERT की Book में लिखा है कि दो सुल्तान - कुतुबुद्दीन ऐबक और इल्लतुतमिश ने वो मीनार बनवाया था । जिसे आज ���ुतुब मीनार कहा जाता है।
इस पर नीरज अत्रि ने RTI लगाया कि ncert ने इस तथ्य को कहाँ से सत्य���पित किया है? सत्यापित करने वाले लोग कौन थे?
इस पर ncert की तरफ से उत्तर आया है कि
- विभाग के पास कोई सत्यापित प्रति उपलब्ध नही है।
- इस पुस्तक को Professor Mrinal Miri ने approve किया था, जो - National Monitoring Committee का हेड था।
मृणाल मीरी शिलांग का एक ईसाई है जिसे कांग्रेस ने 12 सालों तक राज्यसभा में नॉमिनेट किया था कांग्रेस राज के दौरान यह कई मलाईदार पदों पर था और कम्युनिस्ट चर्च के गठजोड़ से इसने भारतीय इतिहास में कई झूठे तथ्य ���ोड़ें जो आज भी बच्चों को पढ़ाएं जाते हैं जिसका कोई सुबूत किसी के पास नहीं है
केवल हैदराबाद तक सीमित रहने वाला एक मुस्लिम नेता ओवैसी, बिना कोई विकास कार्य किए, बिना किसी रोजगार का वादा किए महाराष्ट्र, बिहार, और गुजरा�� में चुनाव कैसे जीत गया है?
जिस दिन आप इस प्रश्न का उत्तर जान जाएंगे उस दिन आप आलू प्याज पेट्रोल के दाम देखना छोड़ देंगे...!
बटेंगे तो कटेंगे..
पाकिस्तान और श्रीलंका के पास खाना नहीं; लेकिन, वे "हंगर इंडेक्स" में भारत से बेहतर रैंक पर हैं...
यूएई का कोई निजी मीडिया नहीं है; लेकिन, वे "प्रेस फ्रीडम" में भारत से बेहतर रैंक रखते हैं ...
अफगानिस्तान लड़कियों को पढ़ने नहीं देता; लेकिन, "अकादमिक और महिला स्वतंत्रता" में भारत से बेहतर रैंक है ...
इराक और सीरिया में शांति नहीं केवल युद्ध है लेकिन वे "हैप्प��नेस इंडेक्स" में भारत से बेहतर रैंक पर हैं!
ये हैं अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के "बुद्धिजीवियों" द्वारा 'वैज्ञानिक रूप' से' किए गए बेहतरीन सर्वे...