महा जातिवादी @Profdilipmandal को अगर जनेऊ पहनना हैं तो हम उसका प्रबंध कर देंगे और वो भी पूरे वैदिक रीति से।
पर मंडल को ईश्वर की शपथ लेकर यह बताना होगा कि वो किसी भी तरह का मांस, मदिरा या नशे का सेवन नही करता हैं। साथ ही व्यभिचार और जुए जैसे अनैतिक कामो में भी
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हम सदैव से धर्म को मानने ��ाले लोग हैं, हनुमान जी की विशाल प्रतिमा बहुत पुराने समय में ही समाजवादी पार्टी ने सैफई में लगवाई थी, केदारेश्वर मंदिर भी इटावा में समाजवादी पार्टी बनवा रही है।
आप भाजपा समर्थक पत्रकारों को ये नहीं दिखेगा ना ही आप दिखाएंगे।
क्योंकि आपको भाजपा से जो स्क्रिप्ट मिलती है वो आप बोलेंगे @SushantBSinha
आप सच्चे सनातनी हैं पत्रकार महोदय, आपने राम मंदिर में भी दान दिया होगा, आप केदारेश्वर मंदिर में भी दान दीजिए, सच्चे सनातनी होने का धर्म पालन कीजिए, जब भगवान केदारेश्वर मंदिर का उद्घाटन होगा उस इनविटेशन लिस्ट में आपको भी जोड़ लिया गया है, आप भी आइयेगा।
कङ्काः सुपर्णा अनु यन्त��वेनान्गृध्राणामन्नमसावस्तु सेना ।
मैषां मोच्यघहारश्च नेन्द्र वयाꣳस्येनाननुसंयन्तु सर्वान् ॥
- सामवेद ॥ १८६४
भावार्थभाषाः -
जैसे बाह्य युद्ध में मारे गये शत्रु गिद्ध आदि माँसभक्षक पक्षियों से समाप्त कि��े जाते हैं, वैसे ही आन्तरिक देवासुरसङ्ग्राम में जीवात्मा से मारे गये काम-क्रोध आदि शत्रुओं का नाम भी न बचे, ऐसा प्रयत्न मनुष्यों को करना चाहिए ॥
पदार्थान्वयभाषाः -
(सुपर्णाः) सुदृढ़ पङ्खोंवाली (कङ्काः) चीलें (एनान्) इन शत्रुओं का (अनुयन्तु) पीछा करें। (असौ सेना) वह शत्रु-सेना (गृध्राणाम्) गिद्धों का (अन्नम् अस्तु) भोजन बने। हे (इन्द्र) सेनापतितुल्य जीवात्मन् ! (एषाम्) इन शत्रुओं में से (अघहा��ः च न) पाप का भागी कोई भी (मा मोचि) जिन्दा न छूटे। (एनान् सर्वान्) इन सबका (वयांसि) माँसभक्षी पक्षी (अनु संयन्तु) पीछा करें, इन्हें खा जाएँ ॥
डॉ. अम्बेडकर के वेदों पर क्रांतिकारी विचार
( निम्नलिखित उद्धरण अम्बेडकर वांग्मय से लिए हैं )
वेदों और शास्त्रों में डायनामाईट लगाना होगा , आपको श्रुति और स्मृति के धर्म को नष्ट करना ही चाहिए | ( खण्ड १ प्र. ९९ )
अथर्ववेद मात्र जादू टोनो, इंद्रजाल और जड़ी बूटियों की विद्या है | इसका चौथाई जादू टोनों और इंद्रजाल से युक्त है | ( खण्ड ८ प्र. ६० )
वेदों में ऐसा कुछ नहीं है जिससे आध्यात्मिक अथवा नैतिक उत्थान का मार्ग प्रशस्त हो | ( खण्ड ८ प्र. ६२ )
ऐसे वेद शास्त्रों के धर्म को निर्मूल करना अनिवार्य है | ( खण्ड १ प्र. १५ )
वेद बेकार की रचनाएँ हैं उन्हें पवित्र या संदेह से परे बताने में कोई तुक नहीं | ( खण्ड १३ प्र. १११ )
जहाँ तक नैतिकता का प्रश्न है ऋग्वेद में प्रायः कुछ है ही नहीं, न ही ऋग्वेद नैतिकता का आदर्श प्रस्तुत करता है | ( खण्ड ८ प्र. ४७, ५१ )
ऋग्वेद आदिम जीवन की प्रतिछाया है जिनमें जिज्ञासा अधिक है, भविष्य की कल्पना नहीं है | इनमें दुराचार अधिक गुण मुट्ठी भर हैं | ( खण्ड ८ प्र. ५१ )
#AmbedkarJayanti
गौतम बुद्ध और नारी
यहाँ गौतम बुद्ध अपने खासमखास शिष्य आनंद से कह रहे हैं
यदि स्त्रियाँ इस धर्म में न आती तो 1000 वर्ष तक ठहरता पर अब 500 वर्ष तक ही ठहरेगा
वैदिक धर्म में स्त्रियाँ मन्त्र द्रष्टा ऋषि तक बनी और कभी किसी ऋषि ने ऐसे विचार नहीं व्यक्त किये, कभी किसी ��ैदिक धर्म प्रचारक ने नारियो को धर्म से दूर करने का प्रयास नहीं किया और तथाकथित वैज्ञानिक धम्म में नारियो की स्थिति आप पढ़ ही चुके हो
संदर्भित ग्रन्थ एवं पुस्तक - विनय पिटक
भिक्षुणी स्कंधक ,पेज 521
अनुवादक राहुल सांस्कृत्यायन
#Buddha
तमिद्वर्धन्तु नो गिरो वत्सꣳ सꣳशिश्वरीरिव ।
य इन्द्रस्य हृदꣳसनिः ॥
-सामवेद १३३६
भावार्थभाषाः -
विद्वान् धार्मिक जनों को चाहिए कि वे अपने उपदेशों से जनता में परमेश्वर के प्रति विश्वास उत्पन्न करें, जिससे सर्वत्र आस्तिकता और धार्मिकता का वातावरण उत्पन्न हो ॥
स न इन्द्रः शिवः सखाश्वावद्गोमद्यवमत् ।
उरुधारेव दोहते ॥
- सामवेद ॥ १४५२
भावार्थभाषाः -
वही राजा होने योग्य है, जो प्रजाजनों को धन, धान्य, गाय, घोड़े आदि सम्पदाओं से समृद्ध कर सके, क्योंकि समृद्ध लोग ही अध्यात्म-मार्ग पर चलना चाहते हैं ॥
@Truth_z7 कोई ऐसी जाति नहीं है जिसमें सभी दुष्ट हो और ऐसी भी कोई जाति नहीं जिसमें सभी भले हो। इसलिए सबका खंडन करो कोई भेद भाव नहीं।
और साप्ताहिक पॉडकास्ट शुरू किया जाए
विधुं दद्राणꣳ समने बहूनां युवानꣳ सन्तं पलितो जगार ।
देवस्य पश्य काव्यं महित्वाद्या ममार स ह्यः समान ॥
- सामवेद ॥ १७८२
बड़ी भारी शक्ति जिनके पास होती है, वे भी मृत्यु के मुख में जाने से नहीं बच पाते, यह देखकर धर्म-कर्मों में और परमात्मा के चिन्तन में मन लगाना चाहिए ॥
यदिन्द्र यावतस्त्वमेतावदहमीशीय ।
स्तोतारमिद्दधिषे रदावसो न पापत्वाय रꣳसिषम् ॥
-सामवेद ॥ १७९६
भावार्थभाषाः -
मनुष्य को चाहिए कि सत्पात्र को ही धन आदि का दान करे, पाप की वृद्धि के लिए कभी दान न दे ॥
यथा गौरो अपा कृतं तृष्यन्नेत्यवेरिणम् ।
आपित्वे नः प्रपित्वे तूयमा गहि कण्वेषु सु सचा पिब ॥
- सामवेद ॥ १७२१
भावार्थभाषाः -
जैसे प्यासा मृग जलरहित प्रदेश को छोड़कर जलप्रचुर प्रदेश को चला जाता है, वैसे ही विद्या के प्यासे लोग मूर्खों का सङ्ग छोड़ कर विद्वानों का सङ्ग करें ॥
पदार्थान्वयभाषाः -
(यथा) जैसे (तृष्यन्) प्यासा (गौरः) गौर मृग (इरिणम्) मरूस्थल को (अव) छोड़कर (अपा कृतम्) जल से पूर्ण सरोवर को (एति) प्राप्त करता है, वैसे ही हे विद्यार्थी ! तू (नः) हम गुरुओं से (आपित��वे) सम्बन्ध (प्रपित्वे) प्राप्त होने पर, हमारे पास (तूयम्) शीघ्र (आ गहि) आ जा और (कण्वेषु) हम मेधावियों के सान्निध्य में (सचा) दूसरे सहाध्यायियों के साथ मिलकर (सु पिब) भली-भाँति लौकिक विद्याओं के रस का तथा अध्यात्म-विद्याओं के रस का पान कर ॥
शिक्षेयमस्मै दित्सेयꣳ शचीपते मनीषिणे ।
यदहं गोपतिः स्याम् ॥
- सामवेद ॥ १८३५
भावार्थभाषाः -
धनपतियों का यह कर्तव्य है कि वे जिस धन के स्��ामी हों,उस धन का कम से कम शतांश सत्पात्रों को अवश्य दान करें ॥