इस्तीफ़ा माँगना कोई भीख नहीं है बल्कि एक अधिकार टाइप है क्यूँकि आपको सिर माथे चढ़ाने वाली ये जनता ही है …मैंने एक चीज़ और नोटिस करी कि दो दिन पहले डोटासरा भी पेपर लीक के प्रदर्शन में इस्तीफ़ा माँग रहे थे परंतु उन्हें ख़ुद के काले कारनामों पर कभी शर्म नहीं आई .
आज अपनी जीत है ❤️
A New Era of Indian Women's Cricket Begins.
Congratulations to our Women's Cricket Team for their stellar performance, winning today's Test match against England. The victory of our girls in the first-ever women's international cricket test match played at the historic Lord's Cricket Ground in London, marks a defining moment that symbolises the unstoppable rise of Indian women's cricket and the indomitable prowess of our team.
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सचिन पायलट का नाम और कुछ चेहरों की उड़ी हुई रंगत
क्या आपने किसी पार्टी के भीतर ऐसे लोग भी देखे हैं कि अपनी ही पार्टी का कोई नेता बाहर जाकर जोरदार काम करके आए, मेहनत करे, जिलों में धूल फांके, प्रत्याशियों के लिए सभाएं करे, रोड शो करे, डोर-टू-डोर अभियान में उतरे और जब उसके हिस्से थोड़ी-सी प्रशंसा आए तो अपनी पार्टी की जीत पर गर्व करने के बजाय उसी व्यक्ति को नाम लेकर कोसने लगें?
राजनीति में विरोधी दल के हमले समझ में आते हैं। सत्ता और विपक्ष की लड़ाई भी समझ में आती है। लेकिन अपने ही घर की दीवारों पर कील ठोककर फिर यह शिकायत करना कि छत टेढ़ी क्यों है, यह केवल राजनीति नहीं, यह कुंठा का सार्वजनिक प्रदर्शन है।
केरल में कांग्रेस की अभूतपूर्व बढ़त की चर्चा हो रही है। ऐसी स्थिति में स्वाभाविक था कि पार्टी के लोग इस मेहनत को सामूहिक उपलब्धि की तरह पेश करते। लेकिन कुछ खेमों में जैसे ही सचिन पायलट का नाम आया, चेहरों पर वही पुरानी असहजता लौट आई। किसी ने पायलट का नाम भी नहीं लिया तो उस पर पायलट के नाम से ट्विटर के फर्जी हैंड्स से तंज कसने की भरमार। और सब जानते हैं कि इन्हें वही लोग चलाते हैं, जिनके जिम्मे इस महान् पार्टी ने पार्टी को पार्टी बनाने का काम सौंप रखा है!
पायलट का नाम उनके लिए केवल एक नेता का नाम नहीं, एक हल्की-सी दस्तक है, जिसके पड़ते ही बंद कमरों के भीतर रखे कुछ काठ के बक्से टीन की तरह खड़खड़ाने लगते हैं। मंच पर यह नाम लिया जाए तो तालियां बजती हैं, लेकिन कुछ राजनीतिक कोनों में कुर्सियों की पीठ अचानक सीधी हो जाती है और चेहरों पर मुस्कान का सरकारी लेप चढ़ जाता है।
सवाल यह नहीं कि पायलट अकेले जीत दिला लाए। कोई भी गंभीर व्यक्ति राजनीति को इतना सरलीकृत नहीं करता। सवाल यह है कि जब एक नेता वरिष्ठ पर्यवेक्षक के रूप में 55 से अधिक प्रत्याशियों के लिए प्रचार करता है, 14 में से 10 जिलों में जाता है, एक दिन में पांच-छह कार्यक्रम करता है, सभाओं, दौरों, रोड शो और जनसंपर्क में पसीना बहाता है तो अपनी ही पार्टी के लोग उसकी मेहनत को स्वीकार करने में इतने कंजूस क्यों हो जाते हैं?
पायलट की प्रभावशीलता से पार्टी के कुछ खास खेमों में मचने वाली खलबली का असली रहस्य है। पायलट राजनीति में उस किस्म की उपस्थिति हैं जिसे केवल पदों, प्रेसनोटों और बंद कमरों की बैठकों से काटा नहीं जा सकता। उनके पास भीड़ खींचने की क्षमता है, युवा आकर्षण है, जमीन से संवाद है और वह बेचैन ऊर्जा है जो ठहरी हुई राजनीति को असहज करती है। जिन लोगों ने राजनीति को दरी, माइक, माल्यार्पण, किसी ख़ास नेता नाम के पेड़ के सहारे बेल की तरह लिपटकर रहना और बयानबाजी करते रहने का स्थायी कारोबार समझ लिया है, उनके लिए ऐसा नेता हमेशा असुविधाजनक संभावना रहेगा।
कटाक्ष यह है कि एकता का भाषण देने वाले लोग अक्सर किसी लोकप्रिय चेहरे का नाम आते ही सबसे पहले विचलित हो जाते हैं। एकता उनके लिए तभी तक पवित्र है, जब तक तालियां उनके मंच की दिशा में बजें। जनाधार तभी तक सम्माननीय है, जब तक वह किसी और के पक्ष में दिखाई न दे। युवा ऊर्जा तभी तक स्वीकार्य है, जब तक वह फोटो में पीछे खड़ी रहे।
दरअसल सचिन पायलट का नाम राजस्थान कांग्रेस के भीतर एक आईना है। इस आईने में कुछ चेहरों को अपना वास्तविक आकार दिखने लगता है। उन्हें डर लगता है कि कहीं यह सवाल न उठ जाए कि जनता किसे सुनना चाहती है और किसे केवल सहना पड़ता है।
अपनी ही पार्टी की उपलब्धि पर गर्व करने के बजाय अपने ही नेता की लोकप्रियता से चिढ़ जाना राजनीतिक परिपक्वता नहीं, राजनीतिक असुरक्षा है। और असुरक्षा जब बयान बनकर बाहर आती है, तो वह विरोधी को नहीं, अपने ही दल को कमजोर करती है। कांग्रेस को अगर सचमुच आगे बढ़ना है, तो उसे मेहनत करने वालों की पीठ थपथपानी होगी, न कि हर चमकते चेहरे पर कालिख खोजनी होगी। जबकि राजनीति का सच ये है कि इस तरह की बेचैनी और बेहाली में जीने वालों के लिए भी पर्याप्त जगह है। कई बार तो वे लोग बहुत ऊँचे तक भी पहुंचे हैं; क्योंकि खरे का भ्रम पैदा करके चलने वाले खोटे सिक्कों वाली अर्थव्यवस्था का नाम ही राजनीति है।
इन लोगों को सबसे पहले यह समझना चाहिए कि संगठन किसी एक खेमे की बपौती नहीं होता। यह भाजपा को देखकर समझा जा सकता है। लेकिन सही तो ये है कि किसी सामान्य व्यक्ति के हाथ संगठन की कमान आती है तो उसे पद की ऊँचाई नहीं, व्यवहार की परिपक्वता बचाती है। उसे बहुत संजीदा, सबको साथ लेकर चलने वाला और उदार हृदय होना पड़ता है। अपनी सरपरस्ती में कुत्सा फैलाने वाले मरजीवड़ों का दस्ता किसी नेता को मजबूत नहीं करता, उलटे उसे छोटा, असुरक्षित और संकीर्ण साबित करता है। अपनी ही पार्टी के लोकप्रिय चेहरों से जलने के बजाय उन्हें जोड़िए। जाने इन लोगों को यह ख़याल कब आएगा कि कांग्रेस को विरोधियों से लड़ना है, अपने ही लोगों को काटना नहीं।