@ImSoniya24 लड़कियां हर वक़्त बेहतर की तलाश में होती हैं , कभी वही शख्स बेकार लगा होगा , तब भी वो उसे उतना ही प्यार करता रहा होगा लेकिन नहीं दिखा अब जब नई शादी कर ली अब यहां थपेड़े खा रही है धूल फांक रही है तो फिर प्यार चाहिए ,
यानी पहले पति का शोषण किया अब दूसरे का
सिर्फ अपने हित के लिए
समान शिक्षा❌
समान चिकित्सा❌
समान कर संहिता❌
समान दंड संहिता❌
समान न्याय संहिता❌
समान चुनाव संहिता❌
समान पुलिस संहिता❌
समान संपत्ति संहिता❌
समान व्यापार संहिता❌
समान नागरिक संहिता❌
समान धर्मस्थल संहिता❌
समान नामकरण संहिता❌
समान जनसंख्या संहिता❌
@narendramodi@PMOIndia
और ये अधिकारी सरकारी सैलरी पे मौज कर रहे थे..?
भाई तब पकड़ा क्यों नहीं ..?
पूरा अधिकारी महकमा ऐसे ही है , जब रिटायर हो जाता है तो ज्ञान देता है ,
अगर कायदे से देखा जाए तो इन ips पर कार्यवाही होनी चाहिए।।
#भ्रष्ट#ips#police
**हिंदी दिवस पर हिंदी को एक दिन का राज मिल जाता है।**फिर अगले दिन उसे उसकी औकात याद दिला दी जाती है।
आज हिंदी में भाषण हुए—
“हिंदी हमारी आत्मा है”,
“हिंदी हमारी पहचान है”,
“हिंदी को विश्वभाषा बनाना है।”
और भाषण खत्म होते ही—
“Now let us proceed with the next agenda…”
हिंदी दिवस की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है कि
**हिंदी के सम्मान पर भी अंग्रेज़ी में काम करने वाले लोग हिंदी को सम्मानित करते हैं!**
सरकारी कार्यालयों में हिंदी के लिए पखवाड़ा,
विश्वविद्यालयों में सप्ताह,
प्रतियोगिताएँ, प्रमाणपत्र और फोटोसेशन…
लेकिन साल भर हिंदी में काम करने की बात कर दीजिए,
तो अचानक सवाल उठता है—
**“Professionalism कहाँ है?”**
सच तो यह है कि
हमें हिंदी से प्रेम नहीं,
**हिंदी दिवस से प्रेम है।**
हिंदी को बचाने के लिए कार्यक्रम नहीं,
**मानसिकता बदलनी होगी।**
क्योंकि जिस भाषा को बोलने में हमें संकोच हो
और उसी भाषा के सम्मान में भाषण देने में गर्व—
समस्या हिंदी में नहीं, हमारी मानसिक गुलामी में है।
सिर्फ़ “हिंदी को सम्मान दें” मत कहिए।
**पहले हिंदी को अपने काम में सम्मान दीजिए।**
वरना अगले साल फिर वही मंच होगा,
वही भाषण होगा,
वही फोटो होगी—
#हिंदीदिवस #HindiDiwas #हिंदी #राजभाषा #हिंदीपखवाड़ा #भाषाईस्वाभिमान #हिंदीभाषा #भारतीयभाषाएँ
विश्वविद्यालयों में छात्रसंघ चुनाव राजनीति और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रशिक्षण का केंद्र होता है, लेकिन जब चुनाव लिंगदोह समिति के नियमों और निर्धारित आचार-मानदंडों को ताक पर रखकर संपन्न हो, तो सवाल केवल विद्यार्थियों से नहीं, बल्कि पूरे विश्वविद्यालय प्रशासन से पूछा जाना चाहिए। चुनाव के दौरान बूथ पर चीखना-चिल्लाना, अपने प्रत्याशी के लिए वोट मांगना और प्रचार करना आदि आचार संहिता का घोर उल्लंघन होता है, जिसे लगातार नजरअंदाज किया जाता है।
चुनाव के नाम पर डीजे नाईट, पिज़्ज़ा पार्टी, शराब पार्टी, होटलों में भोजन आयोजित हो, चुनावी माहौल में धनबल और दिखावे का बोलबाला हो तो वह लोकतांत्रिक मूल्यों की हत्या की भांति है। लिंगदोह समिति की सिफारिशों में से एक कक्षा में नियमित उपस्थिति होना भी अनिवार्य है, जिसकी भी अनदेखी की जाती है। नेता अधिकांश वैसे विद्यार्थी बन रहे हैं, जिन्हें पढ़ने-लिखने से कोई लेना-देना न हो, जिनके पास कोई विचार न हो। ये एडमिशन सिर्फ राजनीति करने और वोटर बनने के लिए लेते हैं। छात्र राजनीति का उद्देश्य नेतृत्व, विचार, संवाद, लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक जिम्मेदारी का विकास होना चाहिए—न कि पार्टी, प्रदर्शन अथवा शक्ति-प्रदर्शन। कहते हैं युवा देश का भविष्य होते हैं लेकिन जब युवा छोटी-छोटी जीत के लिए नैतिक विहीन हो जायें, वे स्वार्थी होकर सोचे तब उस देश का भविष्य कैसा होगा, यह गंभीर चिंता का विषय है।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन सबके बीच पुलिस, शिक्षक और विश्वविद्यालय प्रशासन की चुप्पी बनी रहती है, जो की लोकतंत्र की हत्या की गहरी साजिश की ओर इंगित करता है और राजशाही हुकूमत को स्पष्ट है। यदि नियमों का उल्लंघन सामने हो और जिम्मेदार संस्थाएँ मौन रहें, तो फिर लिंगदोह समिति के नियमों का अर्थ ही क्या रह जाता है? विश्वविद्यालय लोकतंत्र की पाठशाला है। यहाँ यदि नैतिकता, अनुशासन और नियमों की ही अनदेखी होगी, तो हम आने वाली पीढ़ी को किस प्रकार का लोकतंत्र, नैतिकता और भारतीय ज्ञान परंपरा सिखा रहे हैं? नियमों का उल्लंघन करने वाली संस्थाओं पर तत्काल कार्रवाई होनी चाहिए, जैसा की पूर्व में न्यायालय के हस्तक्षेप से हो चुका है। तभी एक स्वस्थ राजनीति का विकास विश्वविद्यालयों में हो सकेगा।
@EduMinOfIndia@ugc_india
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बच्चे को महंगे स्कूल में पढ़ाना, उसकी जरूरतें पूरी करना और उसके करियर की चिंता करना ही अच्छी परवरिश नहीं है। उसे **सहमति का महत्त्व, संवेदनशीलता, सम्मान, जिम्मेदारी और दूसरों की गरिमा** का अर्थ समझाना भी उतना ही जरूरी है।
‘यूफोरिया’ में विंध्या लगातार उस लड़की के बारे में सोचती रहती है, जिसके साथ उसके बेटे ने दरिंदगी की। बेटे के प्रति ममता और नैतिकता के बीच उसका द्वंद्व गहराता जाता है।निर्णायक मोड़ तब आता है, जब वह अपने बेटे को बचाने के बजाय अदालत का दरवाजा खटखटाती है और कहती है—
“मुझसे गलती हुई है, मुझे सजा दो।”
एक मां का अपने बेटे को बचाने के बजाय उसके अपराध की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करना इस कहानी को बेहद मार्मिक और जरूरी बना देता है।
सवाल सिर्फ यह नहीं कि बच्चे क्या पढ़ रहे हैं, सवाल यह भी है कि हम उन्हें इंसान कितना बना रहे हैं। सब लोग में प्रकाशित मेरा लेख।
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