ब्रिटिशकालीन भारत में अंग्रेजों ने जमींदारी जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से शासन किया और पहले से सामाजिक एवं राजनीतिक प्रभुत्व रखने वाले वर्गों को अपने शासन में सहयोगी बनाया। इसके परिणामस्वरूप धन, धरती और राजपाट पर कुछ विशेष वर्गों का वर्चस्व और मजबूत हुआ। 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ, लेकिन आजादी के बाद भी धन, धरती और सत्ता-संसाधनों पर समाज के एक बड़े वर्ग का वर्चस्व बना रहा और भूमि तथा संसाधनों का न्यायपूर्ण बंटवारा नहीं हो सका।
इसी असमानता को कम करने के उद्देश्य से स्वतंत्र भारत में भूमि सुधार लागू किए गए। लेकिन प्रभावी क्रियान्वयन की कमी, कानूनी एवं प्रशासनिक अड़चनों और प्रभावशाली भू-स्वामी वर्गों के प्रतिरोध के कारण भूमि सुधार अपने व्यापक उद्देश्यों को पूरी तरह हासिल नहीं कर सके। भूमि और संसाधनों की असमानता से पैदा हुआ असंतोष आगे चलकर कई उग्र सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों की पृष्ठभूमि बना, जिनमें नक्सल आंदोलन भी शामिल था।
ऐतिहासिक रूप से सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षणिक अवसरों से वंचित समुदायों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए संविधान में आरक्षण का प्रावधान किया गया। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को संविधान लागू होने के साथ ही आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान मिला। वहीं, अन्य पिछड़ा वर्ग को केंद्र सरकार की नौकरियों और केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1990 के दशक में लागू हुआ।
आरक्षण का संवैधानिक आधार मुख्यतः सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन तथा पर्याप्त प्रतिनिधित्व का अभाव है। इसके बावजूद आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आर्थिक आधार पर EWS आरक्षण की व्यवस्था की गई। ऐसे में आज आवश्यकता है कि आरक्षण और प्रतिनिधित्व की पूरी व्यवस्था की वास्तविक स्थिति का आंकड़ों के आधार पर मूल्��ांकन किया जाए।
हम लंबे समय से सामाजिक-आर्थिक एवं जातिग�� जनगणना की मांग कर रहे हैं, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि देश की धन-संपत्ति, जमीन, शिक्षा, रोजगार, प्रशासन, राजनीति, मीडिया और अन्य महत्वपूर्ण संस्थानों में विभिन्न सामाजिक समूहों की कितनी हिस्सेदारी है। जब तक विश्वसनीय और व्यापक आंकड़े सामने नहीं आएंगे, तब तक सामाजिक न्याय और समान हिस्सेदारी की वास्तविक तस्वीर पूरी तरह सामने नहीं आ सकती।
हमारी मांग है कि जिसकी जितनी संख्या है, उसकी उतनी भागीदा��ी सुनिश्चित की जाए। महिलाओं को उनकी जनसंख्या के अनुपात में स्थानीय निकायों, संसद और विधानमंडलों में प्रभावी प्रतिनिधित्व मिले। OBC समाज को लोकसभा और विधानसभाओं में उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिले। SC, ST और OBC के लिए राज्यसभा तथा विधान परिषदों में भी उचित और प्रभावी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए।
उच्च न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व, पदोन्नति में आरक्षण, सरकारी योजनाओं और बजट में आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी, सरकारी ठेकों और सरकारी खरीद में आरक्षण तथा निजी क्षेत्र में प्रतिनिधित्व की व्यवस्था पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए, ताकि सामाजिक न्याय केवल सरकारी नौकरियों तक सीमित न रहे।
निजी क्षेत्र में हमारे समाज के लोग केवल मजदूरी करने के लिए नहीं हैं। उन्हें प्रबंधन, निर्णय लेने वाली संस्थाओं और नेतृत्व के पदों पर भी उचित हिस्सेदारी मिलनी चाहिए। आर्थिक विकास में भागीदारी तभी सार्थक होगी, जब विकास के साथ निर्णय लेने की शक्ति में भी समान भागीदारी सुनिश्चित हो।
मीडिया लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसलिए मीडिया संस्थानों में भी ऐतिहासिक रूप से वंचित समाजों की पर्याप्त भागीदारी और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाना चाहिए, ताकि समाज के हर वर्ग की आवाज लोकतांत्रिक विमर्श में प्रभावी रूप से सामने आ सके।
यह लड़ाई किसी के अधिकार छीनने की नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से वंचित समाजों को उनके संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों के अनुरूप न्यायपूर्ण हिस्सेदारी दिलाने की लड़ाई है। हमारा लक्ष्य है-- धन, धरती, सत्ता और देश के महत्वपूर्ण संस्थानों में न्यायपूर्ण हिस्सेदारी तथा वास्तविक सामाजिक न्याय।
आज डांगावास के पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाने के लिए जयपुर में।
राजस्थान के नागौर के डांगावास हत्याकांड में वर्ष 2015 की इस जघन्य घटना ने पूरे दे�� को झकझोर दिया था।
11 वर्षों के लंबे इंतजार के बाद 5 अगस्त 2026 को आए फैसले ने पीड़ित परिवारों को बेहद आहत किया है। उनका सवाल है कि यदि सभी 40 आरोपी बरी हो गए, तो उनके 5 परिजनों सहित कुल 6 लोगों की हत्या आखिर किसने की?
वर्ष 2015 की इस जघन्य घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इतने वर्षों बाद भी पीड़ित परिवारों को न्याय न मिलना बेहद गंभीर और चिंताजनक है।
पुलिस की यह कार्रवाई हमारी आवाज़ नहीं रोक सकती। हम डांगावास के पीड़ित परिवारों को न्याय दिलाकर रहेंगे। न्याय की यह लड़ाई आख़िरी दम तक जारी रहेगी।
जिला जौनपुर की “संवैधानिक अधिकार बचाओ, भाईचारा बनाओ” महारैली का ऐतिहासिक रूप से सफल आयोजन इस बात का जीवंत प्रमाण है कि बहुजन आंदोलन अब हर रैली के साथ नई ऊँचाइयों को छू रहा है।
जौनपुर की महारैली को ऐतिहासिक रूप से ���फल बनाने में दिन-रात जुटे सभी पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं और सहयोगियों को हृदय से आभार, साथ ही, इस महारैली को अपना अपार प्यार और समर्थन देकर इतिहास रचने वाली सम्मानित जागरूक और संघर्षशील मेरे परिवार का दिल से स्वागत।
#ASP_K_Mission2027
बहुजन हृदय सम्राट हमारे प्रेरणास्रोत भीम आर्मी चीफ आजाद समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और लोकसभा नगीना के माननीय सांसद बड़े भाई चन्द्रशेखर आजाद जी को जन्मदिवस की बहुत बहुत हार्दिक मंगलकामनाएं बहुजन संतो महापुरुषों का आशीर्वाद आप पर हमेशा बना रहे
"सामाजिक परिवर्तन और आर्थिक मुक्ति" के आंदोलन में, मैं अपने सभी सम्मानित साथियों ���े आर्थिक एवं संगठनात्मक—दोनों तरह के सहयोग की विनम्र अपील करता हूँ।
परम पूज्य बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर का संदेश— “Pay Back to Society”—हमें याद दिलाता है कि समाज ने हमें जो दिया है, उसे समाज को लौटाना हमारा प्रथम कर्तव्य है।
मान्यवर साहब कांशीराम जी ने कहा था—"जो सहारा देगा, वो इशारा भी देगा।" इसीलिए, इस आंदोलन में मैं आपसे ही सहारा और इशारा—दोनों की अपेक्षा करता हूँ।
मेरे जन्मदिन के अवसर पर, आंदोलन को आगे बढ़ाने हेतु हम पार्टी का QR कोड जारी कर रहे हैं।
आपका छोटा-सा योगदान भी हमारे सामूहिक संघर्ष को बड़ी ताकत देता है।
सम्मानित साथियों, कृपया QR कोड को इसी पेज से ही शेयर करें, ताकि किसी भी प्रकार के फ्रॉड से बचा जा सके।
जय भीम, जय भारत, जय मंडल, जय जोहार, जय संविधान।
युवा और उनके परिवार आज टूटे हुए हैं। बीते रविवार को UKSSSC की भर्ती परीक्षा का पेपर लीक होना सिर्फ एक परीक्षा का मामला नहीं है, यह उनके सपनों, मेहनत और विश्वास के साथ किया गया बड़ा अन्याय है।
यह पेपर लीक इसलिए ह��ता है क्योंकि इन परीक्षाओं में शामिल होने वाले बच्चे गरीब मजदूरों, किसान और मध्यम वर्गीय परिवारों से आते हैं। उनके संघर्ष, त्याग और मेहनत का यह अपमान है।
अब युवा छात्रों ने न्याय की मांग में उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में भूख हड़ताल पर बैठकर अपनी आवाज़ उठाई है। और इसके बावजूद उन्हें ज़बरदस्ती उठा लिया जा रहा है, उनकी लड़ाई और पीड़ा को दबाने की कोशिश की जा रही है।
लेकिन मुख्यमंत्री @pushkardhami जी, याद रखिए, पेपर लीक का विरोध अब सिर्फ सोशल मीडिया या हल्द्वानी-देहरादून तक सीमित नहीं रहा��� बड़कोट, उत्तरकाशी में युवाओं, महिलाओं और अभिभावकों ने हाथों में मशाल लेकर सड़क पर उतरकर अपनी आवाज बुलंद की। यह सिर्फ प्रदर्शन नहीं था, यह अपने भविष्य और न्याय के लिए उठी एक सच्ची और दिल से निकली आवाज़ थी।
इन संघर्षरत बच्चों को ‘जिहादी’ कहकर अपमानित करना सिर्फ़ उत्तराखंड ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए चिंता और शर्म की बात है। छात्रों की मांग पूरी तरह जायज़ थी, लेकिन इसे BJP IT सेल ने पहले नेपाल क��� Gen Z से जोड़ा और फिर मुख्यमंत्री ने “नकल जिहाद” का नाम दे दिया।
हम उत्तराखंड सरकार से मांग करते हैं कि पेपर लीक के दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए, स्नातक स्तरीय परीक्षा रद्द की जाए और तुरंत सीबीआई जांच कराई जाए।
छात्रों का दर्द सिर्फ उनका नहीं, उनके परिवारों का दर्द भी है। उनकी लड़ाई हमारे समाज की लड़ाई है। इसे दबाया नहीं जा सकता। हम उनके साथ हैं। उनके अधिकार, उनके सपने, उनका भविष्य—हम इसे ��ोई भी कीमत चुक���कर सुरक्षित कराएँगे।
@ukcmo
@pushkardhami
#UKSSSC #PaperLeak #JusticeForStudents #Dehradun #StudentsRights #SaveOurFuture #HungerStrike #StudentsRightsMatter
कल जिला कुरुक्षेत्र (हरियाणा) के शहाबाद में सतगुरु स्वामी अमर ज्योति समनदास जी महाराज के पावन जन्मोत्सव पर आयोजित सत्संग में शामिल होकर संतों को नमन किया और प्यारी संगत का आशीर्वाद प्राप्त किया।@BhimArmyChief