यदि आप यह मान जाने को तैयार नहीं होते कि आप सबसे अधिक बुद्धिमान, व्यवहारकुशल, ईमानदार, मेहनती और फलाना ढिमकाना नहीं हैं, तब आपको यह अवश्य मान लेना होगा कि आप भी एक दिन फलाना ढिमकाना सिद्ध कर दिए जाएंगे।
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एक दिन,
जब सब कुछ,
नष्ट हो जाने को आतुर होगा।
जब धरा के बाहर,
कुछ भी सुसज्ज��त नहीं रह गया होगा।
तब,
मग्न किसी प्रतीक्षालय में,
श्रृंगार शोभनीय तुम्हारे हेतु,
शेष रह गया होगा,
प्रेम असीमित,
मेरे हृदय में।
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जीवन एक अद्वितीय अनुभव है।
इसे जीने हेतु किसी क्र��ंति की आवश्यकता नहीं,
किसी उल्लास की आवश्यकता नहीं,
अपितु पूर्ण सचेत हो जाने की आवश्यकता है।
चेतना इस बात को जान लेने की है कि प्रतिपल एक उत्सव घटित हो रहा है,
और प्रत्येक आनंद के क्षणों में,
मृत्यु एक अंतिम पर्व है।
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अब मंथन होता ��ले नहीं ये सागर बड़ा निराला है,
तब नीर-लहर को आतुर आते-जाते देखा मैंने भी।
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In a poetic form, these lines are extracted from "JOOTHA AMRIT", a short story written by Vivek Chandra Bisht AKA VIRANJAN.
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मैं सत्य कहता हूं कि मुझे बंधन पसंद नहीं।
संभवतः जीवन पर्यंत मुझे पसंद नहीं होगा।
और मैं तुमको भी कभी बांधना नहीं चाहता।
ना ही तुमको अपनी राग में नचाना चाहता हूं।
ना ही चाहता हूं तुमको मैं प्रेम जताकर ठगना,
और ना ही,
तुम पर मर मिटने का वादा करना चाहता हूं।
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मैं सत्य कहता हूं कि मुझे बंधन पसंद नहीं।
संभवतः जीवन पर्य��त मुझे पसंद नहीं होगा।
और मैं तुमको भी कभी बांधना नहीं चाहता।
ना ही तुमको अपनी राग में नचाना चाहता हूं।
ना ही चाहता हूं तुमको मैं प्रेम जताकर ठगना,
और ना ही,
तुम पर मर मिटने का वादा करना चाहता हूं।
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धर्म को मैंने दुकानों में क्यों धूल खाते देखा है?
रोते-बिलखते देखा है,
और भीख मांगते देखा है।
कुछ लोगों को लूटा देखा,
कुछ को लुटते देखा है।
और धर्म बेचते कुछ लोगों को,
घर-घर जाते देखा है।
समेटा जाते देखा और बिखेरा जाते देखा है।
थोड़ा उसे खरीदा और बेचा जाते देखा है।
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