1932 में लंदन की राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस के दौरान डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी ने दलितों, आदिवासियों और वंचित समाज के लिए अलग निर्वाचन प्रणाली (Separate Electorates) और दो वोट का अधिकार सुनिश्चित कराने में ऐतिहासिक सफलता पाई थी। इसे ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्ज़े मैक्डॉनल्ड ने कम्युनल अवॉर्ड के रूप में स्वीकार भी कर लिया था।
लेकिन कांग्रेस और महात्मा गांधी ने इसे अपने राजनीतिक हितों के लिए “राष्ट्र की एकता पर खतरा” बताकर विरोध किया। गांधी जी ने इसे रोकने के लिए जेल में आमरण अनशन तक कर दिया। कांग्रेस ने दलितों की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनने से रोकने के लिए हर संभव दबाव बनाया।
बाबा साहब अम्बेडकर जी, जो अपने समाज को एक सशक्त राजनीतिक पहचान दिलाने के लिए इतने संघर्ष से यह अधिकार लाए थे, उन्हें भारी दबाव और मजबूरी में गांधी जी और कांग्रेस के नेताओं के साथ पुणे पैक्ट पर हस्ताक्षर करना पड़ा।
बाबा साहब ने दुखी मन से कहा था –
"मैं अपने समाज के लिए लंदन से एक मीठा फल लेकर आया था। लेकिन गांधी जी ने वह फल छीनकर खुद उसका रस पी लिया और उसका छिलका मेरे और मेरे समाज के ऊपर फेंक दिया।" इस कथन में ही पूरा सत्य छिपा है। अलग निर्वाचन और दो वोट का अधिकार दलितों को स्वतंत्र राजनीतिक ताक़त और आत्मसम्मान दे सकता था। लेकिन पुणे पैक्ट ने दलित-आदिवासियों को कांग्रेस की दया और ऊपरी सहानुभूति पर निर्भर बना दिया।
पुणे पैक्ट के बाद –
* दलित-आदिवासी स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति से वंचित हो गए।
* उनकी राजनीति “आरक्षित सीटों” तक सीमित कर दी गई।
* कांग्रेस ने धीरे-धीरे दलित नेताओं को अपने ढांचे में समेटकर या कमजोर करके उनका उपयोग किया।
* स्वतंत्र बहुजन राजनीति का विकास बहुत देर से और संघर्षों के बाद हुआ।
यही कारण है कि बाबा साहब ने बाद में कांग्रेस और गांधी जी की चालाकियों को पहचान लिया और कहा कि यह समझौता हमारे समाज की “राजनीतिक गुलामी” की नींव बन गया।
आज़ादी के बाद बहुजन समाज ने बाबा साहब के विचारों से प्रेरित होकर अपनी स्वतंत्र राजनीति खड़ी करने का प्रयास किया। बहुजन आंदोलन और राजनीति ने वंचित समाज को एक पहचान और सम्मान देने का काम किया। लेकिन कांग्रेस ने शुरू से ही इस राजनीति को बदनाम करने, कमजोर करने और जातिवादी ढांचे को बनाए रखने का काम किया।
आज भी जो नेता पुणे पैक्ट से पैदा हुए ढांचे के भीतर हैं, वही कांग्रेस और उच्च जातीय राजनीति की ड्यूटी निभा रहे हैं। यही वजह है कि दलित-आदिवासी समाज आज भी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से पीछे धकेले हुए हैं।
पुणे पैक्ट भारतीय इतिहास का वह मोड़ है, जिसने वंचित समाज की स्वतंत्र राजनीतिक दिशा को कुचल दिया। गांधी और कांग्रेस की चालाकियों ने बाबा साहब अम्बेडकर जी को दबाव में लाकर समझौता कराया, जिसका खामियाज़ा आज तक दलित, आदिवासी और बहुजन समाज भुगत रहा है।
1932 में लंदन की राउंड टेबल कॉन्फ्रेंस के दौरान डॉ. भीमराव अम्बेडकर जी ने दलितों, आदिवासियों और वंचित समाज के लिए अलग निर्वाचन प्रणाली (Separate Electorates) और दो वोट का अधिकार सुनिश्चित कराने में ऐतिहासिक सफलता पाई थी। इसे ब्रिटिश प्रधानमंत्री रैम्ज़े मैक्डॉनल्ड ने कम्युनल अवॉर्ड के रूप में स्वीकार भी कर लिया था।
लेकिन कांग्रेस और महात्मा गांधी ने इसे अपने राजनीतिक हितों के लिए “राष्ट्र की एकता पर खतरा” बताकर विरोध किया। गांधी जी ने इसे रोकने के लिए जेल में आमरण अनशन तक कर दिया। कांग्रेस ने दलितों की स्वतंत्र राजनीतिक पहचान बनने से रोकने के लिए हर संभव दबाव बनाया।
बाबा साहब अम्बेडकर जी, जो अपने समाज को एक सशक्त राजनीतिक पहचान दिलाने के लिए इतने संघर्ष से यह अधिकार लाए थे, उन्हें भारी दबाव और मजबूरी में गांधी जी और कांग्रेस के नेताओं के साथ पुणे पैक्ट पर हस्ताक्षर करना पड़ा।
बाबा साहब ने दुखी मन से कहा था –
"मैं अपने समाज के लिए लंदन से एक मीठा फल लेकर आया था। लेकिन गांधी जी ने वह फल छीनकर खुद उसका रस पी लिया और उसका छिलका मेरे और मेरे समाज के ऊपर फेंक दिया।" इस कथन में ही पूरा सत्य छिपा है। अलग निर्वाचन और दो वोट का अधिकार दलितों को स्वतंत्र राजनीतिक ताक़त और आत्मसम्मान दे सकता था। लेकिन पुणे पैक्ट ने दलित-आदिवासियों को कांग्रेस की दया और ऊपरी सहानुभूति पर निर्भर बना दिया।
पुणे पैक्ट के बाद –
* दलित-आदिवासी स्वतंत्र राजनीतिक शक्ति से वंचित हो गए।
* उनकी राजनीति “आरक्षित सीटों” तक सीमित कर दी गई।
* कांग्रेस ने धीरे-धीरे दलित नेताओं को अपने ढांचे में समेटकर या कमजोर करके उनका उपयोग किया।
* स्वतंत्र बहुजन राजनीति का विकास बहुत देर से और संघर्षों के बाद हुआ।
यही कारण है कि बाबा साहब ने बाद में कांग्रेस और गांधी जी की चालाकियों को पहचान लिया और कहा कि यह समझौता हमारे समाज की “राजनीतिक गुलामी” की नींव बन गया।
आज़ादी के बाद बहुजन समाज ने बाबा साहब के विचारों से प्रेरित होकर अपनी स्वतंत्र राजनीति खड़ी करने का प्रयास किया। बहुजन आंदोलन और राजनीति ने वंचित समाज को एक पहचान और सम्मान देने का काम किया। लेकिन कांग्रेस ने शुरू से ही इस राजनीति को बदनाम करने, कमजोर करने और जातिवादी ढांचे को बनाए रखने का काम किया।
आज भी जो नेता पुणे पैक्ट से पैदा हुए ढांचे के भीतर हैं, वही कांग्रेस और उच्च जातीय राजनीति की ड्यूटी निभा रहे हैं। यही वजह है कि दलित-आदिवासी समाज आज भी राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक रूप से पीछे धकेले हुए हैं।
पुणे पैक्ट भारतीय इतिहास का वह मोड़ है, जिसने वंचित समाज की स्वतंत्र राजनीतिक दिशा को कुचल दिया। गांधी और कांग्रेस की चालाकियों ने बाबा साहब अम्बेडकर जी को दबाव में लाकर समझौता कराया, जिसका खामियाज़ा आज तक दलित, आदिवासी और बहुजन समाज भुगत रहा है।
🌿🍀🍁 सुप्रभात Good Morning 🍁🍀🌿
रिश्ते वही सच्चे होते हैं, जहां हालात बदल जाएं....
लेकिन इंसान की नियत और अपनापन नहीं बदलता !
क्योंकि वक्त तो हर किसी का बदलता है ,,
पर अच्छे कर्म और अच्छे रिश्ते हमेशा याद रहते हैं!
The Poona Pact was an agreement signed on September 24, 1932, at Yerwada Central Jail in Pune between Mahatma Gandhi and Dr. B.R. Ambedkar regarding political representation for the depressed classes.
Now we should demand separate electorate.
#PoonaPactWasBetrayal ✊✊