भदोही जिले का नाम बहन मायावती जी ने “संत रविदास नगर” रख दिया था |
लेकिन, फिर सपा सरकार आया |
और 6 दिसंबर 2014 को अखिलेश यादव ने संत गुरु रविदास जी के नाम पर रखे जिले का नाम बदलकर भदोही कर दिया |
आज योगी जी ने पुनः जिले का नाम “संत रविदास नगर” कर दिया |
संत गुरु रविदास जी, मेवाड़ गौरव महाराणा सांगा के गुरु एवं मीराबाई को दीक्षित करने वाले महान संत थे🙏
महाराणा सांगा जी ने गुरु रविदास जी को मेवाड़ के राजगुरु कि उपाधि दिया था |
पुज्य संत रविदास जी को नमन् 💐
ye Rajputo ek koi is tarah ka case ho jaye toh usko dikha kar khud ko bada samjhne lagte hai..bc Rajasthan mein sabse jyada inhi ki ladkiya bhag Rahi hai ya other caste mein shadi kar rahi hai.
Par dusre samaj ke gine chune cases se cope karte hai jhant.
Delhi haryana outskirts mai najafgarh rohini side itna bura hal hai tumhari waliyo ka college ke name par har ere gere gandu se rishte banati hai phir tere jese proud jhat se shadi karleti hai, koi ho to confirm karliyo meri baat kitni sach hai
आरक्षण हटाओ आंदोलन बुद्धिजीवी वर्ग का एक एजेंडा है इसमें क्षत्रिय समाज बिल्कुल भी उड़ता तीर ना ले क्योकि वो आपको एक हथियार के रूप में इस्तेमाल करके एक बड़े समूह के सामने विलेन बनाना चाहते है
क्षत्रिय कभी भी नहीं चाहेगा कि किसी वंचित और ग़रीब को आरक्षण ना मिले,जो वंचित और पिछड़ा मुख्यधारा में शामिल नहीं है उसको पूरा हक है आरक्षण का
हाँ बाक़ी वंचितों और पिछड़ो में जो अगड़े है अगर उनमे मानवता होगी तो आरक्षण में संशोधन और वर्गीकरण की माँग वो ख़ुद कर लेंगे ..
The biggest damage to BJP will be done by its IT cell. They have labelled so many people anti-nationals that ab logo ko isse farak hi nahi padta ki unko kya label kiya jaa raha hai. Yeh jitna logo ko galat bolte hai log utna modi ke khilaaf hote jaate hai.
जी कृष्णैया हत्याकांड में एक साजिश के तहत आनंद मोहन को फंसाया था।
दीगर बात ये है कि आनंद मोहन ने हत्या नहीं की थी, हत्या भुटकुन शुक्ला और आजकल बेउर जेल में बार बाला नचाने वाले मुन्ना शुक्ला ने की थी।
कोर्ट ने सबको छोड़ दिया और आनंद मोहन को पकड़ लिया। जबकि आनंद मोहन घटना के समय हाजीपुर में थे। लेकिन, उन पर जनता को भड़काकर DM की हत्या कराने का आरोप लगाया गया।
याद रहे, बाबरी ध्वंस में अटल बिहारी वाजपेयी और आडवाणी ने भी लोगों को उकसाया था और मस्जिद गिराई थी। बाद में अटल मुकरे और कोर्ट ने इसे सही मानकर उन्हें छोड़ भी दिया, जबकि उनके भाषण के वीडियो आज भी हैं।
ये दोनों मामले न्यायपालिका के ब्राह्मणवादी सोच का सबसे बड़ा उदाहरण है।
अब आगे देखिए। साल 2002 में आनंद मोहन से परेशान राबड़ी देवी की सरकार ने बिहार जेल मैनुअल में बदलाव किया, ताकि आनंद मोहन नाम के काँटे को हमेशा के लिए निकाला जा सके।
राबड़ी देवी की सरकार ने 10 दिसंबर 2002 को अधिसूचना जारी करके बिहार मैनुअल नीति में संशोधन कर लोक सेवक की हत्या सहित कुछ श्रेणियों के दोषियों को समय से पहले रिहाई का लाभ देने पर रोक लगा दी।
यह पूरा मसला ही राजनीतिक था। आनंद मोहन का जेल में रहना नीतीश कुमार और भाजपा के लिए भी लाभदायक था, क्योंकि क्षत्रिय एवं भूमिहार सहित अन्य सवर्ण वोट भाजपा यानी NDA की झोली में गिरने थे। इसलिए विपक्ष में रहते हुए भी इन्होंने इसका विरोध नहीं किया।
जी कृष्णैया की हत्या के फर्जी केस में आनंद मोहन 1994 के अंत यानि घटना के दौरान से ही जेल में थे। जेल में किसी के रहते हुए कानून में बदलाव करने का उद्देश्य स्पष्ट होता है।
अब यहां सवाल है कि DM की हत्या 1994 में हुई थी। जेल मैनुअल में बदलाव 2002 में हुआ। तो क्या आनंद मोहन पर यह नया कानून लागू होगा? कायदे से नहीं।
जब सुप्रीम कोर्ट आनंद मोहन को निकालने के लिए कानून में बदलाव पर सवाल उठाकर रिपोर्ट मांग सकता है तो आनंद मोहन को जेल में हमेशा रखने के लिए 2002 में हुए कानूनी बदलाव पर भी बिहार सरकार से उसे जवाब मांगना चाहिए था।
उम्मीद है कि आनंद मोहन पर कठोर टिप्पणी करने के अलावा सुप्रीम कोर्ट कुछ और नहीं कर सकता। इसकी दो वजह है। पहला, जो हुआ है कानूनन हुआ है। अगर ये कानून गलत है तो 2002 में बदलाव भी गलत था।
दूसरा, एक ही आदमी को एक ही अपराध के लिए दो बार सजा नहीं दी जा सकती भारतीय कानून में। तीसरा, अपराध 1994 में हुआ तो कानून का प्रावधान 1994 वाला ही लागू होना चाहिए।
लेकिन, अगर राजनीतिक साजिश रचनी ही है तो भूतकुन और मुन्ना शुक्ला को बचाने की तरह न्याय के सार्वभौमिक सिद्धांत का गला यहां भी घोंटा जा सकता है।
कांग्रेस में सारे अवगुण हैं पर कभी किसी छिपकली 🦎 चोद को हीरो नहीं बनाया ।
ना राजस्थान में शिवा कुनबी और अलिया भट्ट की मूर्ति लगाई, ना कभी मराठी भाषा के केंद्र खोले, और ना कभी पराठा साम्राज्य के नक्शे बनाये।
राजस्थानियों तुम्हारी जैसी सूखी ली है @BJP4Rajasthan किसी ने नहीं ली😂
विधु शेखर सिंह भारतीय राजस्व सेवा (आयकर) के 1984 बैच के एक सेवानिवृत्त अधिकारी हैं और बिहार के 16वें मुख्यमंत्री व पूर्व केंद्रीय मंत्री स्वर्गीय चंद्रशेखर सिंह के पुत्र हैं।
उन्होंने Chief Commissioner of Income Tax (CCIT) के पद पर कार्य किया और अपनी सेवानिवृत्ति से पहले,Member of the Income Tax Settlement Commission (ITSC) at the New Delhi Bench रहे।
इनका गांव जमुई जिले मे मलयपुर है।
@DakshKasana4 Ye photos daalne se sach nhi badalne wala.
Tum sb Pratihar nhi bhainschor shuddar ho tumhara Pratiharo se kuch lena nhi jyada se jyada agar kuch relation hoga to tumhari D@d!y0 ka pratiharo ke saamne taang failane ka hoga.
Baki tor m@@i ke docho
राजस्थान के आत्मसम्मान की बात करने वाले राजस्थान में सिर्फ राजपूत ही है
बाकी कहां गए...?
ऐसे फर्जी उचलने वाले गद्दार गधे इस मुद्दे पर क्यों नही भौक रहें है
आज हर जाति दूसरी जातियों को सोशल मीडिया पर गाली दे रही है और हर एक जाति गाली सुन रही है।लेकिन धरातल पर इतना जहर नहीं है इसीलिए यहाँ दी जाने वाली गालियों को दिल पर लेने की कोई जरूरत नहीं है। बेहतर है कि इस प्लेटफॉर्म का उपयोग कर अपने स्थानीय इतिहास, स्थानीय सफल लोगों, स्थानीय राजनीति और अपने जिले मे अपनी बसावट पर लिखिए।
जैसे मैने कुछ जानकारी इस प्रोफाइल से दी है :
बिहार मे 1097 मे कर्नाट वंश के शासन की शुरुआत हुई थी और वो मिथिला के आखिरी स्वतंत्र शासक थे।
बिहार पर मुगल आक्रमण के समय अफगान, Chero और राजपूत ( gidhhaur, खड़गपुर, Ujjainiyas) तीन सबसे बड़ी ताकत थी।
1857 मे सिर्फ शाहाबाद मे विद्रोह नहीं हुआ था ब्लकि arwal में भी राजपूतों ने विद्रोह किया था।
पटना मे जहां राजपूतों की आबादी की चर्चा नहीं होती वहां कई थानों मे हम अच्छी संख्या मे हैं।
Naxal से लडाई बिहार मे सबसे पहले 1970 से राजपूतों ने शुरु किया।
कई upsc , bpsc मे सफल लोगों की जानकारी मेरे प्रोफाइल पर सर्च करने पर मिल जाएगी।
यह बहुत ही छोटी सी जानकारी है लेकिन जो मुझे मालूम है वो मैने लिखा है। दूसरे भी लिखेंगे तो जानकारी और बढ़ेगी।
वर्ण व्यवस्था केवल क्षत्रियो को शासन का अधिकार देती थी। गैर क्षत्रिय शासन तभी कर सकते थे जब वो स्वयं को किसी तरह क्षत्रिय सिद्ध करें या क्षत्रियो के संरक्षण में उनकी स्वीकृति से शासन करें। इस बात को आप किताब से समझ सकते हैं।
150 वर्ष पहले तक बिहार का दरभंगा राजपरिवार अपने को राजपूत कहता था। बिहार के राजपूतो ने कभी इस बात को स्वीकृति तो नहीं दी कि दरभंगा राजपरिवार राजपूत है लेकिन लेकिन मौन साध कर शासन की स्वीकृति दी इसीलिए दरभंगा राज परिवार शासन कर सका।
यही स्थिति अन्य गैर क्षत्रिय जातियों के राजाओं की थी सब अपना निकास राजपूतो से बताते थे। यहाँ तक की शिवाजी को भी अपने को मेवाड़ के सिसोदिया वंश से जोड़ना पड़ा था। लोकतंत्र में डींगे हांकने से या सोशल मीडिया पर लिखने से इतिहास नहीं बनते।
भूदान आंदोलन में बिहार–झारखंड से कुल 22 लाख एकड़ भूमि दान दी गई थी, जिसमें से 15 लाख एकड़ से अधिक भूमि क्षत्रिय (राजपूत) समाज द्वारा दान की गई थी |
तुलनात्मक रूप से यह दिल्ली के क्षेत्रफल का लगभग चार गुना है। और यह दान मात्र 02 प्रदेश के क्षत्रियों से प्राप्त है,
विचार करिए, पुरे भारतवर्ष के क्षत्रियों ने भूमिहीनों, वंचितों, पिछड़ों, गरीबों के लिए कितना जमीन दान किया...
आज उन्हीं दानकर्ताओं को शोषणकर्ता बताया जा रहा...
उन्हीं क्षत्रियों के बेटो व पोतों को गा’ली दिया जा रहा, फर्जी नैरेटिव गढ़कर उन्हें शोषणकर्ता बताकर उनका छवि धूमिल किया जा रहा है...
क्या उन क्षत्रियों के संघर्ष, बलिदान, त्याग व दान का यही ईनाम देने के लायक है आप ....?
खैर, प्रमुख 𝗥𝗔𝗝𝗣𝗨𝗧 दानकर्ता 👇
राजवीर सर…!!
राजस्थानी भाषा के लिए…एक व्यक्ति के तौर पर
आप चाहे जीवन खपा दो… आप राजस्थानी भाषा का एक केन्द्र तक नहीं खुलवा सकते…
लेकिन किसी दिन कोई नेताजी आएँगे…
और राजस्थान में ही मराठी भाषा का केन्द्र खुलने की घोषणा कर जाएँगे…!!
ये औक़ात बची है संघर्ष की…!!
भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष से पूछे गए सवाल पर गौर कीजिए।
न्यूज 18 के एडिटर इन चीफ राहुल जोशी ने सवाल किया कि आने वाले समय में यूपी और उत्तराखंड का चेहरा योगी और धामी ही रहेंगे?
जोशी ने बहुत चालाकी ने यहां खेल कर दिया।
साल 2027 में विधानसभा का चुनाव उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के अलावा गोवा, मणिपुर और गुजरात में भी होने वाले हैं, जो भाजपा शासित हैं।
गुजरात में चुनाव फिर भी दिसम्बर के आसपास है, लेकिन गोवा और मणिपुर में तो मार्च के आसपास ही होगा।
ऐसे में जोशी ने सिर्फ यूपी और उत्तराखंड के ही मुख्यमंत्रियों का ही नाम क्यों लिया?
क्या इसलिए की इन दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री क्षत्रिय हैं?
राजस्थान के विश्वविद्यालयों में मराठी भाषा पढ़ाने का निर्णय कई महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े करता है। जब वर्षों से राजस्थान की जनता राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल कर उसे संवैधानिक मान्यता दिलाने की मांग कर रही है, तब प्राथमिकता राजस्थानी भाषा के अध्ययन, शोध और संवर्धन सहित संवैधानिक दर्जे की होनी चाहिए थी।
राजस्थान का गौरवशाली इतिहास, समृद्ध लोक साहित्य, लोक संस्कृति और असंख्य ऐतिहासिक ग्रंथ राजस्थानी भाषा में सुरक्षित हैं। यदि विश्वविद्यालयों में राजस्थानी भाषा के अध्ययन एवं शोध केंद्र स्थापित किए जाएँ, तो यह हमारी सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण, संवर्धन और नई पीढ़ी तक उसके प्रभावी हस्तांतरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम होगा।
यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि हमारा किसी भी भाषा के प्रति न तो विरोध है और न ही कोई पूर्वाग्रह। मराठी सहित भारत की सभी भाषाएँ समान रूप से सम्मान की पात्र हैं। किंतु राजस्थान में अपनी मातृभाषा की उपेक्षा कर किसी अन्य भाषा को प्राथमिकता देना उचित प्रतीत नहीं होता।
राजस्थान के जनप्रतिनिधियों, शिक्षाविदों और नीति-निर्माताओं को इस गंभीर विषय पर प्रदेश की भावनाओं के अनुरूप आवाज़ उठानी चाहिए, ताकि राजस्थानी भाषा को उसका उचित सम्मान और संस्थागत स्थान मिल सके।
@RajCMO@RajGovOfficial
आज इस आवाज में दर्द है...
राजवीर सिंह चलकोई को हम सुनते रहे हैं। उनकी बोली में हमेशा एक खनक रहती है अल्हड़पन झलकता है। मैंने इस पूरे वीडियो में देखा कि वो बात कहीं भी नहीं है। क्यों?
क्योंकि हमारे आत्मसम्मान पर चोट ही हुई है
राज्यपाल महोदय ने एक आदेश जारी कर राजस्थान के सभी विश्वविद्यालयों में मराठी के केंद्र खोलने के लिए कह दिया है। दूसरी तरफ वर्षों से राजस्थानी भाषा की मान्यता के लिए संघर्ष कर रहे लोग अभी तक राजस्थान के विश्वविद्यालयों में राजस्थानी के केंद्र नहीं खुलवा पाए हैं। स्कूलों में राजस्थानी की पढ़ाई शुरू नहीं करवा पाए हैं। राजस्थान की राजभाषा नहीं बनवा पाए हैं। पीड़ा तो है। सच्ची है। झलकेगी ही। छलकेगी ही।
राजस्थान वालों के चेहरे पर ऐसा जोरदार झापड़ मारा गया है, जिसका अहसास तो हुआ है लेकिन आत्म गौरव खो चुके लोग यह तय नहीं कर पा रहे कि रिएक्ट क्या करना है और कैसे करना है। इस पीड़ा को सभी सुनें और और सोचें कि हम अभागे लोग कहां खड़े हैं?
वीडियो साभार @republic
राजस्थान की विधानसभा में 200 हिंजड़े बैठे हैं और राजस्थान की लोकसभा सीटों पर बैठे 25 छक्के ।
जब हिंजड़े और छक्के शासन पर होंगे तो यही होगा।
राजस्थानी का विरोध करने वाले ब्रज के चोदे भी ग़ायब है?
ओह, उन्हें तो मराठी आती हैं, सिंधिया आता-जाता रहता था 😉