बड़ी ख़बर-
प्रयागराज में टीजीटी-पीजीटी अभ्यर्थियों का धैर्य जवाब दे गया।
बैरिकेड हटाकर शिक्षा निदेशालय में घुसे।
अभ्यर्थी टीजीटी-पीजीटी भर्ती में पुरानी नियमावली से परीक्षा कराने की मांग को लेकर शिक्षा निदेशालय के सामने दूसरे दिन भी धरने पर बैठे रहे।
मगर न कोई अधिकारी मिलने आया, न कोई सुनवाई हुई।
अधिकारियों का पूरा का पूरा कुनबा सत्ता की जयजयकार में डूबा हुआ है।
अभ्यर्थियों से बात करने की फुर्सत किसे है?
उन्हें मालूम है कि राजा को कुछ पता नहीं चलता है और खुदा न खास्ता पता चला भी तो समझा देंगे,
जिस दिशा में चाहेंगे, सत्ता के इंजन को घुमा देंगे।
AAP leader Sanjay Singh takes voter list glitch to another level. Changes UP's Chief Electoral Officer Navdeep Rinwa's name using the election commission software.
Listen in.
आप एक महत्वपूर्ण संयोग मिस कर गए अवधेश जी। 27 मार्च 2026, जिस दिन शिखर अग्रवाल के पुत्रो-सास-ससुर के नाम अजबगढ़ रिसोर्ट के करीब 20 लक्ज़री विला की रजिस्ट्री हुई थी।
इसी दिन राजस्थान सरकार आदेश निकालती हैं जिसमे गोयल फैशन प्राइवेट लिमिटेड के अजबगढ़ वाले रिसोर्ट के लिए एक खास आर्थिक पैकेज दिया जाता हैं। इस पैकेज में रिसोर्ट को 10 वर्षों तक स्टेट टैक्स पर 75 प्रतिशत सब्सिडी, 10 वर्षों तक विद्युत शुल्क के भुगतान से 100 प्रतिशत छूट, और राजस्थान इन्वेस्टमेंट प्रमोशन स्कीम के अनुसार अन्य सभी लाभ, जैसे स्टाम्प ड्यूटी में छूट, भूमि रूपांतरण ड्यूटी में छूट, कर्मचारियों की सैलरी में सरकारी अनुदान वैगरह वैगरह सब कुछ होता हैं।
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ये आदेश बोर्ड ऑफ इन्वेस्टमेंट की 6वीं बैठक दिनांक 14.02.2026 में लिए गए निर्णय के अनुपालन में लिया गया था। बैठक की अध्यक्षता माननीय मुख्यमंत्री ने की थी... शिखर अग्रवाल मुख्य प्रशासनिक नीति-निर्धारक और संचालक की भूमिका में थे।
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अब ये फार्मूला भी जबरदस्त हैं। जिसमे आप एक प्रॉपर्टी बेचो, फिर उसकी प्रॉपर्टी को आप किराये पर ले लो, और वो भी इतने महंगे दामों में जिसमे 3 साल में ही बेचान से मिली धनराशि किराया देने में खर्च हो जाए।
ये ख़ास सुविधा सिर्फ शिखर अग्रवाल को मिली हैं या सबको देते हैं अनंता रिसोर्ट वाले?
अगर इकोसिस्टम की बात करें तो भाजपा के पास X पर बढ़त है, जबकि मास और कंटेंट क्रिएटर्स की पहुंच meta और Insta पर ज़्यादा है.
वहां का इकोसिस्टम अभी तक भाजपा नहीं ब्रीच कर पाई है.
सरकार के लीगल नोटिस भेजकर सामान्य-सी ख़बरों को भी डिलीट करवाना शुरू कर दिया है.
इससे समझ आता है कि कोई भी सरकार हो, उसको डर ज़रूर लगता है.
उत्तराखंड: ईआरओ ने ठुकराईं भाजपा कार्यकर्ता की थोक में आपत्तियां, दिल्ली में शिकायत के बाद स्वीकार. भाजपा नेता राजेश तिवारी ने कहा, “दिल्ली मेल भेजने के दो दिन के भीतर ईआरओ कार्यालय से फोन आया और मुझसे आपत्तियां जमा करने को कहा गया.”
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An information which may be very disturbing to everyone. A medical distributor of a particular injection which is used in chemotherapy, his wife was suffering from cancer. She was taking treatment in a very renowned hospital. We will not take the name of the hospital. So the dealer requested the hospital authorities, sir I am myself a dealer and to me the injection comes at Rs. 11,000 dealer price. The hospital refused to administer that injection and charged Rs. 1,30,000 for that injection. Can you show any justification for this loot, please? Why this difference? Where does the money go? Supreme Court asks Centre
ECI tells Supreme Court that the West Bengal CEO Manoj Agarwal had the authority to bulk submit Form 7 without stating the reason why. Thats The Extra 2Ab formula for vote chori . No wonder he was rewarded handsomely
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बात केवल यही नहीं है कि चुनाव आयोग ने सर्वसम्मति से फ़ैसला लिया या नहीं। सर्वसम्मति से लेने के नाम पर उसके सारे अवैध काम वैध नहीं हो जाते हैं। SIR के नाम पर जो कांड हुआ है, हो रहा है, उसका जवाब आयोग के पास है नहीं। चुनाव आयुक्तों की आपत्तियाँ फैसले के पहले की प्रक्रिया का हिस्सा नहीं हैं बल्कि फैसला होने के बाद की आपत्तियाँ हैं। कोर्ट की आड़ में यह गेम नहीं हो सकता। तीनों चुनाव आयुक्त प्रेस का सामना नहीं कर सके। SIR के सवाल केवल इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट तक ही सीमित नहीं हैं। दूसरे दर्जनों रिपोर्ट में इसका फर्ज़ीवाड़ा उजागर हुआ है। अगर SIR का सिस्टम फूलप्रूफ होता तो पीलीभीत सदर की सीट पर 13000 वोटर के नाम नहीं बदले जाते। ऐसा होता तो चुनाव आयोग को ख़ुद से पता चल जाता है। एक विधानसभा में 13000 लोगों का वोट गोल किया जा सकता है तो बाकी जगहों पर क्या हुआ होगा। विपक्ष हर सीट का अध्ययन नहीं कर सकता है। उसके पास पीलीभीत में ही गली गली में वोट चोरी यात्रा निकालने का प्लान नहीं है और न लोग होंगे। सुप्रीम कोर्ट की नाक के नीचे SIR को लेकर क्या हुआ सभी को पता है। SIR के फर्ज़ीवाड़े पर कोर्ट की मुहर लगवा कर आयोग अभी तक बचता आया था, इस बार उसका घड़ा बीच सड़क पर फूट गया है। सबको दिख गया है।
The Election Commission has filed its reply in the Supreme Court to the petition on how the three-member Commission functions.
27 pages, approved by all three members. Its argument: every decision was unanimous, and a Commissioner’s note is a “suggestion,” not a decision.
Here’s what it addresses, and what it doesn’t.
🧵 (1/10)
चुनाव आयोग के हलफनामे का रितिका चोपड़ा ने पोस्टमार्टम कर दिया है .
एक - एक पॉइंट का जवाब दिया है .
कल केंचुआ का हलफनामा आते ही सरकारी पत्रकार कूदने लगे थे .
अपनी पत्रकारिता को मोदी के दरबार में गिरवी रखने वाले लोग @RitikaChopra__ का जवाब पढ़ें .
राजस्थान कैडर के सीनियर IAS शिखर अग्रवाल, IPS पत्नी प्रशाखा माथुर, दोनों बेटों और सास-ससुर ने ढाई साल में एक ही कंपनी से खरीदे 40 विला और कॉटेज। ₹6.15 करोड़ में खरीदे, उसी कंपनी को ₹1.80 करोड़ सालाना की लीज पर दिए। 20 विला अजबगढ़, अलवर के अनंता और 20 बुझड़ा, उदयपुर के अनंता रिसॉर्ट में।
#BhaskarInvestigation #MyReport
भारत चीन सीमा के बारे में जिस तरह के बयान शीर्ष अधिकारी की तरफ से आए और जैसे आनन फानन में बयान को "सेंसर" किया गया,
विदेश मंत्रालय ने भी बहुत "सावधानी" से इस पर अपनी बात रखी और जिस तरह अरुणाचल प्रदेश ले लोकल बात कर रहे हैं उससे साफ़ लग
रहा है की सीमा पर कुछ तो गड़बड़ सा माहौल है
कितना और घुमाना बाकी है? चुनाव आयोग, अब तो सच बोल दीजिए
आज चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल अपने जवाबी हलफनामे में कहा है कि SIR से जुड़े सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। यह हलफनामा उन याचिकाओं के जवाब में दाखिल किया गया है, जो चुनाव आयोग के कामकाज पर सवाल उठा रही हैं।
लेकिन सवाल तो यह है कि फॉर्म 6 में बदलाव चुनाव आयोग चाहकर भी नहीं कर सकता, फिर चाहे फैसला सर्वसम्मति से हुआ हो या नहीं। फॉर्म 6 "मतदाता पंजीकरण नियम, 1960" का हिस्सा है, और इसमें बदलाव के लिए केंद्र सरकार, यानी कानून मंत्रालय को अधिसूचना जारी करनी होती है। चुनाव आयोग इसकी सिफारिश कर सकता है, लेकिन खुद बदलाव नहीं कर सकता। तो फिर इसका जवाब कौन देगा?
चुनाव आयोग हमें पागल समझता है क्या?
या तो हम सबको कुछ समझ नहीं आता, या फिर चुनाव आयोग हमें पागल समझता है। एक आम नागरिक के तौर पर मेरे कुछ सवाल हैं।
पहले जान लीजिए कि चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में क्या कहा है। अपने हलफनामे में आयोग ने आरोपों से इनकार करते हुए कहा है कि SIR से जुड़े तीनों आदेश, जो 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 को जारी हुए थे, आयोग ने सर्वसम्मति से लिए थे। आयोग का तर्क है कि याचिका पूरी तरह एक अखबार की रिपोर्ट पर टिकी है, याचिकाकर्ता ने तथ्यों की खुद से पुष्टि नहीं की, इसलिए याचिका सुनवाई लायक ही नहीं है। आयोग ने यह भी कहा कि उसने कभी कोई अंदरूनी नोट या फाइल मीडिया को न जारी की, न जारी करने की इजाज़त दी।
फॉर्म 6 पर आयोग का कहना है कि उसने अपने SIR आदेशों के ज़रिए फॉर्म 6 में कोई बदलाव नहीं किया। आयोग ने खुद माना कि मतदाता पंजीकरण नियम, 1960 के तहत तय फॉर्म में बदलाव सिर्फ केंद्र सरकार कर सकती है। उसके मुताबिक SIR के दौरान जो घोषणा ली जा रही है, वह एक अलग दस्तावेज़ है, फॉर्म 6 में संशोधन नहीं।
अब मेरे सवाल।
पहला सवाल: आयोग कह रहा है कि उसे एक अखबार की खबर के आधार पर कटघरे में खड़ा किया जा रहा है। तो फिर आयोग ने 26 सितंबर को यह क्यों तय किया कि आगे से IT मॉड्यूल और पोर्टल से जुड़ी हर नई पहल पर आयोग की मंज़ूरी से पहले अधिकारियों की समिति में चर्चा होगी? आयोग के अपने प्रेस नोट (संख्या ECI/PN/120/2026, बिंदु iv) में "अब से" (Henceforth) लिखा है। इसका मतलब तो यही हुआ कि उससे पहले ऐसा नहीं हो रहा था। यानी खबर सही थी।
दूसरा सवाल: 26 सितंबर को आयोग ने अपनी बैठक के बाद जो प्रेस नोट जारी किया, उसके बिंदु (iii) में साफ लिखा है: “SIR के लिए फॉर्म 6 के साथ जोड़ी गई घोषणा को माननीय सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया है। गैर-SIR अवधि में नियमों (मतदाता पंजीकरण नियम, 1960) के मुताबिक लागू फॉर्म ही इस्तेमाल होंगे।”
यानी उस दिन आयोग खुद कह रहा था कि यह घोषणा "फॉर्म 6 के साथ जोड़ी गई" है और सुप्रीम कोर्ट ने इस पर मुहर लगाई है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया कि उसने ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया था। अब आयोग कह रहा है कि फॉर्म 6 में कोई बदलाव हुआ ही नहीं, घोषणा तो एक अलग दस्तावेज़ थी।
और उसी बिंदु की दूसरी लाइन पर गौर कीजिए। अगर SIR के दौरान भी नियमों वाला फॉर्म ही चल रहा था, तो यह लिखने की ज़रूरत क्यों पड़ी कि "गैर-SIR अवधि में नियमों के मुताबिक फॉर्म इस्तेमाल होंगे"? इसका सीधा मतलब है कि SIR के दौरान जो फॉर्म चल रहा था, वह नियमों में तय फॉर्म से अलग था।
पहले कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने सही ठहराया, जब कोर्ट ने मना कर दिया तो कह रहे हैं कि बदलाव किया ही नहीं। अगर बदलाव हुआ ही नहीं था, तो 26 सितंबर को सुप्रीम कोर्ट का नाम लेने की ज़रूरत क्यों पड़ी?
कुल मिलाकर, सच सामने आ जाने के बाद भी चुनाव आयोग देश और उसके लोकतंत्र के साथ मज़ाक कर रहा है।
संभवतः पूरे विश्व में भारत पहला ऐसा डेमोक्रेटिक देश होगा जहाँ सरकार मीडिया के लिए ऐसा कानून ला रही है जहाँ जर्नलिस्ट को अपनी ख़बर का सोर्स क़ानूनन बताना पड़ सकता है।
यह देश की मीडिया को “घोषित “ तरीक़े से मृत् करने का अंतिम हथियार होगा।वरना 99% तो अभी बिना कहे मृत है।
सोचिए अगर क़ानून पास हो गया तो क्या दो चुनाव आयुक्त ने भी ज्ञानेश कुमार के सामने विरोध जताया यह स्टोरी कभी आ पाती ?
हैरानी एयर सुखद आश्चर्य है कि कई मीडिया हाउस इसका विरोध कर रही है। वह ग्रुप भी जो सरकार का “ प्रोपेगंडा टूल” बनकर काम कर रहे हैं!
The Hindu has reported about 60000 form 7s filled by EROs without citing reason.
Same trend @AnjanaMeenakshi noticed in Andhra too. But when we asked, EROs said the portal does not allow them to fill reason.
What’s the use of such a portal @ECISVEEP?
https://t.co/19P0Y0pqKH
अंकिता भंडारी मर्डर केस -
आखिरकार जैसा सोच रहे थे, वैसा ही हुआ। देहरादून की CBI कोर्ट में आज नार्को टेस्ट पर सुनवाई टल गई। उर्मिला राठौर जेल में है। वहीं, सुरेश राठौर ने तबियत खराब होने की मेडिकल रिपोर्ट कोर्ट में पेश कर दी। अब कोर्ट फिर नई डेट देगा।
आज उर्मिला को कोर्ट में पेश होकर नार्को टेस्ट की सहमति देनी थी, उससे पहले ही उन्हें उत्तराखंड पुलिस ने अलग केस में अरेस्ट कर जेल भेज दिया।
सुरेश राठौर ने उर्मिला से फोनिन बातचीत में जिस दुष्यंत गौतम का अंकिता भंडारी मर्डर केस में नाम लिया था, उसकी सच्चाई जानने के लिए CBI दोनों का नार्को टेस्ट कराना चाहती है।