जाति प्रमाण पत्र जलाने से जातिवाद ख़त्म,
बीपीएल कार्ड जलाने से ग़रीबी ख़त्म,
कैंसर की रिपोर्ट जलाने से बीमारी खत्म,
अगर किसी दिव्यांग का प्रमाण पत्र जला दें तो सीधा वो रेस करता हुआ दिखेगा ओलंपिक में ..
ऐसे दो कौड़ी के लॉजिक लेकर ये आंदोलन करने निकले है 👇🤡
If anyone has problem with reservation they should not apply for govt colleges and govt jobs. One can get education from private colleges and jobs as well.
ब्रिटिशकालीन भारत में अंग्रेजों ने जमींदारी जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से शासन किया और पहले से सामाजिक एवं राजनीतिक प्रभुत्व रखने वाले वर्गों को अपने शासन में सहयोगी बनाया। इसके परिणामस्वरूप धन, धरती और राजपाट पर कुछ विशेष वर्गों का वर्चस्व और ��जबूत हुआ। 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ, लेकिन आजादी के बाद भी धन, धरती और सत्ता-संसाधनों पर समाज के एक बड़े वर्ग का वर्चस्व बना रहा और भूमि तथा संसाधनों का न्यायपूर्ण बंटवारा नहीं हो सका।
इसी असमानता को कम करने के उद्देश्य से स्वतंत्र भारत में भूमि सुधार लागू किए गए। लेकिन प्रभावी क्रियान्वयन की कमी, कानूनी एवं प्रशासनिक अड़चनों और प्रभावशाली भू-स्वामी वर्गों के प्रतिरोध के कारण भूमि सुधार अपने व्यापक उद्देश्यों को पूरी तरह हासिल नहीं कर सके। भूमि और संसाधनों की असमानता से पैदा हुआ असंतोष आगे चलकर कई उग्र सामाजिक-राजनीतिक आंदोलनों की पृष्ठभूमि बना, जिनमें नक्सल आंदोलन भी शामिल था।
ऐतिहासिक रूप से सामाजिक, राजनीतिक और शैक्षणिक अवसरों से वंचित समुदायों के प्रतिनिधित्व को सुनिश्चित करने के लिए संविधान में आरक्षण का प्रावधान किया गया। अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को संविधान लागू होने के साथ ही आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान मिला। वहीं, अन्य पिछड़ा वर्ग को केंद्र सरकार की नौकरियों और केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों में आरक्षण मंडल आयोग की सिफारिशों के आधार पर 1990 के दशक में लागू हुआ।
आरक्षण का संवैधानिक आधार मुख्यतः सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ापन तथा पर्याप्त प्रतिनिधित्व का अभाव है। इसके बावजूद आ���्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए आर्थिक आधार पर EWS आरक्षण की व्यवस्था की गई। ऐसे में आज आवश्यकता है कि आरक्षण और प्रतिनिधित्व की पूरी व्यवस्था की वास्तविक स्थिति का आंकड़ों के आधार पर मूल्यांकन किया जाए।
हम लंबे समय से सामाजिक-आर्थिक एवं जातिगत जनगणना की मांग कर रहे हैं, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि देश की धन-संपत्ति, जमीन, शिक्षा, रोजगार, प्रशासन, राजनीति, मीडिया और अन्य महत्वपूर्ण संस्थानों में विभिन्न सामाजिक समूहों की कितनी हिस्सेदारी है। जब तक विश्वसनीय और व्यापक आंकड़े सामने नहीं आएंगे, तब तक सामाजिक न्याय और समान हिस्सेदारी की वास्तविक तस्वीर पूरी तरह सामने नहीं आ सकती।
हमारी मांग है कि जिसकी जितनी संख्या है, उसकी उतनी भागीदारी सुनिश्चित की जाए। महिलाओं को उनकी जनसंख्या के अनुपात में स्थानीय निकायों, संसद और विधानमंडलों में प्रभावी प्रतिनिधित्व मिले। OBC समाज को लोकसभा और विधानसभाओं में उचित राजनीतिक प्रतिनिधित्व मिल��। SC, ST और OBC के लिए राज्यसभा तथा विधान परिषदों में भी उचित और प्रभावी प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए।
उच्च न्यायपालिका में प्रतिनिधित्व, पदोन्नति में आरक्षण, सरकारी योजनाओं और बजट में आबादी के अनुपात में हिस्सेदारी, सरकारी ठेकों और सरकारी खरीद में आरक्षण तथा निजी क्षेत्र में प्रतिनिधित्व की व्यवस्था पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए, ताकि सामाजिक न्याय केवल सरकारी नौकरियों तक सीमित न रहे।
निजी क्षेत्र में हमारे समाज के लोग केवल मजदूरी करने के लिए नहीं हैं। उन्हें प्रबंधन, निर्णय लेने वाली संस्थाओं और नेतृत्व के पदों पर भी उचित हिस्सेदारी ��िलनी चाहिए। आर्थिक विकास में भागीदारी तभी सार्थक होगी, जब विकास के साथ निर्णय लेने की शक्ति में भी समान भागीदारी सुनिश्चित हो।
मीडिया लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। इसलिए मीडिया संस्थानों में भी ऐतिहासिक रूप से वंचित समाजों की पर्याप्त भागीदारी और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाना चाहिए, ताकि समाज के हर वर्ग की आवाज लोकतांत्रिक विमर्श में प्रभावी रूप से सामने आ सके।
यह लड़ाई किसी के अधिकार छीनने की नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से वंचित समाजों को उनके संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकारों के अनुरूप न्यायपूर्ण हिस्सेदारी दिलाने की लड़ाई है। हमारा लक्ष्य है-- धन, धरती, सत्ता और देश के महत्वपूर्ण संस्थानों में न्यायपूर्ण हिस्सेदारी तथा वास्तविक सामाजिक न्याय।
डॉ. बाबासाहेब अम्बेडकर ने 25. 11. 1949 के दिन
संविधान सभा में कहा
26 जनवरी 1950 को हम एक परस्पर-विरोध के युग में
प्रवेश करने जा रहे हैं। राजनीति में हमारे पास समानता होगी लेकिन
सामाजिक और आर्थिक जीवन में असमानता होगी । राजनीति में हम एक व्यक्ति, एक वोट तथा एक मूल्य के सिद्धांत को अपनायेगे किन्तु अपने सामाजिक और आर्थिक ढांचे के कारण, हम एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य के सि��्धांत
को अस्वीकृत करते रहेंगे। यदि हम लम्बे समय तक इस सिद्धांत को अस्वीकृत
करते रहेंगे तो हम अपने राजनैतिक लोकतंत्र को खतरे में डाल रहे हैं। हमें यह परस्पर विरोधाभास सामाजिक और आर्थिक असमानता यथा शीघ्र खत्म करना होगा, अन्यथा जो लोग इस सामाजिक और आर्थिक असमानता से पिडित हैं वे भारत के राजनैतिक लोकतंत्र को उखाड़ फेंकेंगे। और हम स्थायी रूप से हमारे लोकतंत्र को खो देंगे भारत का संविधान हमारी स्वतंत्रता और आत्मसम्मान का रक्षक हैं अपने शरीर में खून की आखिरी बूंद रहने तक अपने स्वतंत्रता और आत्मसम्मान की ,भारत के संविधान की रक्षा करन��� का फ़ैसला हमे करना ही चाहिये !
............................
आज यही अस्थिरता की परीस्थिती आयी है. सँभल जाओ!
भारत आबादी के अनुसार संसाधनों क��� बंटवारा होना चाहिए. आज भी सबसे ज्यादा संपत्ति और भूमि सवर्ण समुदाय के पास है.
1. उच्च जाति के पास 41% संपत्ति है.
2. ओबीसी के पास 31% संपत्ति है.
3. मुस्लिम के पास 8% संपत्ति है.
4. दलित समाज के पास 7.3% संपत्ति है.
5. आदिवासी समाज के पास 3.7% संपत्ति है.
सबसे ज्यादा संपत्ति सवर्ण समाज के पास है. इनकी आबादी 10% के आसपास है और 41% संपत्ति पर कब्जा है.
ओबीसी पिछड़ा 52%, दलित 24% और आदिवासी 10% हैं. आबादी के अनुपात में उनके पास ���ंपत्ति और जमीन नही है.
भारत में सबसे बड़ा मुद्दा यही है. लेकिन कोई बहुजन नेता इस पर बोलता नही है कारण उनका पेट भरा हुआ है. बोलना लिखना आपको है, अपनी लड़ाई और संवैधानिक अधिकारों पर किसी नेता पर निर्भर मत रहिए. ये लोग CM या मंत्री बनकर अपने बच्चों के लिए सब सैट कर एक दिन मर जाएंगे.
भुगतना केवल आपको हमको और हमारी आने वाली पीढ़ी को पड़ेगा. वो आरक्षण के खिलाफ बोल रहे हैं तो आप इन मुद्दों को उठाओ.
नोटिस : अध्ययन 2013 NSSO AIDIS डेटा पर आधारित. 14 फरवरी 2019 इंडियन एक्सप्रेस.
IMAGE : Elite Women & Labour Women
🔥 हमारी 5 प्रमुख मांगें✊
1️⃣ EWS आरक्षण का नाम बदलकर “सवर्ण आरक्षण” किया जाए, क्योंकि आर्थिक रूप से कमजोर लोग सभी जातियों में होते हैं, लेकिन वर्तमान EWS व्यवस्था का लाभ केवल अनारक्षित वर्ग की पात्र जातियों को मिलता है।
2️⃣ निजी क्षेत्र में भी आरक्षण लागू किया जाए।
3️⃣ UGC के नियमों को प्रभावी रूप से लागू किया जाए।
4️⃣ OBC, SC और ST आरक्षण की समीक्षा कर उनकी जनसंख्या के अनुपात के अनुसार आरक्षण बढ़ाया जाए।
5️⃣ कॉलेजियम सिस्टम ��ें सुधार कर न्यायपालिका में पारदर्शिता और व्यापक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया जाए।
📢 समान अवसर, सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व—इन मुद्दों पर गंभीर बहस जरूरी है।
@BJP4UP @BJP4India @myogiadityanath @narendramodi @RahulGandhi
पुणे में ‘छात्रों की गूंज’ महिला विशेष महासभा को संबोधित करते हुए लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने महिलाओं की स्थिति और स्वतंत्रता पर बात की। इस दौरान उन्होंने मनुस्मृति के एक कथित उदाहरण का जिक्र करते हुए कहा कि देश की सबसे बड़ी ताकत यह है कि महिलाएं स्वतंत्र हों, अपने लिए आवाज उठाएं और खुद पर विश्वास करें।
#RahulGandhi #ChhatronKiGoonj #WomenEmpowerment #Pune #Manusmriti #ATCard #AajTakSocial
इन चुटिया लोग के कारण ही इनका धर्म खतरे में है।ये जितना दलितों आदिवासियों और पिछड़ों के खिलाफ होंगे इनका धर्म उतना ही खतरे में जाएगा।मैं तो बोलता हूं सारे sc st OBC हिन्दू धर्म छोड़ दें और बुद्धिज़्म को स्वीकार करें।इनकी अकड़ खत्म हो जाएगी।
कांग्रेस ओबीसी होने के कारण डॉ. मोहन यादव का मजाक उड़ाना चाहती है.
साइंस के किसी भी टीचर या स्टूडेंट से पूछिए. यादव जी एकदम सही बोल रहे हैं. पंखा हवा नहीं देता. पंखा सिर्फ व��ां मौजूद हवा को गति यानी फ्लो देता है. आप वैक्यूम में पंखा घुमाइए. हवा का एहसास नहीं होगा.
पुणे में आयोजित 'छात्रों की गूंज' कार्यक्रम में राहुल गांधी ने बड़ा बयान दिया. उन्होंने कहा- "महिलाओं को दबाने का माइंडसेट मनुस्मृति से आता है और आज हमारी लड़ाई इसी माइंडसेट से है. BJP-RSS के लोग चाहते हैं कि लड़कियां/महिलाएं पिंजरे में बंद रहें...लेकिन हम ऐसा हिंदुस्तान नहीं चाहते. हम चाहते हैं कि सम्मान सभी का हो"
#RahulGandhi #ChhatronKiGoonj #Manusmriti #Pune #ABPNews
स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर इस वीडियो के साथ यह बात बड़े ही व्यथित मन से लिख रहा हूं कि मुख्यमंत्री @myogiadityanath जी, यह 16 वर्षीय बच्ची का शव नहीं, पेड़ से उत्तर प्रदेश की कानून-व्यवस्था लटकी हुई है।
उत्तर प्रदेश के जिला सीतापुर के कोतवाली देहात थाना क्षेत्र के ग्राम शंकरपुर में 16 वर्षीय सबरीन बानो का संदिग्ध परिस्थितियों में शव मिलना बेहद दुखद और चिंताजनक है।
परिजनों के अनुसार, 11 अगस्त 2026 की शाम करीब 4 बजे सबरीन घर से लापता हुई। परिजनों ने पुलिस को सूचना दी, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई। 12 अगस्त को दोबारा सूचना देने के बावजूद पुलिस का रवैया नहीं बदला।
14 अगस्त को भीम आर्मी और आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के कार्यकर्ताओं से स��पर्क करने और पुलिस पर दबाव बनने के बाद एफआईआर दर्ज की गई। उसी शाम बच्ची का शव बरामद हुआ।
परिजनों के अनुसार, उनकी बेटी को अगवा कर उसके साथ बलात्कार के बाद हत्या की गई। यह बेहद गंभीर आरोप है, जिसकी निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच होनी चाहिए।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि 11 अगस्त को बच्ची के लापता होने की सूचना मिलने के बाद 14 अगस्त तक पुलिस ने क्या कार्रवाई की? अगर समय रहते पुलिस ने गंभीरता दिखाई होती, तो श��यद आज एक परिवार अपनी बेटी को न खोता।
14 अगस्त को उसका शव मिलने के बावजूद अभी तक किसी भी आरोपी की गिरफ्तारी न होना पुलिस की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
आज जब हम स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं, तब एक मां-बाप अपनी बेटी को न्याय दिलाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यह कैसी आजादी है, जहां एक बेटी की सुरक्षा के लिए भी परिवार को पुलिस पर दबाव बनाना पड़े?
@UPGovt पुलिस की लापरवाही की निष्पक्ष जांच कराए, जिम्मेदार पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई ��ो, आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी हो और सबरीन बानो को न्याय मिले।
हमारी संवेदनाएँ शोकाकुल परिवार के साथ हैं और न्याय की इस लड़ाई में हम उनके साथ हैं
Ambedkar and Periyar liberated the socially oppressed majority of India from a condition far worse than British slavery. But casteists like you won't accept.
Ambedkar essentially improved the lives of women by introducing the Hindu Code Bill and granting them social freedom.
Cry and defame as much as you want, both are champions of social justice.
बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर से बड़ा शायद ही दुनिया में कोई स्वतंत्रता सेनानी हुआ होगा। मोहनदास करमचंद गांधी, मार्टिन लूथर किंग जूनियर और नेल्सन मंडेला से भी बड़े स्वतंत्रता सेनानी बाबासाहेब हैं, जिन्होंने करोड़ों लोगों को गुलामी से आज़���द किया है।