Meet Umesh Kumar Sharma, a Brilliant Self-Taught Mechanic from Rosera, Bihar who built a Custom Electric Cycle with a 100 km Range on a Single Charge.
Armed with Grassroots Engineering and Local "Jugad," this 5th-grade Educated Innovator created an Ultra-low-cost vehicle that runs for just a few Rupees, bypassing the need for license or registration.
It's so Nice to see that he has a Horn, Key, Voltage Indicator, Accelerator & the setup is so Awesome. So Relatable. He also has footrest for Pillion Rider.
His incredible invention proves that True Innovation doesn't require Crazy League degrees. It just requires Passion, Grit, and Unstoppable Indian Ingenuity.
He is An Inspiration. Let's Share This Widely ❤️❤️❤️
I wish to meet Umesh ji one Day !!!
#FI
⚽ Can you imagine this? India’s Under-12 football team defeated Brazil 2-1 in the final to win the Gothia Cup in Sweden! 😳🏆
And that too after defeating England 12-0 and France 17-1! 🤔🔥
👍🏼🎖️💐
The most amazing part is that most of the players were from Manipur. 🇮🇳❤️
Yes, this really happened!
Let’s show our support and encourage these young footballers. Please share this widely and let everyone know about their incredible achievement! 🙌🇮🇳
⚽🇮🇳🏆 Salute to the future stars of Indian football! 💐👏
7 वर्षीय रागिनी के गांव पहुंचकर उससे मुलाकात की। पढ़ाई के जज्बे को देखते हुए ट्राईसाइकिल, किताबें, खिलौने, क्रच, टीएलएम किट व शैक्षिक सामग्री दी। पैर के ऑपरेशन हेतु CMO को जांच व उपचार के निर्देश दिए। शौचालय व सड़क मरम्मत की भी व्यवस्था के निर्देश दिए।
🥺 “DM अंकल @dmballia एक साइकिल दिलवा दीजिए ना… एक पैर से स्कूल जाते-जाते बहुत दर्द होता है। मैं पढ़ना चाहती हूं… स्कूल छोड़ना नहीं चाहती।” 💔
नन्ही रागिनी की इतनी-सी पुकार है… पैर ने साथ छोड़ा है, सपनों ने नहीं। 🙏
💔 जिस उम्र में बच्चों के पैरों में दौड़ने की ताकत होती है, उस उम्र में रागिनी एक पैर से स्कूल तक पहुंचने के लिए कूदती है…
बलिया की कक्षा-1 की नन्ही छात्रा रागिनी की कहानी पढ़कर शायद आपकी आंखें भी नम हो जाएं। 😢
हादसे में उसका एक पैर क्षतिग्रस्त हो गया… लेकिन उसका हौसला नहीं टूटा है, दिव्यांग होने के बावजूद पढ़ने की ऐसी ललक कि वह एक पैर से कूद-कूदकर रोज स्कूल जाती है।
मनियर के प्राथमिक विद्यालय दिघेड़ा में पढ़ने वाली रागिनी ने DM अंकल से बेहद मासूमियत से गुहार लगाई है।
सोचिए… एक छोटी बच्ची की मांग कितनी छोटी है,
लेकिन उसके सपने कितने बड़े हैं।
उसे न खिलौना चाहिए, न कोई महंगी चीज…
उसे सिर्फ स्कूल पहुंचने के लिए एक सहारा चाहिए।
रागिनी के पैरों में भले ही मजबूरी है, लेकिन आंखों में सपने हैं और दिल में पढ़-लिखकर आगे बढ़ने का जुनून। ❤️
अब सवाल सिर्फ इतना है - क्या रागिनी की यह मासूम पुकार DM अंकल तक पहुंचेगी?
अगर इस पोस्ट को शेयर करने से रागिनी की आवाज़ सही जगह तक पहुंच सकती है, तो इसे जरूर शेयर कीजिए।
शायद आपकी एक शेयर उसकी पढ़ाई की राह आसान कर दे। 🙏❤️
रागिनी को साइकिल मिलनी चाहिए… क्योंकि उसके सपनों को बैसाखी नहीं, बस एक मौका चाहिए। 🥺
अमरदीप कुमार
नाम सुनकर लगता है कोई कहानी होगी.. है भी
चार बार विदेश गया, भारत की जर्सी पहनी, मलेशिया में थ्रोबॉल में गोल्ड जीतकर तिरंगा लहराया
झारखंड का नाम रोशन किया लेकिन आज वही अमरदीप रांची के अरगोड़ा चौक पर धनिया-मिर्च तौल रहा है खेल कोटा...Read news
आपने अब तक मोबाइल से जितनी भी फोन कॉल की हैं, आपकी आवाज़ आपके फोन से बाहर निकलने से पहले कंप्रेस हो चुकी होती है।
असल में आपकी आवाज़ सीधे सफर नहीं करती। आपकी आवाज़ का एक गणितीय रूप तैयार करके भेजा जाता है और दूसरी तरफ मौजूद फोन उस गणितीय जानकारी से आपकी आवाज़ को दोबारा बना लेता है।
और जिस व्यक्ति ने यह तरीका विकसित करने में बड़ी भूमिका निभाई, उनका जन्म कानपुर में हुआ था।
उनका नाम था बिष्णु अटल (Bishnu Atal)।
उनका जन्म 10 मई 1933 को हुआ था। 1952 में उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय से भौतिक विज्ञान में डिग्री ली। इसके बाद 1955 में बेंगलुरु स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस (IISc) से इलेक्ट्रिकल कम्युनिकेशन इंजीनियरिंग में डिप्लोमा किया। वहीं उन्होंने करीब तीन साल तक ध्वनिविज्ञान यानी Acoustics पढ़ाया।
1961 में वे अमेरिका की Bell Laboratories से जुड़ गए और अगले 35 साल तक वहीं काम किया।
उन्होंने जिस समस्या पर काम किया, वह सुनने में भले ही मामूली लगे, लेकिन उसका महत्व समझेंगे तो बात बहुत बड़ी लगती है।
अगर किसी की आवाज़ को बिल्कुल उसी रूप में भेजा जाए, जैसे वह पैदा होती है, तो उसमें बहुत ज्यादा बैंडविड्थ लगेगी। 1980 के दशक में जब मोबाइल फोन तेजी से फैलने लगे, तब मोबाइल नेटवर्क पर दबाव बढ़ने लगा।
रेडियो स्पेक्ट्रम सीमित है। हवा में जितनी जगह उपलब्ध है, उससे ज्यादा जगह बनाई नहीं जा सकती।
अगर आवाज़ को कंप्रेस करने का तरीका नहीं होता, तो मोबाइल फोन शायद आज की तरह आम लोगों तक नहीं पहुंच पाता। मोबाइल फोन कुछ गिने-चुने लोगों की महंगी सुविधा बनकर रह जाता, क्योंकि नेटवर्क में हर किसी की कॉल के लिए पर्याप्त जगह ही नहीं होती।
1966 से 1970 के बीच बिष्णु अटल ने Linear Predictive Coding (LPC) विकसित करने में महत्वपूर्ण काम किया।
इसका विचार बेहद शानदार था।
इंसान की आवाज़ काफी हद तक पूर्वानुमानित (predictable) होती है। आप अभी जो आवाज़ निकाल रहे हैं, उसका संबंध कुछ क्षण पहले निकाली गई आवाज़ से होता है, क्योंकि आवाज़ बनाने वाली आपकी जीभ, गला और मुंह की बनावट लगभग वही रहती है।
इसलिए पूरी आवाज़ भेजने के बजाय सिर्फ कुछ ऐसे गणितीय आंकड़े भेजे जा सकते हैं, जो यह बताते हैं कि आवाज़ किस तरह पैदा हो रही है।
दूसरी तरफ का फोन उन्हीं आंकड़ों के आधार पर आपकी आवाज़ को दोबारा तैयार कर लेता है।
उनका शुरुआती सिस्टम सिर्फ 2,400 बिट प्रति सेकंड की दर से काम करता था, जो उस समय के हिसाब से बेहद कम था। अमेरिकी सेना ने इसे सुरक्षित टेलीफोन संचार के लिए भी अपनाया।
हालांकि इसमें एक समस्या थी।
आवाज़ समझ तो आती थी, लेकिन वह बिल्कुल इंसानी आवाज़ जैसी नहीं लगती थी। उसमें थोड़ी रोबोट जैसी आवाज़ सुनाई देती थी।
इसके बाद अटल ने लगभग अगले 15 साल इस तकनीक को बेहतर बनाने में लगा दिए।
1985 में उन्होंने Manfred Schroeder के साथ मिलकर Code-Excited Linear Prediction (CELP) नाम की तकनीक प्रकाशित की।
आगे चलकर यही तकनीक दुनिया के कई डिजिटल मोबाइल और वॉइस-कम्युनिकेशन सिस्टमों की नींव बनी। GSM, CDMA और इंटरनेट पर होने वाली वॉइस कॉलिंग जैसी तकनीकों में इसका महत्वपूर्ण योगदान रहा।
बिष्णु अटल के नाम 16 अमेरिकी पेटेंट और कई अंतरराष्ट्रीय पेटेंट हैं।
1994 में उन्हें Bell Labs Fellow बनाया गया।
1987 में वे अमेरिका की National Academy of Engineering के सदस्य चुने गए।
और 2003 में Franklin Institute ने उन्हें इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग के क्षेत्र में Benjamin Franklin Medal से सम्मानित किया।
उन्हें सम्मान देते समय Franklin Institute ने एक बेहद खूबसूरत बात लिखी थी—
“अगली बार जब आप अपने मोबाइल फोन से कॉल करें, तो बिष्णु अटल को याद कीजिए।”
लेकिन सच्चाई यह है कि अगली बार तो दूर, आज भी ज्यादातर लोग उनका नाम तक नहीं जानते।
और सबसे हैरानी की बात...
अपने ही देश भारत में भी बहुत कम लोग जानते हैं कि मोबाइल पर हमारी आवाज़ को इतनी कम जगह में भेजने की इस तकनीक के पीछे एक भारतीय वैज्ञानिक का इतना बड़ा योगदान था।
SHAMBHAJINAGAR 📍
एक अपंग महिला से रोजी रोटी छीनकर किस बात का
विकाश दिखाया जा रहा है मिट्टी मटके तोड़ना आसान
है गरीबी तोड़ने की कोशिश कब होगी कानून सबके लिए
बराबर है या बस गरीबों के लिए तेज काम करता है....!
कानून का डर हमेशा गरीब को ही काहे महसूस होता है!
टिहरी डैम की कंट्रोल गैलरी नंबर-3 में रात दो बज कर सत्रह मिनट पर पहली गोली चली।
विक्रम तिवारी, अड़तीस साल,भारतीय वायु सेना का एक्स-गरुड़ कमांडो कॉरपोरल, अब डैम सिक्योरिटी का नाइट सुपरवाइजर, उस वक्त दीवार से पीठ टिकाए बैठा था। सामने स्टील की बेंच पर उसकी रुद्राक्ष माला रखी थी। हर रात की तरह शिफ्ट शुरू होने से पहले उसने एक सौ आठ बार महामृत्युंजय बोला था।
"ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान् मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥"
ड्यूटी पर मंत्र मज़ाक का विषय था। जवान कहते, "साहब, दुश्मन आएगा तो माला फेंक कर मारोगे?" विक्रम हँस देता।
उस रात दुश्मन सच में आया। तीन लोग, काले रेनकोट, साइलेंसर वाली MP5। उनका टारगेट गैलरी-3 नहीं था, उसके नीचे वाला मेन ब्लास्ट वॉल्व था। एक चार्ज वहाँ लग जाए तो शिवरात्रि की सुबह जब लाखों लोग हरिद्वार में डुबकी लगाएँगे, ऊपर से साठ लाख क्यूसेक पानी एक झटके में छूटेगा।
विक्रम ने कैमरा फीड में शैडो देखा, रेडियो दबाया, जवाब नहीं आया। उसने साइड आर्म निकाली, लाइट बंद की। अंधेरे में पहली गोली उसके कंधे को चीरती हुई निकली। दूसरी जांघ में लगी। वह कैटवॉक से सीधा टरबाइन शाफ्ट की मेंटेनेंस टनल में गिरा।
टनल आधी पानी से भरी थी। ऊपर से अलार्म बजा, इमरजेंसी फ्लड गेट खुल गया था। पानी छाती तक आया, फिर गर्दन तक। एक गिरी हुई आई-बीम उसके बाएँ पैर पर आ गिरी। वह फँस गया।
हाथ में पिस्तौल थी, पर पानी में स्लाइड जाम। रेडियो डूब चुका। टॉर्च टूटी। ऊपर तीन बूटों की आवाज़, हिंदी में नहीं, पश्तो में कोड। टाइमर बीप कर रहा था — 11:47... 11:46...
विक्रम ने खींचा, पैर नहीं निकला। फेफड़े जलने लगे। दिमाग ने वही किया जो ट्रेनिंग में सिखाया था — पैनिक मत कर। पर शरीर ने नहीं सुना। दिल 170 पर भाग रहा था।
तभी गले से अपने आप आवाज़ निकली। फुसफुसाहट में, बुलबुलों के बीच।
"ॐ त्र्यम्बकं यजामहे..."
मंत्र की लय
बचपन में दादा कहते थे, महामृत्युंजय मौत को रोकता नहीं, मौत के डर को रोकता है। विक्रम ने पहली बार समझा।
उसने आँखें बंद कीं। पानी ठंडा था, पर मंत्र गरम था। हर शब्द पर उसने साँस को बाँटा। "त्र्यम्बकं" पर भीतर साँस रोकी, "यजामहे" पर धीरे छोड़ी। दिल की रफ्तार गिरी — 170 से 140, 140 से 110। धुंध छँटी।
अब उसे याद आया — टनल की दीवार पर मेंटेनेंस रिंच लटका होता है। उसने दाएँ हाथ से टटोला, मिला। बाएँ पैर पर बीम। उसने रिंच को बीम के नीचे घुसाया, लीवर बनाया। पानी में ताकत आधी रह जाती है, पर दिमाग दुगना चलता है।
उसने मंत्र को काउंटडाउन बना लिया। एक जाप — रिंच दबाओ। दूसरा जाप — साँस लो। तीसरा — खींचो।
"उर्वारुकमिव बन्धनान्" — जैसे खरबूजा डंठल से छूटता है। सातवें जाप पर बीम एक इंच हिली। नौवें पर पैर में खून की धार के साथ वह बाहर आया।
वह सतह पर आया, खाँसा, और तुरंत दीवार से चिपक गया। ऊपर दो शैडो टाइमर देख रहे थे। 06:12 बचे थे।
विक्रम के पास गोली नहीं, चाकू नहीं। था सिर्फ गीला शरीर, टूटा कंधा, और गले में वही रुद्राक्ष माला।
उसने पहली बार मंत्र ज़ोर से बोला।
"मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्!"
आवाज़ सुन कर एक हमलावर नीचे झाँका। विक्रम ने रिंच फेंका — सीधा उसके घुटने पर। वह चीखा, फिसल कर पानी में गिरा। विक्रम उस पर कूदा, गला दबाया नहीं, माला से उसकी कलाई लपेट कर हथियार छीना। एक शॉट — जाम। दूसरा — चल गया।
दूसरा हमलावर सीढ़ी से उतरा। हैंड-टू-हैंड। कीचड़ और खून में दोनों फिसले। विक्रम की साँस उखड़ी तो उसने फिर मंत्र पकड़ा। हर मुक्के के बीच एक शब्द। प्रतिद्वंद्वी थका, विक्रम लय में था। आखिरी बार उसने उसकी कनपटी पर रिंच मारा।
टाइमर — 00:47।
विक्रम लंगड़ाते हुए ब्लास्ट वॉल्व तक पहुँचा। चार्ज मैग्नेटिक, डिजिटल डेटोनेटर।
उसने आँखें बंद कीं। आखिरी बार पूरा मंत्र बोला, इस बार डर के लिए नहीं, फोकस के लिए।
"ॐ त्र्यम्बकं यजामहे..."
जैसे ही "मामृतात्" खत्म हुआ, उसने डेटोनेटर का बैटरी पैक उखाड़ दिया। 00:09 पर स्क्रीन काली।
सुबह NIA आई। तीनों जिंदा पकड़े गए। डैम बचा। न्यूज़ में हेडलाइन चली — "टिहरी साजिश नाकाम, एक गार्ड की बहादुरी।"
विक्रम हॉस्पिटल में था। कंधे में सोलह टांके, पैर में रॉड। डॉक्टर ने पूछा, "पानी में सात मिनट से ज्यादा बिना ऑक्सीजन, पैर फँसा, दो गोलियाँ लगीं। तुम बेहोश क्यों नहीं हुए?"
"मैं बेहोश हुआ था, डॉक्टर साहब। पर हर बार जब डूबता था, कोई मुझे गिनती सुनाता था। एक... दो... तीन... मंत्र। वह गिनती मुझे वापस खींच लाती थी।"
वह आज भी हर रात दो बजे ड्यूटी पर माला करता है। जवान अब नहीं हँसते। क्योंकि उन्होंने CCTV में वह क्लिप देखी है — पानी में डूबा आदमी, होंठ हिल रहे हैं, और टाइमर घट रहा है।
"मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्!"
Former Indian cricketer Anil Kumble and his wife Chethana Kumble are seen promoting the beauty of Sanskrit by speaking it fluently in this video.
It’s inspiring to see a sporting icon use his influence to highlight the richness of one of the world’s oldest languages. Wonderful!
इस विदाई को देख.. आँखे नम हो गयीं 😥
बेंगलोर के पास एक़ कस्बे में एक अम्मा रोज
बंदरों को भोजन कराती थीं वो एक रिटायर्ड अधिकारी की विधवा थीं, जो अपनी पेंशन का 75% से ज़्यादा हिस्सा बेजुबानो का पेट भरने पे खर्च करती थीं
उनके देहांत पर वानरराज खुद संवेदना व्यक्त
करने पंहुचे.. ऐसा लगा मानो बालाजी ने अपना
सेवक उन्हें अंतिम विदाई देने भेजा हो 🙏
ईश्वर अम्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें 🚩
ॐ शांतिः शांतिः शांतिः 🙏