@Meenakshig511 जब मुख्यधारा का मीडिया कुछ मुद्दों को पर्याप्त महत्व नहीं देता, तब वैकल्पिक मंचों से आवाज़ें उभरना स्वाभाविक है। यही कारण है कि लाखों छात्र और अभिभावक आज शिक्षकों और स्वतंत्र कंटेंट क्रिएटर्स की बात सुन रहे हैं।
@PoojaYa53979624 यूट्यूब और अन्य डिजिटल मंचों पर कई शिक्षक अब केवल पढ़ाने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि छात्रों को उनके अधिकारों, शिक्षा व्यवस्था की कमियों और सार्वजनिक नीतियों के प्रभावों के बारे में भी जागरूक कर रहे हैं
मीडिया का काम है जनता का ध्यान असली मुद्दों से हटाना। वे बच्चों की शिक्षा पर सवाल नहीं उठाते, बल्कि कोचिंग और यूट्यूब गुरुओं को "सफलता की चाबी" बताकर असली दोषियों को बचाते हैं
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मासूम बच्चे और उनके माता-पिता की गाढ़ी मेहनत की कमाई का पैसा लूटने वाले कुछ कोचिंग सेंटर के सेलिब्रिटी टीचर्स आज भाड़े के वीडियो बना बनाकर ज्ञान दे रहे हैं। सार्वजनिक रूप से महिलाओं को गाली देने वाले, उनकी नक़ल उतारने वाले ये छिछले यूट्यूबर बच्चों की कड़ी मेहनत पर अपनी दुकान सजाते हैं। असल हीरो बच्चे हैं, ये माँ बाप की मेहनत की कमाई के लुटेरे कितना भी कूदें, देशभर के बच्चों को live जोड़कर हमने पेपर लीक के पिड़ित बच्चों को आवाज़ दी तो इनके स्टारडम को बड़ा धक्का लगा है! शिक्षा को धंधा बनाने वालों को दर्द हो तो अच्छा है।वैसे कोचिंग माफिया के खिलाफ मेरा विडियो वायरल करने के लिए धन्यवाद! मेरे शो पर सभी panelist ने बोला कि कोचिंग माफिया पर नकेल कसी जाए।
@anjanaomkashyap गोदी मीडिया का काम है जनता का ध्यान असली मुद्दों से हटाना। वे बच्चों की शिक्षा पर सवाल नहीं उठाते, बल्कि कोचिंग और यूट्यूब गुरुओं को "सफलता की चाबी" बताकर असली दोषियों को बचाते हैं।
@Anamika4S सरकार और गोदी मीडिया बच्चों की असली समस्या पर बात ही नहीं करते। वे सिर्फ़ "एजुकेशन रिफॉर्म" का ढोल पीटते हैं, लेकिन हकीकत यह है कि:सरकारी स्कूल में टीचर की कमी है।कॉलेज में पढ़ाई outdated है।और नीतियाँ सिर्फ़ दिखावे के लिए बनाई
@SavitaK74929291 अंबेडकरवाद कोई व्यक्ति-पूजा नहीं, बल्कि समानता और अधिकारों का आंदोलन है।ज्ञान बढ़ने पर त्याग नहीं होता, बल्कि विचारों की गहराई और प्रासंगिकता और स्पष्ट होती है।प्रश्न पूछना और विमर्श करना ही अंबेडकरवादी सोच का हिस्सा है।
@akrititrip93018 किसी भी समाज को "श्रेष्ठ" कहना तभी सार्थक है जब हम उसके योगदान को स्वीकार करें, लेकिन साथ ही यह भी मानें कि अन्य समाजों ने भी न्याय और सुधार के लिए संघर्ष किया है। अपराध का विरोध करना एक सार्वभौमिक मूल्य है, न कि किसी एक जाति की विशेषता।
@akrititrip93018 अंबेडकरवाद कोई व्यक्ति-पूजा नहीं, बल्कि समानता और अधिकारों का आंदोलन है।ज्ञान बढ़ने पर त्याग नहीं होता, बल्कि विचारों की गहराई और प्रासंगिकता और स्पष्ट होती है।प्रश्न पूछना और विमर्श करना ही अंबेडकरवादी सोच का हिस्सा है।
@sarita25148177 मनुवाद में महिलाओं को अधीन और निर्भर बनाया गया था, जबकि संविधान और अंबेडकरवादी दृष्टिकोण ने उन्हें समान अधिकार, स्वतंत्रता और नेतृत्व का अवसर दिया। और खुलकर बात करणे का अधिकार दिया ..
@news24tvchannel गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करना संविधानिक रूप से संभव है लेकिन राजनीतिक और सामाजिक सहमति आवश्यक है। यह निर्णय केवल संसद और केंद्र सरकार ले सकती है।
@_SamikshaMishra गाय को राष्ट्रीय पशु घोषित करना संविधानिक रूप से संभव है लेकिन राजनीतिक और सामाजिक सहमति आवश्यक है। यह निर्णय केवल संसद और केंद्र सरकार ले सकती है। तो सरकार आपकी है सरकार से बात की
@ThePushprajX संविधान तो सिर्फ़ एक ढांचा है, जिसमें नागरिकों के अधिकार और सरकार की ज़िम्मेदारियाँ लिखी गई हैं। लेकिन जब सत्ता में बैठे लोग इसे अपने फायदे के लिए तोड़-मरोड़ कर इस्तेमाल करते हैं, तब जनता को लगता है कि संविधान ही दोषी है।