@RamaKRoy Dear sir as far as my knowledge is concerned "विद्या ददाति विनयं"
अर्थात्, विद्या (शिक्षा) मनुष्य को विनम्रता प्रदान करती है। फिर दहाड़ने की बात कैसे आई?
@RamaKRoy Dear sir u may be right but as far as my personal opinion is concerned no individual on any post should be allowed to humiliate junior publically. Shame on ECI ...
@KVS_HQ The cover page of trs' attendance register and students attendance register should be uniform for entire KVS like Trs' diary cover page. It must bear KVS and its logo, plz do the needful.
माता-पिता के निधन पर 13 दिन सवैतनिक शोक अवकाश की मांग!
राज्यसभा सांसद डॉ. दिनेश शर्मा ने माता-पिता के निधन पर सरकारी व निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को 13 दिन का अनिवार्य सवैतनिक शोक अवकाश देने की मांग उठाई है।
मीनाब या तेहरान की किसी चौड़ी सड़क पर, काले वस्त्रों में उमड़ी भीड़ के बीच मुट्ठियाँ एक साथ उठी हुई हैं। कैमरों के फ्रेम में सैकड़ों चेहरे हैं। क्रोध, शोक और संकल्प की धुँधली-सी ज्वाला से दहकते हुए। सोशल मीडिया पर प्रसारित एक वीडियो बताता है कि यह 180 स्कूली बच्चियों की सामूहिक अंतिम यात्रा का दृश्य है, जो अमेरिकी-इज़राइली हवाई हमले में मारी गईं। वीडियो के साथ लिखा गया, “कोई युवा रक्त अनुत्तरित नहीं जाता… अमेरिका को मध्य-पूर्व से रक्त और आत्मा के साथ खदेड़ा जाएगा।”
इस दृश्य में केवल अंतिम यात्रा नहीं, एक राष्ट्र का उफनता हुआ मन भी दिखाई देता है। मुट्ठियों की वह लय, जो शोकगीत और युद्ध-घोष के बीच कहीं काँपती है, बताती है कि मृत्यु कभी अकेली नहीं आती; वह अपने साथ स्मृति, आक्रोश और प्रतिशोध की छायाएँ भी लाती है।
ईरान ने कहा है कि शनिवार को लड़कियों के प्राथमिक विद्यालय पर हुए हमले में 180 से अधिक बच्चियाँ और स्टाफ के सदस्य यानी शिक्षक मारे गए। यह दिल दहला देने वाली घटना है। हजारों लोग अंतिम संस्कार में उमड़े। काले चादरों में लिपटी महिलाएँ, अलग खड़े पुरुष, हाथों में झंडे और नारों की गूँज: “डेथ टू अमेरिका”, “डेथ टू इज़राइल”, “नो सरेंडर।” शोक यहाँ एक सार्वजनिक भाषा बन गया है और उस भाषा में आँसू और आक्रोश एक-दूसरे में घुल गए हैं।
संयुक्त राष्ट्र की उपमहासचिव रोज़मेरी डीकार्लो ने कहा कि वे इन मौतों की रिपोर्टों से अवगत हैं और अमेरिकी अधिकारियों ने जाँच का आश्वासन दिया है। संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार कार्यालय ने “तत्काल, निष्पक्ष और व्यापक जाँच” की माँग की है। अंतरराष्ट्रीय मानवीय क़ानून स्पष्ट है। किसी विद्यालय या अस्पताल पर जानबूझकर हमला युद्ध अपराध की श्रेणी में आता है। परंतु युद्ध का धुआँ अक्सर सत्य की रेखाओं को धुँधला कर देता है।
ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने नए खोदे गए कब्रों की तस्वीर साझा करते हुए लिखा, “ये 160 से अधिक मासूम बच्चियों की कब्रें हैं।” शब्द मिट्टी से भी भारी हो सकते हैं; वे इतिहास की छाती पर रखे पत्थर जैसे हो जाते हैं।
इज़राइल ने कहा है कि उसे उस क्षेत्र में किसी हमले की जानकारी नहीं है। इज़राइल के दुष्ट हमलावरों ने पहले भी स्कूलों और अस्पतालों पर हमले किए हैं। युद्धों में अक्सर पहले विस्फोट होता है, फिर अस्वीकार, फिर जाँच और अंत में किसी शब्द का चयन: “दुर्घटना”, “कोलैटरल डैमेज”, “ग़लत पहचान।” लेकिन जिन कक्षाओं में अब केवल टूटी खिड़कियाँ और बिखरे बैग बचे हैं, वहाँ शब्दों की यह कूटनीति बहुत दूर की प्रतिध्वनि लगती है।
कौन थीं वे बच्चियाँ? जैसे तितली के पंख पर पड़ा धूल का महीन कण। यहाँ वे ज्ञानोदय की तितलियाँ थीं; होमवर्क लिखती, भविष्य की वर्तनी सीखती, गणित की कठिनाइयों से जूझती बच्चियाँ। अब वे स्मृति की पारदर्शी परत बन गई हैं। ब्लैकबोर्ड पर लिखा कोई अधूरा वाक्य शायद “हमारा देश” अब राख में ढका है।
सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो में उठती मुट्ठियाँ केवल प्रतिरोध का संकेत नहीं; वे उस सामूहिक आघात की मुद्रा हैं, जिसमें राष्ट्र स्वयं को पुनर्परिभाषित करता है। पर इतिहास जानता है कि हर प्रतिशोध एक नया शोक जन्म देता है। हर नारा भविष्य की किसी और कक्षा को अनाथ कर सकता है।
मीनाब की हवा अब भी वही है, पर उसमें बारूद की महीन गंध घुली है। और उस गंध में एक प्रश्न तैरता है, क्या सभ्यता की सबसे बड़ी परीक्षा युद्ध जीतना है या बच्चों को सुरक्षित रखना? जब छोटे-छोटे ताबूत एक पंक्ति में रखे जाते हैं, तब भू-राजनीति का विशाल मानचित्र सिकुड़कर एक माँ की हथेली जितना रह जाता है। और उस हथेली पर इतिहास की सारी महाशक्तियाँ भी हल्की पड़ जाती हैं।
ऐसा लगता है यहूदियों के इस देश ने हिटलर की राह पकड़ ली है और अमेरिका का हाथ इस विनाशकारी शक्ति की पीठ पर है। नन्ही बच्चियों को निशाना बनाना निंदनीय है और पापात्माओं का काम है।
जापान पर परमाणु बम गिराया और ढाई लाख इंसानों को लील गए। कोरिया के दो टुकड़े कर दिए। वियतनाम को बर्बाद कर डाला। इराक को बर्बाद किया। अफगानिस्तान को तबाह किया। फिलिस्तीन को कब्रिस्तान बना डाला। सीरिया को जलाया। चिली, ब्राजील, उरुग्वे, पैरागुआ और अर्जेंटीना को बर्बाद किया। तालिबान को खड़ा किया। ISIS को खड़ा किया। दुनिया भर में आतंकवाद और युद्ध को बिजनेस बना लिया। वेनेजुएला पर हमला करके राष्ट्रपति को उठा ले गए। अब ईरान की तबाही का अध्याय जारी है।
मकसद है दुनिया भर के तेल और व्यापार पर कब्जा करना और अपने हथियार बेचना। नरसंहार और तबाही इनका सबसे बड़ा एवं एकमात्र व्यापार है। इंसानी खून पीना ही इनका एकमात्र शौक है। जो देश इसके चक्कर में पड़ा, तबाह हो गया।
अमेरिका का लोकतंत्र, तानाशाही के खिलाफ लड़ाई और शांति की बातें एक खून सना पर्दा है, जिसके पीछे करोड़ों की संख्या में इंसानी लाशें चीख रही हैं।
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कल एवं परसों की KVS/NVS की परीक्षा में शामिल होने वाले सभी प्रतियोगियों को शुभ कामनाएं...all the best!