नंद वंश, मगध पर काबिज था।
राजधानी पाटलिपुत्र मजबूत दीवारों, चौकियों और विशाल सेना से सुरक्षित थी। चाणक्य, नंदों से अपमानित होकर प्रतिशोध की प्रतिज्ञा ले चुके थे।
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उन्होंने चंद्रगुप्त को तैयार किया। आस-पास के असंतुष्ट सरदारों, योद्धाओं और शक्तियों को इकट्ठा किया। योजना सीधी थी। पाटलिपुत्र पर चढ़ाई कर नंद शासन उखाड़ फेंकना।
चंद्रगुप्त ने कई बार हमला किया।
पर हर बार परिणाम एक जैसा रहा।
नगर के बाहरी इलाकों में कुछ सफलता मिलती, फिर नंदों की संगठित सेना, किलेबंदी और भीतरी संसाधनों के आगे आक्रमण टूट जाता। और इस बीच नंद के दूसरे समर्थक पीछे से आकर उन्हें घेर लेते। भागना पड़ता।
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बार-बार की असफलता से सेना थक गई। साथी बिखरने लगे और चंद्रगुप्त स्वयं हताश हो गया। घायल औऱ पराजित, वह जंगलों-गाँवों में छिपता रहा।
इसी दौरान वह एक गाँव पहुँचा।
वहाँ एक बुढ़िया खिचड़ी खा रही थी। चंद्रगुप्त भूखा था, उसने भोजन की इच्छा जताई। खिचड़ी पेश हुई। अभी तवे या थाली में गर्म थी। चंद्रगुप्त ने जल्दबाजी में बीच के गर्म हिस्से में हाथ डाल दिया।
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हाथ जल गया।
यह देखकर बुढ़िया ने सहज स्वर में कहा- बीच का हिस्सा गर्म है, पहले किनारे से खाओ। अंत में बीच भी अपने आप हाथ में आ जाएगा।
चन्द्रगुप्त को बात समझ आई। पाटलिपुत्र, खिचड़ी का वही गर्म मध्य था। नंदों की शक्ति, कोष, सेना, गढ़ सब वहीं केंद्रित थे। बार-बार सीधे राजधानी पर टूट पड़ने का मतलब उसी जलते कुएँ मे कूद जाना था।
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इसके बाद रणनीति बदल दी गई। पहले सीमांत प्रदेश, छोटे-छोटे नंद-समर्थक राज्य, दुर्बल सूबे और बाहरी दुर्ग जीते गए। अंततः पाटलिपुत्र मे सुरक्षित बैठा नन्द, दरअसल वहां का कैदी बनता गया।
पाटलिपुत्र अगले धावे मे ढह गया।
यह कथा जनश्रुति है।
मगर कई बार अलग-अलग जगह पर अलग-अलग तरीके से सुनाई जाती है। मुद्राराक्षस के हवाले से, यही दृश्य भारत एक खोज में, चाणक्य के माध्यम से दिखाया गया है।
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कॉकरोच जनता पार्टी या राहुल गांधी अभी भी अलग-अलग मुद्दों पर सरकार को घेर रहे हैं। सबको मालूम है की धर्मेंद्र प्रधान या के ज्ञानेश कुमार अपनी मर्जी से नहीं चलते। सारी गड़बड़ की गंगोत्री तो ऊपर है।
मगर फिलहाल, वे एक-एक कर भट्ट प्रतिहारकों का शिकार कर रहे हैं। ऐसे लोग जो साफ-साफ दागी है, एक्सपेंडेबल है। जिसे शख्स को, डिफेंड करना, भाजपा के समर्थको के लिए लाभकारी नहीं।
संभव भी नहीं। यदि किया भी, तो हर नए शख्स के साथ, उसी पैटर्न मे बचाव- पुराना, दोहराव भरा, उबाऊ और हास्यास्पद लगने लगता है।
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अंततः मजबूरी में लिए गए इस्तिफे के साथ, सरकार की इन्विंसिबिलिटी की छवि मटियामेट होती है। मंत्रियों और आज्ञाकारी अफसरों में असुरक्षा का भाव बढ़ता है। हताशा बढ़ती है।
दिल्ली और जंतर मंतर के पास, पुलिस औऱ पैरा मिलिट्री के तमाम लोग, इस बार किसी क्रूर दमन से बचते दिखते हैं। बैज, चेहरा पहचान छुपा रहे। सादी वर्दी में पुलिसिया डंडे लेकर घूमने वाले सड़क छाप गुंडे, इस बार गधे के सिर से सींग की तरह गायब है।
यह भी, सरकार की एक रक्षा पंक्ति टूटने का लक्षण है।।
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बहुत से लोग बीजेपी की, सीजेपी से अंदरुनी सेटिंग की आशंकाएं भी जाहिर कर रहे हैं।
जो अगर है भी, तब भी उनपर शको- शुबहा जाहिर करने का फिलवक्त कोई औचित्य नहीं। हम देख चुके हैं, कि वे लोग आग लगाने में अच्छी भूमिका अदा करते हैं। पर बुझा पाने की उनकी कुव्वत नहीं। न वैसी स्टेंडिंग डिंग है, न विश्वसनीयता, न स्किल।
यह लोग अगर भाजपाई हैं, तो भाजपा का अब तक का सबसे डिजास्टर एक्सपेरिमेंट है। अभी तक, वे राहुल गांधी के बेनामी दस्ते की तरह, उनके लाभ का काम करते दिखाई देते हैं।
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मुझे नहीं मालूम की क्या राहुल गांधी, कोई शतरंज की बाजी बिछाकर बैठे हैं।
या फिर मोदी सरकार की ग्रहदशा खराब है, जो राहु केतु मंगल शनि सब एक ही घर में आकर बैठे हुए हैं। या कि मोदी सरकार ने, एक दशक मे लोगो के जेहन मे राजनीतिक प्रतिबद्धता ठूँस ठूँसकर, उसके लाउड, ओवर- एक्सप्रेशन की इतनी ट्रेनिंग दे दी,
कि अब वह बैकफायर कर रहा है।
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वास्तविकता जो भी हो।
लेकिन ढाई हजार साल के बाद एक बार फिर, पाटलिपुत्र में खुद को सुरक्षित समझकर बैठा धनानंद, दरअसल घिरा हुआ है। वह अपने तमाम रक्षकों, अपने ह्यूमन- इंस्टीट्यूशन शील्ड को..
एक-एक कर गिरते देख रहा है।
ज्ञानेस कुमार को उन सारी रिपोर्ट को पढ़ना चाहिए, जो SIR को लेकर छपी हैं। बाकी दोनों आयुक्तों को भी बुलाकर पढ़ाना चाहिए। आज संडे है। इस्तीफ़ा दे देना चाहिए। ठीक है संविधान में लिखा है कि चुनाव आयुक्त को सरकार नहीं हटा सकती। महाभियोग मुश्किल है। SIR को लेकर जो ख़बरें छपी हैं, वो तो ग़लत नहीं हैं। क्या उन ख़बरों को आयोग नकार पाया? एक भी ख़बर के संदर्भ में छपा हुआ बयान जारी कर पाया कि ग़लत हैं? इसीलिए तीनों चुनाव आयुक्तों को इस्तीफ़ा देना चाहिए और संसद मार्ग थाने जाकर ख़ुद अर्ज़ी देनी चाहिए कि हमारे ख़िलाफ़ FIR कीजिए और जाँच कीजिए। चुनाव आयोग शर्मनाक आयोग बन चुका है। इस्तीफ़ा नहीं देंगे तो जनता आपको भारत का मुख्य शर्मनाक आयुक्त कहेगी। अगर लगता है कि आप सही हैं तो सामने आकर कह दीजिए। दिल्ली पुलिस के पीछे मत छुपिए।
There will be many people who will say Congress Government opened a case of Gyanesh Kumar of 2006 and it is vendetta. Remind them, Sanjiv Bhatt who opposed Narendra Modi is in Jail. Case was of 1990. He is in Jail since 2018
जिन मित्रों ने ‘हिंसा-अहिंसा और भगत सिंह’ प्री बुक करवाई हैं उनके लिए यह सूचना कि प्रकाशक ने सूचना दी है कि दो-तीन दिन में किताब प्रिंट होकर आ जाएगी।
पहले 500 कॉपीज़ पर ही हस्ताक्षर करने की बात हुई थी लेकिन अब मैंने तय किया है कि हर प्री बुक किताब पर हस्ताक्षर करूँगा चाहे जितना समय लगे।
पाठकों के स्नेह से बढ़कर क्या है मेरे लिए 🙏
ढोंग किसे कहते हैं?
जब आदमी जैसा है, उससे थोड़ा अच्छा, बड़ा, महान या जरूरत पड़ने पर बिल्कुल उल्टा दिखने की कोशिश करे।
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अकेले में वह जो चाहे करे।आईने के सामने गाली दे, मुँह चिढ़ाए।आईना कोई राय नहीं बनाता। राय दर्शक बनाता है।
इसलिए ढोंग की पहली शर्त दर्शक है।
पहले मोहल्ला, बाजार, रिश्तेदार और पंचायत काफी थे। फिर रेडियो, टीवी और अब सोशल मीडिया। मंच बड़ा होता गया, दर्शक बढ़ते गए।
कैमरा ढोंग का पक्का साथी बन गया।
जहाँ एक हो, दूसरा दिखने लगता है। आदतन ढोंगी का अभिनय पहले से तय होता है, इसलिए कैमरा भी पहले से मौजूद रहता है।
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थिएटर या फिल्म का अभिनेता कैमरा खुलते ही किरदार में डूब जाता है।
बेन किंग्सले गाँधी बन जाते हैं, रोशन सेठ नेहरू। मगर शूटिंग खत्म होते ही वे असल जीवन में लौट आते हैं। पर जो आदमी शौचालय छोड़कर हर जगह कैमरे की जद में हो, उसे हर वक्त ढोंग करना पड़ता है।
लौटने का मौका ही नहीं मिलता।
बचपन में श्रीदेवी की फ़िल्म "नगीना" देखकर पता चला था कि इच्छाधारी नागिन को चौबीस घंटे में एक बार मूल रूप में आना पड़ता है। शायद कैमराहीन शौचालय ही वह जगह है जहाँ ये इच्छाधारी अपना असली रूप धरते हैं।
दिन भर के ढोंग के बाद असल रूप में आना बड़ा रिलीफ होता होगा। वही रिलीफ हम जैसों को देवालयों में जाकर मिलती है।
तभी कहावत बनी:
देवालय से बड़ा शौचालय।
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असली मजा तब है जब आदमी एक साथ दो किरदार निभाए।
अमिताभ बच्चन आखिरी रास्ता में बेटे के रूप में वर्दी पहनकर कानून की रक्षा करते हैं और बाप बनकर कत्ल पर कत्ल करते हैं। दर्शक जानते हुए भी कि दोनों एक ही हैं, कहानी के प्रभाव में दोनों से जुड़ जाता है,
आँसू बहाता है, गुस्सा होता है।
फिल्म हिट हो जाती है।
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ढोंग अनादि, अनंत और सनातन है।
आख्यानों में शामिल है।
इंद्र ने गौतम का वेश धरकर अहिल्या से अनाचार किया। रावण ने साधु का रूप धरा, 35 बरस भिक्षा मांगने का नकली सर्टिफिकेट दिखाकर प सीता को उठा लिया।
और इस काम में मारीच की बलि दे दी, जो स्वर्ण मृग होने का ढोंग कर रहा था। मनुष्य होकर पशु बनने वालों के लिए यह सीख है।
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पर हम रामायण पढ़ने का ढोंग करते हैं, सीखते नहीं। सीख तो कहावत से लेते हैं - हाथी के दाँत खाने के और, दिखाने के और।
ढोंग पहचानना मुश्किल नहीं।
तीन सवाल काफी हैं।
1-जो कह रहा है, क्या खुद करता है?
2-कैमरा हट जाए, तो विचार वही रहता है?
3- शब्दों और काम के बीच कितनी दूरी है?
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ढोंग की कहानी दर्शक के बिना, अधूरी है।
जिसे मालूम हो कि नेता, अभिनेता, बाबा या समाजसेवी कैमरे के लिए, एक झूठा चेहरा लेकर आया है। फिर भी वह तालियाँ बजाता है।
वह सच्चाई न जानने का ढोंग कर रहा है।
जब ढोंगी और दर्शक एक-दूसरे की सुविधा बन जाएँ, तब ढोंग व्यक्तिगत कमजोरी नहीं रहता। वह सामूहिक सहमति, फैशन, फेसबुक पोस्ट और व्हाट्सऐप स्टेटस बन जाता है।
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ढोंग की सबसे बड़ी उपलब्धि यही है
वह झूठ को शर्मनाक नहीं रहने देता। उसे चमकाता है, प्रेस कॉन्फ्रेंस करवाता है, लाइक, कमेंट और तालियाँ दिलवाता है।
एक आदमी का ढोंग बड़ा अपराध नहीं; समाज का ढोंग बन जाना विध्वंसक है।ढोंगी समाज, हकीकत से कट जाता है।
मई-जून की गर्मी में शिमला की ठंड का ढोंग करता है, फटेहाली में अमीरी का। भीतर से फ़टी पड़ी है, पर दूसरों को मिट्टी में मिलाने का उद्घोष करता है।
बीमारियों पर इलाज नहीं, क्रीम-पाउडर लगाकर गर्व करता है। ढोंगी का शरीर और समाज, दोनों खात्मे की तरफ बढ़ते हैं।
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इस नाश का जिम्मेदार सिर्फ मंच पर खड़ा ढोंगी नहीं। पर्दा उठाने वाला, पर्दे के पीछे उद्यम चलाने वाला और तालियाँ बजाने वाला दर्शक भी बराबर का शरीक है।
मगर ढोंग की एक उम्र होती है।
वह तभी तक तना रहता है जब तक सच से सामना न हो। ढोंग में सत्य के साथ प्रयोग की हिम्मत नहीं होती। तमाम किलेबंदी के बावजूद, सच की तूफान की आहट सुनते ही,
वह झुक जाता है।
🙏
Long Post: There are many questions about how Police is brutal with IYC, Congress, including top leaders like Rahul Gandhi, Activists, Neha Bora but they haven’t assaulted top CJP faces till now. Let me answer this. You can accuse BJP of many things, but they are not stupid as far as Political Strategy is concerned.
Some of the CJP faces, they have been associated with AAP, many of us know. They also surely are cosy with AAP leaders. But this is not about them. BJP is not concerned about them. This is about the thousands of people who came on streets in Jantar Mantar, other protests, students, common people, some have travelled long distance, and the millions who support on Social Platforms. None of them care if someone had past associations with AAP nor do they have conspiracy hot takes. Most are people who had never been associated with politics. For the first time they got vocally involved. They don’t see the CJP faces as politicians. They see them as one of them.
BJP knows one thing. Unleashing Police on Political leaders and activists might be a common thing during protests. But CJP has caused mass resentment against BJP, Narendra Modi, among students and young adults. Touching the key CJP faces, the people who support them will see it as attacking them personally. And they know, the damage will be devastating for them. They have the data, the analysis. They know the consequences. So no matter how much they resent the guts of CJP, till now they have been careful. Of course at any point they might change strategy. Or some over zealous Cop might take things in his hand. But the consequences will still be terrible.
This is also the same reason why attacking CJP online is a bad strategy. Congress leaders have been smart and matured. No top leader has ever attacked CJP. No frivolous statements. Many have helped. But stray or vicious comments by Congress supporters about CJP is massively hurting Congress. The same CJP supporters on these platform, who love Rahul Gandhi and naturally align with his thoughts as a national leader, they resent any attack on CJP by anyone as they see it as an attack on themselves. To see the damage, go beyond ur curated timeline on Twitter. Check comments on Reddit etc. Do a complete sentiment analysis of all Social Platforms. You will get the answer
जिस घटना की स्वतंत्र जांच की रिपोर्ट नहीं आई। जिसमें आरोपी की ओहचन गोपनीय हो, महज इजरायल के नेतन्याहू की हाँ में हाँ मिलाते हुए सारा दिन पर्ची में लिखीं बातों का फुटेज खाता रहा नाथू-भक्त। अंतरराष्ट्रीय मीडिया अभी भी घटना को संदिग्ध मान रहा है और इसे इजरायल के ही फ्लैग ऑपरेशन होने की आशंका है।
एक समय था जब प्रधान न्यायाधीश और मुख्य चुनाव आयुक्त का ज़िक्र आते ही, निजी बातचीत में भी लोगों की भाषा बदल जाती थी। वाक्य और व्याकरण से लेकर शब्दों का चयन सब लोकतांत्रिक तरीके से व्यवस्थित हो जाता था। दोनों संस्थाओं ने जनता की भाषा में जो कमाया था, वह वाकई शानदार उपलब्धि थी। इन दोनों के हाथों पुरस्कार लेना बड़ी बात मानी जाती थी। पिछले दिनों क़ानून के छात्र ही चीफ जस्टिस से डिग्री लेने से इंकार कर चुके हैं। उनके मामले में भाषा अभी नहीं बिगड़ी है मगर भाषा में तल्ख़ी आती जा रही है। यह दीवार टूटी है, चीफ जस्टिस को ट्रोल करने से। सरकार के समर्थकों ने खुल कर गालियाँ दी तब भी जनता ने अपनी भाषा को संभाले रखा। सुप्रीम कोर्ट और चीफ जस्टिस के मामले में विश्वास और संयम की भाषा दरकती दिख रही है। कोर्ट को इसकी चिंता करनी चाहिए। देखना चाहिए कि तीनों चुनाव आयुक्तों और चुनाव आयोग की भाषा के साथ क्या हुआ है।
चुनाव आयुक्तों के मामले में भाषा ने आदर की राह छोड़ दी है। ज्ञानू, डाकू, चोर, गद्दार कहा जा रहा है। ज्ञानेस कुमार से पहले राजीव कुमार ने जनता की भाषा को धक्का दिया।राजीव कुमार ने थर्ड क्लास शायरी सुनाकर शायरी के प्रति उसकी चाहत का मज़ाक उड़ाया। घटिया शायरी के ज़रिए राजीव जनता को चैलेंज कर रहे थे कि वह भी भाषा के घटिया स्तर पर आ जाए। तब भी जनता ने अपनी भाषा में आयोग के प्रति आदर का साथ नहीं छोड़ा। अब आदर जा चुका है। यह तभी होता है जब आयोग अपना विश्वास खो देता है।
इससे भले फ़र्क न पड़े। जी-प्रिंटर से फिर कोई रिज़ल्ट निकल आएगा, होता रहेगा यह सब। जैसे गोदी मीडिया के केस मे हो रहा है। पब्लिक नहीं देखती है तब भी गोदी मीडिया के संसाधन और चमक में कमी नहीं आई है। क्योंकि पब्लिक के टैक्स का सैंकड़ों करोड़ गोदी मीडिया को ही मिलता है। विज्ञापन में कमी नहीं आई है लेकिन सरकार भी अब नहीं पूछती। वर्ना प्रधानमंत्री खुद रील नहीं बनाते। गोदी मीडिया को भीतर से पता है कि उसकी साख ख़त्म हो चुकी है। सत्ता का संरक्षण और अहंकार बचा हुआ है। अकेले दम पर चलना होता तो कब का सब अपनी दुकान बंद कर चुके होते और इन्हीं गोदी ऐंकरों को निकाला जा चुका होता। तो आयोग के आयुक्तों को लग सकता है कि उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ेगा। बस इतना याद रखना चाहिए कि जनता उन्हें गोदी मीडिया की तरह देखने लगी है।
अब भी समय है कि बहुत कुछ बचाया जा सकता है। SIR एक फ्रॉड प्रक्रिया है। इसका काउंटर इस फ्रॉड दलील से नहीं कर सकते कि विपक्ष भी चुनाव जीतता है। SIR को लेकर जो सवाल आए हैं वो तब भी वैलिड हैं, जब विपक्ष चुनाव जीत रहा है। FORM-7 का ही मामला काफी है कि इस फ्रॉड को बंद कर दिया जाए। चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया को पारदर्शी बचाने के बारे में सोचा जा सकता है। सीसीटीवी फुटेज को सार्वजनिक किया जा सकता है। चुनाव आयुक्तों के संरक्षण के कानून को समाप्त किया जा सकता है।
बाकी ज्ञानेस को तय करना है कि वो अपनी और संस्थान की साख को लेकर क्या सोच रहे हैं। भारत के कई अधिकारियों को एक चीज़ की आदत लग जाती है। मैं समझता हूँ। अगर ज्ञानेस को कारकेड, PSO, हूटर वाली गाड़ी और सर्किट हाउस की लत लग गई है तो एक डील की जा सकती है। उनकी इस लत के लिए करोड़ों वोटर के अधिकार नहीं छीने जा सकते। वही करोड़ों वोटर मिलकर क्राउड फंडिंग से तीन कार खरीद कर ज्ञानेस को दे दें। एक कार में ज्ञानेस चलेंगे और दोनों आगे पीछे रहेंगी। दो बाइक खरीद कर दे दें तो कार के आगे हूटर बजाते चलेंगे। एक सुविधा और देनी चाहिए। सर्किट हाउस में ठहरने की लत लग जाती है, इसका परमानेंट पास सरकार दे सकती है। इन चीज़ों को देकर ज्ञानेस को विदा कर देना चाहिए। बाकी अगर आप चाहते हैं कि वोटर लिस्ट बेईमानी से बने तो इस पोस्ट पर ध्यान न दें।
Almighty. Grant ease to those facing hardship. You know their needs better than anyone else. You know their pain, anxieties, worries & fears. We pray for them. Bless & heal them from all the hurt. Refill them with strength & restore their hope! Ameen!
संघ, भाजपा के लोग भगत सिंह को अपना हीरो बताने की कोशिश करते हैं, लेकिन भगत सिंह ऐसे संगठनों को क्या कहते थे?
जानने के लिए पढ़िए- 'हिंसा-अहिंसा और भगत सिंह' https://t.co/rNijiTzunX
गाँधी का पता...
1869 से 1874 तक अगर आप मोहन को पत्र लिखते, तो एड्रेस होता-
दीवान हरजीवन रायदास की हवेली,
भाठिया बाजार पोरबंदर स्टेट,
काठियावाड़ ऐजेंसी
फिर पिता राजकोट शिफ्ट हो गए। मोहन ने यहां प्रारंभिक शिक्षा ग्रहण की। अब आपकी चिट्ठी का एड्रेस होता
काबा गांधी नो डेलो
राजकोट, सौराष्ट्र
फरवरी 1887 मे भावनगर के शामलदास कॉलेज मे दाखिला लिया, मगर पढ़े नही। 10 अगस्त 1888 को मुंबई के लिए निकले। इरादा बैरिस्टरी पढ़ने के लिए इंग्लैंड जाने का था।
19 सितंबर 1888 कोगांधी ने ब्रिटेन मे पहली रात बिताई।
पता था -विक्टोरिया होटल,
ट्राफल्गर स्क्वेयर लंदन (यूके)
•••
होटल मंहगा था। वे किराये पर कमरे लेकर रहने लगे। 3 एड्रेस की जानकारी स्पस्ट मिलती है।
60, टालबोट रोड,
बेजवाटर, लंदन W25LJ
स्टोर स्ट्रीट, लंदन
WC1E7PL
20 बैरॉन कोर्ट रोड
वेस्ट केन्सिंगटन W149DU
●●
भारत लौटे, मुम्बई में वकालत की प्रैक्टिस शुरू की। जिरह में कमजोरी का अहसास हुआ। बार की प्रैक्टिस नही की। तो वे लीगल ड्राफ्टिंग, कॉन्ट्रेक्ट, नेगोशिएशन वगैरह की तरफ मुड़ गए।
याने राम जेठमलानी टाइप आपराधिक मुकदमो की नही, बल्कि किसी इनकमटैक्स के वकील वाली प्रेक्टिस थी। और इसी क्रम में एक व्यापारी ने अफ्रीका भेजा।
वहां वकालत भी सफल हुई, नेतागिरी भी।
●●
20 साल अफ्रीका पर प्रवास में बैरिस्टर गांधी के कई अड्रेस हुए। मगर बैरिस्टर गांधी, वर्ष 1900 के बाद खत्म होता गया। उसके एड्रेस थे...
53 ए, जो स्लोवो स्ट्रीट
डरबन, दक्षिण अफ्रीका
15, पाइन एन्ड गार्डन रोड
जोहान्सबर्ग, 2192, साउथ अफ्रीका।
दूसरा एड्रेस अब सत्याग्रह हाउस कहलाता है। यहां म्यूजियम भी है, और गेस्ट हाउस भी।
●●
नेता गांधी की धमक सन 1900 के बाद सुनाई देने लगती है। उसने पहले फीनिक्स आश्रम बनाया।
वकालत अभी भी कुछ करते ही थे। मगर अब सामाजिक काम बढा था, सामाजिक दायरा भी।लोग जुड़े। यह कम्युनिटी ही फीनिक्स फार्म कहलाती। इसका अड्रेस था
फीनिक्स फार्म
लेनेसिया, प्रोविंस- गौटेंग
साउथ अफ्रीका
जेल यात्रायें बढ़ गयी थी। 1909 में जेल से वापसी पर उन्होंने एक फॉर्म पर रहना शुरू किया। मिनिम्लिस्ट जीवन, और सत्याग्रह के फलसफे उनके साथ थे। अड्रेस था
मोहनदास करमचंद गांधी।
फीनिक्स फार्म, डरबन
क्वाजुलु नेटाल, दक्षिण अफ्रीका
अक्टूबर 1912 में यहीं गोखले, गांधी से मिलने आते हैं। स्वदेस लौटने औऱ कांग्रेस की बागडोर सम्हालने का आमंत्रण देते हैं।
गांधी स्वीकार करते हैं।
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जनवरी 1915 में भारत लौटते हैं। पर अब राजकोट या पोरबन्दर के घर मे रहना उनकी शैली नही रह गयी। अहमदाबाद में वे एक आश्रम बनाते हैं। जगह शहर से दूर थी।
साबरमती के किनारे, कुछ मिट्टी के घर, गांधी का आवास बने। एड्रेस फिर बदला। अबकी बार -
मोहनदास करमचंद गांधी।
साबरमती आश्रम, अहमदाबाद
बम्बई प्रान्त, भारत।
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12 मार्च 1930 को गांधी साबरमती आश्रम से निकले। दांडी यात्रा के लिए.. और फिर कभी नही लौटे।
उनका प्रण था कि जब तक देश आजाद न हो, साबरमती न लौटेंगे।
पर कहीं तो रहना होगा- गांधी जेल में रहे।
फिर 45 दिन SS राजपूताना में रहकर इंग्लैंड पहुचे। राजा का बुलावा था। बकिंघम पैलेस में चाय पी। और राजा को ठेंगा दिखा दिया।
महल की चाय पीने के चार माह के भीतर ही ..
यरवदा जेल की चाय पी रहे थे।
तीन साल बाद मुक्त हुए। यहां वहां घूमते भटकते रहे। अब तक मोहनदास, महात्मा गांधी बन चुके थे। चिट्ठियों पर लिखा होता
महात्मा गांधी -
""जहां हों, वहाँ"
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जिंदगी के एक निवास अभी बाकी था।
आखरी निवास!!
पर उसके पहले गांधी के बदलते पतों पर जो छूट गया है, नोट करें - जॉहन्सबर्ग जेल , ट्रांसवाल जेल , प्रिटोरिया जेल , नेटाल जेल..
साबरमती जेल, चम्पारण जेल, यरवदा जेल, आगा खां पैलेस,
और कोचरब आश्रम। जो अहमदाबाद के बाहर, कोचरब गांव में एक मित्र का होलीडे होम था। अफ्रीका से लौटने के बाद, गांधी कुछ वक़्त कोचरब में रहे। तब साल भर बाद, साबरमती में आश्रम बनाया।
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1930 मे साल्ट मार्च के लिए निकले, तो साबरमती आश्रम कभी न लौटे। अगले 5 साल- या तो जेल में गुजरे, अथवा अछूतोद्धार यात्राओ में यायावर जीवन जिया।
तभी जमनालाल बजाज ने उन्हें पत्र लिखा, वर्धा आकर रहने की इसरार की। नागपुर से 80 किमी दूर ये जगह गांधी को जँची। वे शहर में नही रहना चाहते थे, तो किसी ने पास मे शेगाँव का सुझाव दिया।
ये गाँव, दलित बहुल था।
वन थे, शांत था।
गांधी की सहमति मिली, तो जमनालाल फटाफट निर्माण कराने को उद्यत हुए। पर गांधी ने कहा- स्थानीय माल, स्थानीय कारीगर, केवल 100 रुपये का बजट
इतने बजट मे कोई माटी की कुटिया ही बन सकती थी
वही बनी। बापू 1936 में यहां रहने आए।
●●
बच्चन की एक पंक्ति है-
मैं अब जमकर बैठ गया हूँ,
घूम रही है मधुशाला
गांधी जहान से दूर, इस वन में जमकर बैठ गए। दुनिया भर की शख्सियतें, जिनसे मिलने को आपको एपोइंटमेंट लेनी पड़े, वे यहां कतार लगाकर गांधी से मिलने की प्रतीक्षा करते।
एक कुटी बापू का ऑफिस थी। अमृत कौर, महादेव भाई और हरिभाई वहां टाइपराइटर खटखटाते। आश्रम का हिसाब रखते, चिट्ठियां टाइप करते।
चिट्ठियां किसी दूसरे शेगाँव पहुँच जाती। असल मे महाराष्ट्र मे शेगाँव नाम का दूसरा गांव है, जहाँ साईंबाबा की श्राइन है। तो बापू के सुझाव पर इस गाँव का नाम, सेवाग्राम रख दिया गया।
आज भी वह इसी नाम से जाना जाता है।
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यह दौर लार्ड लिनलिथगो का था। 1939-40 जब युद्ध शुरू होने वाला था। गांधी क्लियर थे। पहले आजादी दो, भारत छोड़ दो, फिर आपके सहयोग की सोचेंगे।
लिनलिथगो के पसीने फूट रहे थे। सम्पर्क के लिए नागपुर से फोन लाइन खींची। एक टेलीफोन बॉक्स लगाकर हॉटलाइन सम्पर्क स्थापित किया।
रेल खींची। एक रेलवे स्टेशन बनाया।
जहां स्पेशल ट्रेन भेजते।
कोई आपके लिए दिल्ली से 10 सीटर चार्टर प्लेन भेजे। और आप मुफ्त अहसान न लेना चाहें, तो क्या करेंगे।
अजी- 4 हजार प्रति सीट, नार्मल किराये के आधार पर, 10 सीट का 40 हजार मुंह पे मार देंगे। वैसे ही, गांधी तीसरे दर्जे के एक डिब्बे ( स्पेशल ट्रेन में एक इंजन, और 40 सीटर एक डिब्बा होता) की सारी सीटों का किराया, 132 रुपये जमा कर आये।
हर माह टेलीफोन बिल भी पटा देते ।
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एक कुटीऱ जमनालाल बजाज ने अपने लिए बनवाया था ।और वे रहते कम थे, सो बन्द रहती। 1942 के के आंदोलन योजना की पहली बैठक, सेवाग्राम मे वहीं हुई।
फिर बा-बापू, आंदोलन के लिए बम्बई गए। गिरफ्तार हुए। आगा खां पैलेस में नजरबंद रहे।
बा की मृत्यु वहीं हुई।
अब जेल से छूटे गांधी के साथ, जीवन साथी न थी। स्वास्थ्य नाजुक रहता, उम्र 75 पार, खांसी का दौरा उठता। वे जमनालाल बजाज की कुटी उपयोग करते।उपचार लेते, धूप में बैठते।
इसी कुटी में थे, जब दंगों की खबर सुनी।
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यहां से नोआखाली गये। मुम्बई गए।
दिल्ली गए। बिरला हाउस मे रुके।
औऱ वही एक नफरती की तीन गोलियों ने उनका पता आख़री बार बदल दिया। अब वह नया पता क्या है - मैं नहीं जानता।
क्या वे स्वर्ग के किसी कोने मे हैं। अवश्य वहाँ भी उन्होंने कोई मिट्टी की कोठरी ही चुनी होगी।
या वे हिंदुस्तान के हर नागरिक के दिल के किसी कोने मे हैं?
शायद आप बेहतर बता पाएंगे।
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लेकिन आज जब इस नफ़रत की आंधी भरे दौर मे, लोगो की उदास आंखे देखता हूँ। अपने वतन मे उन्हें गद्दार, नक्सल, नीच जात, ख़ालिस्तानी, चिंकी कहे जाते देखता हूँ..
स्वराज की सुराज से दूरी देखता हूँ। अपने पसीने की गाढ़ी कमाई, इन काले अंग्रेजो की अय्याशियों पर धू धू कर उड़ते देखता हूँ..
तो उसकी आँखों मे एक अदद गाँधी की तलाश नजर आती है।
वे सब के सब, गाँधी का पता ढूंढ़ रही हैं।
सो लिख दिया..
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हैप्पी बड्डे, गाँधी ब्रो।
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