बिहार के शिक्षक: अब 'गुरुजी' नहीं, सरकारी 'अलादीन का चिराग' हैं!
बिहार शिक्षा विभाग के नए फरमान ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि राज्य में शिक्षक केवल 'पढ़ाने' के लिए नहीं, बल्कि हर उस काम के लिए बने हैं जिसे करने के लिए विभाग को कोई और नहीं मिलता। ताज़ा आदेश के अनुसार, जनगणना 2027 के महायज्ञ में शिक्षकों को 'प्रगणक' की आहुति तो देनी ही होगी, साथ ही स्कूल में बच्चों को ज्ञान बांटने का 'चमत्कार' भी जारी रखना होगा।
समय का अद्भुत प्रबंधन
विभाग का कहना है कि शिक्षक जनगणना का काम स्कूल के समय से पहले या बाद में करेंगे। शायद विभाग यह मानकर चल रहा है कि बिहार के शिक्षकों ने नींद और थकान पर विजय प्राप्त कर ली है। अब गुरुजी सुबह सूरज उगने से पहले किसी के घर का दरवाजा खटखटाकर पूछेंगे—"आपके घर में कितने चूल्हे जलते हैं?" और फिर भागते हुए स्कूल पहुँचकर बच्चों को 'समय के महत्व' पर भाषण देंगे।
असमंजस खत्म, बस चैन भी खत्म
पत्र में बड़े गर्व से लिखा गया है कि जिलों में जो 'असमंजस' की स्थिति थी, उसे स्पष्ट कर दिया गया है। स्पष्टता यह है कि अब शिक्षक को न दिन में सुकून मिलेगा, न शाम को राहत। विभाग ने यह "एकरूप दिशानिर्देश" जारी करके यह सुनिश्चित कर दिया है कि शिक्षक का मानसिक संतुलन चाहे जैसा रहे, कागजी डेटा और हाजिरी रजिस्टर एकदम फिट रहने चाहिए।
ट्रेनिंग से 'महादान'
शिक्षकों पर उपकार करते हुए विभाग ने 31 मई 2026 तक उन्हें प्रशिक्षण के दायित्वों से मुक्त कर दिया है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी सिपाही को बिना बंदूक के मोर्चे पर भेज दिया जाए और कहा जाए—"खुश हो जाओ, तुम्हें आज भारी बंदूक ढोने की मेहनत नहीं करनी पड़ेगी।"
सिस्टम पर कुछ कड़वे सवाल:
शिक्षा की बलि: जब शिक्षक स्कूल के पहले और बाद में फील्ड वर्क करके थककर चूर रहेगा, तो स्कूल की बेंच पर वह बच्चों का भविष्य संवारेगा या अपनी सुस्त आँखें मटकाएगा?
दोहरी मार: क्या विभाग ने कभी यह हिसाब लगाया है कि घर-घर घूमने और स्कूल की फाइलों के बीच 'अध्यापन' (Teaching) का गला कितनी बार घोंटा जाता है?
शक्तिमान वाली उम्मीद: क्या विभाग को वाकई लगता है कि शिक्षक कोई रोबोट है जिसे सुबह जनगणना और दोपहर में गणित पढ़ाने के लिए 'प्रोग्राम' किया जा सकता है?
निष्कर्ष:
यह आदेश शिक्षा व्यवस्था के उस चेहरे को उजागर करता है जहाँ 'आंकड़ों का पेट' भरने के लिए 'शिक्षा की गुणवत्ता' को भूखा मारना अब एक सरकारी नीति बन चुकी है।
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