सटीक जांच,शीघ्र पहचान-वेक्टर जनित रोगों पर प्रभावी प्रहार!
जिला अस्पताल,राजनांदगांव में मलेरिया,डेंगू एवं फाइलेरिया सहित वेक्टर जनित रोगों की जांच,निदान,रोकथाम एवं नियंत्रण को लेकर आईटीबीपी के जवानों एवं स्वास्थ्य विभाग के लैब टेक्नीशियनों हेतु प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया
बिरसा ने कहा कि मिशनरियों की शक्ति रोकने के लिए ईसाई धर्म का बहिष्कार आवश्यक है। अनेक वनवासी पुनः अपने धर्म में लौट आए,।
#जनजातीय_गौरव_दिवस#BhagwanBirsaMunda150
बिरसा ने कहा कि मिशनरियों की शक्ति रोकने के लिए ईसाई धर्म का बहिष्कार आवश्यक है। अनेक वनवासी पुनः अपने धर्म में लौट आए,।
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बिरसा गाँव-गाँव घूमकर वनवासियों को समझाने लगे कि मिशनरी और ब्रिटिश अलग नहीं, एक ही हैं। इन्हीं के शोषण से हमारी स्थिति दयनीय हुई है,।
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“माँ जंगल में आग है, दहक है, धुँआ है, उदासी है, मौन है, वेदना है। कोई मुंडा लड़ने को तैयार नहीं। बिरसा चाहता है तुम आशीर्वाद दो ताकि मैं प्रताड़ना के विरुद्ध खड़ा हो सकूँ।,” – भगवान बिरसा
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“यदि तुम्हारे धर्म का प्रचार यही भाषा, यही तरीके हैं तो तुम्हारे स्कूल, चर्च, रोटी और वस्त्र की मुझे कोई आवश्यकता नहीं।” – भगवान बिरसा
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“धर्म यह नहीं सिखाता कि किसी जाति, समुदाय, परंपरा या सांस्कृतिक भावना का मान-मर्दन किया जाए। जो धर्म ऐसा करे, बिरसा उसके विरुद्ध है।,” – भगवान बिरसा
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विद्यालय की सुविधाएँ होने पर भी बिरसा किसी शिक्षा पद्धति के गुलाम नहीं बने। वे ब्रिटिश अत्याचार को समझकर उसका प्रतिकार करने के लिए चिंतनशील हो गए,।
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मिशनरी स्कूल में ईसाई संस्कृति थोपने का प्रयास होता था, पर बिरसा के हृदय में वनवासी और सनातन परंपराएँ विराजमान थीं,।
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मिशनरियों द्वारा बपतिस्मा के बाद वे ‘डेविड बिरसा’ हुए और चाईबासा इंग्लिश मिडिल स्कूल में प्रवेश मिला। 1886–1890 तक मिशनरी स्कूल में उच्च शिक्षा प्राप्त की,।
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बिरसा ने धर्म संचेतना, समाज संचेतना, स्त्री संचेतना, उपनिवेशवाद और ब्रिटिश साम्राज्यवाद के विरोध तक सभी विषयों पर विवेकपूर्ण विचार व्यक्त किए।,
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बचपन से कुशाग्र बुद्धि वाले बिरसा ने मिशनरी षड्यंत्रों और सामाजिक कुरीतियों का प्रतिकार किया और वनवासियों को जंगल बचाने हेतु संगठित किया,।
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सिर्फ 25 वर्ष में भगवान बिरसा ने निर्धनता व संसाधनहीन परिस्थितियों में सांस्कृतिक पुनर्जागरण की लहर पैदा की—उनका जीवन देवतुल्य प्रतीत होता है।,
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भगवान बिरसा ऐसा व्यक्तित्व हैं जिन्होंने तत्कालीन जनजातीय समाज की सीमाओं को तोड़कर राष्ट्र और धर्म के परिप्रेक्ष्य में अमूल्य योगदान दिया,।
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भगवान बिरसा का जन्म 15 नवंबर 1875 को झारखंड के उलीहातु में हुआ। माता करमी हातू, पिता सुगना मुंडा थे। उनका नाम जन्म के दिन गुरुवार होने से ‘बिरसा’ रखा गया,
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