विपक्ष को तोड़ कर चुनौती जनता को दी जा रही है कि आपकी कोई औक़ात नहीं है। ऐसा कर लोकतंत्र का उत्साह ख़त्म किया जा रहा है। अगर कोर्ट केस माफ़ कराने के लिए सांसद पार्टी छोड़ रहे हैं तो सवाल उठेगा कि क्या कोर्ट ने ED की जगह ले ली है? अदालत की साख को दाँव पर लगाने से नुक़सान भरोसे का होगा। वकील प्रतिस्पर्धा में निखरते हैं।उनके पेशे को AI से ज़्यादा ख़तरा न्याय व्यवस्था को पार्टी व्यवस्था में बदल देने से होगा। इसके बाद क्या बचेगा? हताशा का लंबा दौर और नतीजा? एक शब्द में - दुर्दशा। हताशा से केवल दुर्दशा पैदा होती है। राष्ट्र के लोक जीवन का उत्साह ख़त्म हो जाता है। उसकी आर्थिक प्रगति भी कुंठित हो जाती है। अभी सत्ता के दम पर कुछ भी कर लीजिए लेकिन सबके सामने सांसदों को गुलाम की तरह पेश कर राजनीति के महत्व को भी समाप्त किया जा रहा है। अगर यह जीत है तो बीजेपी जश्न क्यों नहीं मना रही? क्या इस देश में किसी को पार्टी चलाने नहीं आती? फिर जब सारा बहुमत आ ही गया तब चुनाव बंद कर दीजिए।
I dont think any world leader has ever humilaited its own country this blatantly like Modi. Handholding with the man who murdered your citizens and then refused to apologise like two days ago