*बीजेपी क्यों बसपा से डरकर सपा का प्रचार कर रही है? गोदी मीडिया की ‘बीजेपी बनाम सपा’ रणनीति का खुलासा**
उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनावों (2027) में बीजेपी अपनी पुरानी चाल चला रही है। अपनी गोदी मीडिया के जरिए पूरे चुनाव को बीजेपी बनाम सपा का द्वंद्व बनाने की कोशिश कर रही है। अखबारों से लेकर टीवी चैनलों, सोशल मीडिया और यूट्यूब तक एक ही नैरेटिव दोहराया जा रहा है — “या तो योगी-मोदी, या फिर अखिलेश-माफिया राज”। लेकिन यह रणनीति बिना वजह नहीं है। यह बीजेपी की मजबूरी और डर का नतीजा है। असली खतरा बहुजन समाज पार्टी (बसपा) है, और बीजेपी ठीक यही समझती है।
*पहला कारण: ध्रुवीकरण की राजनीति*
बीजेपी जानती है कि जब चुनाव बीजेपी बनाम सपा बन जाता है तो ध्रुवीकरण आसान हो जाता है। सपा को “यादव-मुस्लिम” पार्टी के रूप में पेश करके हिंदू वोट को एकजुट किया जा सकता है। लेकिन बसपा के साथ मुकाबला होने पर यह फॉर्मूला फेल हो जाता है। बसपा की बहुजन विचारधारा जाति और धर्म के ऊपर सामाजिक न्याय की बात करती है। वह दलित, पिछड़े, अल्पसंख्यक और सवर्णों के एक बड़े हिस्से को भी अपनी तरफ खींच सकती है। इसलिए बीजेपी सपा को मुख्य विपक्षी के रूप में स्थापित करके चुनाव को सांप्रदायिक रंग देना चाहती है।
*दूसरा कारण: सपा का डर दिखाकर वोट बटोरना*
यूपी के लाखों लोग 90 के दशक और 2000 के शुरुआती सालों की सपा की गुंडागर्दी, भाई-भतीजावाद और प्रशासनिक लापरवाही को अभी भी याद करते हैं। बीजेपी ठीक इसी डर को हवा दे रही है। गोदी मीडिया में बार-बार पुरानी खबरें, पुराने वीडियो और “सपा राज में माफिया राज” वाला नैरेटिव चलाया जा रहा है। उद्देश्य साफ है — जो लोग बीजेपी से नाराज हैं, वे सपा के डर के कारण फिर बीजेपी को ही वोट दे दें। “कम-से-कम बुराई” का फॉर्मूला। अगर असली मुकाबला बसपा से हो तो यह डर का कार्ड खेला ही नहीं जा सकता, क्योंकि बसपा का शासनकाल (2007) विकास, कानून-व्यवस्था और दलित उत्थान के लिए याद किया जाता है।
*तीसरा कारण: पश्चिमी यूपी में सपा की कमजोरी*
पश्चिमी उत्तर प्रदेश में सपा मुख्य रूप से मुस्लिम वोटों पर निर्भर है क्योंकि उसके पास पश्चिमी यूपी में अपना मजबूत अहीर (यादव) वोट बैंक नगण्य है। इसलिए बीजेपी को डर है कि अगर मुस्लिम वोट बसपा की तरफ चला गया बीजेपी पश्चिमी यूपी में साफ हो जाएगी और उसके लिए बहुमत लाना असम्भव हो जाएगा और बीजेपी को यही डर सता रहा है। बसपा पश्चिमी यूपी में अपनी जड़ें मजबूत रखे हुए है। मायावती ने हाल ही में पश्चिमी यूपी को अलग राज्य बनाने की मांग दोहराई है, जो इस क्षेत्र की बहुजन आबादी को सीधा संदेश देता है।
*चौथा और सबसे बड़ा कारण: नाराज बीजेपी वोटर बसपा की तरफ जा सकता है।*
अगर चुनाव बीजेपी बनाम बसपा का हो गया तो बीजेपी का नाराज वोटर (जो महंगाई, बेरोजगारी, किसान मुद्दों या परिवारवाद से तंग आ चुका है) बसपा की तरफ शिफ्ट हो सकता है। बसपा न तो सपा जितनी विवादित है और न ही उसका चेहरा “परिवारवाद” या “गुंडागर्दी” का है। अगर इसमें मुस्लिम वोट भी बसपा के साथ जुड़ गया — जो सामाजिक न्याय की राजनीति में स्वाभाविक गठजोड़ है — तो बीजेपी पूरी तरह साफ हो सकती है। यही वजह है कि बीजेपी बसपा को “अप्रासंगिक” बताने की कोशिश करती है, जबकि अंदर से उसे बसपा सबसे बड़ा खतरा नजर आता है।बसपा ही असली विकल्प क्यों?बहुजन समाज पार्टी आज भी उस विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती है जो डॉ. आंबेडकर और कांशी राम की विरासत पर टिकी है — “सबको सम्मान, सबको अधिकार”। सपा और बीजेपी दोनों ही अपनी-अपनी जातीय-समुदाय आधारित राजनीति में फंसी हुई हैं। एक ध्रुवीकरण पर खेलती है, दूसरी पुरानी छवि पर। बसपा बहुजन एकता की बात करती है। दलित-मुस्लिम-पिछड़े गठजोड़ बसपा के साथ सबसे स्वाभाविक और मजबूत है।बीजेपी की गोदी मीडिया जितना भी “बीजेपी vs सपा” का राग अलापे, हकीकत यही है कि बीजेपी बसपा से डरती है। इसलिए वह सपा को आगे बढ़ाकर अपनी चुनावी रणनीति को जमीन पर उत्तर रही है।
अब देखना यह है कि बसपा कैसे बीजेपी की इस चुनावी रणनीति का सामान करती है जो कि बसपा के लिए आसान नहीं होने वाला है क्योंकि बीजेपी सभी संसाधनों से मजबूत है उसके पास अपनी मीडिया,अरबों रुपए और मजबूत सोशल मीडिया टीम है।
चुनाव से ठीक पहले वह अरबों रुपए इन्फ्लूएंसर को बाट देंगी जो बीजेपी vs सपा का माहौल बनाएंगे।गोदी मीडिया फर्जी सर्वे के माध्यम से लोगों के दिमाग योगी या अखिलेश का नरेटिव बैठाएगी।
लेकिन बसपा के पास इनका मुकाबला करने के लिए अपनी कोई सोशल मीडिया सेल तक नहीं है वह केवल जनता के विवेक सहारे पर है जो कि आसानी से प्रचार तंत्र के बहकावे में आ जाती है।
@Mayawati@AnandAkash_BSP@SamarRaj_@GauravPalRaj@vaibhavkr86
@ranvijaylive लेकिन वीडियो में दिख रहा आदमी भगवंत मान जैसा दिख रहा है लेकिन है नहीं।
क्योंकि वीडियो में दिख रहा आदमी बिल्कुल फिट दिख रहा है जबकि भगवंत मान का शरीर फिट नहीं है।
प्रेमानंद का इलाज अस्पताल में चलता है, मेरा कहने का मतलब है पहला और अंतिम विकल्प अस्पताल ही है कोई मंत्र नहीं, हम तो प्रेमानंद जी के स्वस्थ होने की कामना ही कर करते हैं।
@raviadi7793 इनकी प्रेमिका ने यह खुलासा किया है कि इनकी पत्नी ने ब्लैकमेल करके शादी की है।
सांसद महोदय जब देहरादून से पकड़े गये थे शब्बीरपुर घटना के बाद तो न्यूज थी कि अपनी गर्ल फ्रेंड के साथ थे।
शायद वही गर्ल्स फ्रेंड वाइफ़ बन गई है।
बसपा बिना किसी दबाव के चलती है क्योंकि अपने समर्थकों और कार्यकर्ताओं के सपोर्ट से चलती है। जबकि दूसे दल बिजनेस घरानों से पैसा लेकर जनता के हक में काम करना छोड़ देते हैं।
*बीजेपी की सबसे बड़ी चिंता: बसपा और क्यों?*
उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक सच्चाई बार-बार उभरकर सामने आती है, जिसे बीजेपी अपनी पूरी ताकत से छिपाने की कोशिश करती है। वह सच्चाई यह है कि **बीजेपी को असली डर बसपा से है* , न कि सपा से। सपा बीजेपी के लिए चुनावी लड़ाई में "सुविधाजनक विपक्ष" बनकर उभरी है, जबकि बसपा ही वह शक्ति है जो सामाजिक समीकरणों को उलट-पलट सकती है और बीजेपी की वोट बैंक वाली रणनीति को सीधा झटका दे सकती है।जब-जब चुनाव नजदीक आते हैं, बीजेपी अपनी गोदी मीडिया और प्रचार तंत्र के जरिए बसपा के खिलाफ साजिशें रचती दिखती है। इसका मकसद स्पष्ट है — बसपा को मुख्य मुकाबले में न आने देना। 2022 के चुनाव में राइन (राम अयोध्या इश्यू या संबंधित) जैसे मुद्दों के अधूरे-टुकड़ों को प्रचारित कर बसपा पर "टिकट बेचने" का आरोप लगाया गया। यही पैटर्न 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव से पहले दोहराया जा रहा है।
*सपा क्यों बीजेपी के लिए "गारंटी" है?*
योगी आदित्यनाथ ने भरे सदन में एक बार भूलवश कह दिया था कि सपा उनके लिए चुनाव जीतने की गारंटी है। यह वाक्य मात्र एक "भूल" नहीं था, बल्कि राजनीतिक हकीकत का अनायास उद्घाटन था। सपा के साथ बीजेपी का मुकाबला "हिंदुत्व vs पसमांदा-यादव" का narratives बन जाता है, जिसमें ध्रुवीकरण आसान हो जाता है। लेकिन बसपा जब मुख्य मुकाबले में आती है, तो सामाजिक न्याय, बहुजन एकता और दलित-बहुजन गठजोड़ का मुद्दा उभरता है, जो बीजेपी की व्यापक हिंदू एकीकरण रणनीति को चुनौती देता है।इसलिए बीजेपी के प्रचार तंत्र में सपा और अखिलेश यादव पर लगातार आक्रामक हमले देखने को मिलते हैं। एक तरफ सपा को "मुख्य विपक्ष" के रूप में प्रोजेक्ट किया जाता है, ताकि वोट बसपा की तरफ न जाएं। आम जनता को यह समझना होगा कि बीजेपी क्यों सपा का इतना प्रचार प्रसार करवाती है। जब तक यह धारणा बनी रहेगी कि "मुख्य लड़ाई सपा-बीजेपी के बीच है", बसपा को मुख्यधारा से दूर रखना आसान रहेगा।
*बसपा की भूमिका और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारी*
बीजेपी अच्छी तरह जानती है कि *केवल बसपा ही उसे हराने की क्षमता रखती है।* इसलिए वह कभी भी बसपा को मुख्य मुकाबले में आने का मौका नहीं देना चाहती। बसपा को 2027 में मजबूत वापसी करने के लिए हर कार्यकर्ता और नेता को यह सच्चाई आम लोगों तक पहुंचानी होगी:बीजेपी सपा को क्यों बढ़ावा दे रही है?
बसपा को बदनाम करने की बार-बार कोशिश क्यों की जा रही है?
असली विकल्प कौन है जो सामाजिक समीकरण बदल सकता है?
जिस दिन आम आदमी इस खेल को समझ जाएगा, उसी दिन बीजेपी सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो जाएगी।बसपा की ताकत उसके संगठन, विचारधारा और बहुजन समाज के बीच गहरे जुड़ाव में है। अगर कार्यकर्ता इस सच्चाई को घर-घर पहुंचा सकें कि *बीजेपी बसपा से डरती है, इसलिए उसे कमजोर करने की हर साजिश रचती है* , तो 2027 उत्तर प्रदेश की राजनीति का परिदृश्य पूरी तरह बदल सकता है।समय आ गया है कि जनता प्रचार के जाल से ऊपर उठे और असली समीकरण देखे। *सपा नहीं, बसपा ही विकल्प है —* जब यह बात जन-जन तक पहुंच जाएगी, तब सत्ता के गणित अपने आप बदल जाएंगे।जय भीम। जय बहुजन।
जैसाकि सर्वविदित है कि बी.एस.पी. देश में ’बहुजन समाज’ व अपरकास्ट समाज के ग़रीब शोषित-पीड़ित व उपेक्षितों द्वारा, उनके संवैधानिक हक़ व न्याय आदि के लिये परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर के बताये रास्तों पर चलने वाली ’सर्वजन हिताय व सर्वजन सुखाय’ की सच्ची व ईमानदार अम्बेडकरवादी पार्टी है, जो दूसरी पार्टियों की तरह बड़े-बड़े पूंजीपतियों व धन्नासेठों के सहारे और उनके इशारे पर नहीं चलती है बल्कि अपने लोगों के ही तन, मन और धन के बलबूते पर चलती है, जो स्वाभाविक तौर पर संकीर्ण, जातिवादी, साम्प्रदायिक व पूंजीवादी ताक़तों को यह फुटी कौड़ी नहीं सुहाता है और इसी लिये वे समय-समय पर और ख़ासकर चुनाव के नज़दीक आने पर क़िस्म-क़िस्म के हथकण्डे इस्तेमाल करके बी.एस.पी. पार्टी व मूवमेन्ट को तथा उसके आयरनलेडी नेतृत्व को भी बदनाम करने में लगे रहते हैं।
इसी क्रम में मीडिया के एक वर्ग द्वारा दूसरी पार्टियों की चुनावी जुगाड़ आदि पर से लोगों का ध्यान बाँटने तथा उन पर पर्दा डालने के लिये बी.एस.पी. पार्टी उम्मीदवार के चयन को लेकर सवालिया निशान खड़े करते रहते हैं, जबकि बी.एस.पी. को जो भी आर्थिक सहयोग हासिल होता है वह पार्टी उम्मीदवार की जीत सुनिश्चित करने पर ही क़ानूनी तौर से ज़्यादातर ख़र्च कर दिया जाता है, जो किसी से भी छिपा हुआ नहीं है। फिर भी उसको लेकर षडयंत्र के तहत् गुमराह करने वाली तरह-तरह की ग़लत बातें व अफवाहें आदि फैलाना मीडिया को शोभा नहीं देता है।
इसके साथ ही यहाँ यह भी सर्वविदित है कि केवल बी.एस.पी. यूपी स्टेट यूनिट के अध्यक्ष श्री विश्वनाथ पाल ही नहीं बल्कि पार्टी के अन्य सभी छोटे-बड़े पदाधिकारी व कार्यकर्तागण भी इस समय पार्टी संगठन की मज़बूती तथा पार्टी के जनाधार को सर्वसमाज में बढ़ाने के साथ-साथ आगामी यूपी विधानसभा आमचुनाव हेतु पार्टी उम्मीदवारों की संभावित सूची बनाने तथा उनकी ठोस स्क्रीनिग करने आदि में लगे हुये हैं और पार्टी की उम्मीदवारी को लेकर उनसे मिलने वालों से अन्य बातों के अलावा उनकी सामाजिक, राजनीतिक व आर्थिक हैसियत के साथ ही उनके पार्टी के प्रति वफादारी व टिकाऊपन आदि को भाँपने के लिये, कोर्ट में जिरह की तरह, उनसे तरह-तरह के सवाल-जवाब भी करते रहते हैं, जिसकी गहराई में गये बिना ही उसे उसके पूरे फेस वैल्यू पर अन्यथा लेना उचित नहीं है, यह मीडिया से भी अनुरोध है तथा पार्टी के लोगों से भी अपील है कि वे विरेाधी पार्टियों के ऐसे प्रायोजित किसी भी षडयंत्र का शिकार होकर गुमराह ना हों बल्कि अपने मिशन 2027 के लक्ष्य में पूरे जी-जान से लगे रहें, जिस बी.एस.पी ज़िन्दाबाद की आपकी जबरदस्त तैयारी को देखकर ही विरोधियों की नींद काफी उड़ी हुई है। जय भीम जय भारत।
@HasnaZaruriHai यह तो पहली बार देखा कि पेशाब से बम की सुतली बुझ गई।
वरना हमने तो देखा है कि पानी में भज फेंक दो तो धमका हो जाता है।
वैसे फिल्म है फिल्म में कुछ भी हो सकता है।
सचाई यह है कि
मुस्लिम अपना वोट एकतरफा सपा को दे कर देख चुके है।
लेकिन सपा कई क्षेत्रीय दलों से गठबंधन करके भी 113 सीट से ज्यादा।नहीं ले आ पाई।
तो वोट कटवा कौन हुआ सपा या बसपा?
यदि यही एक तरफ़ा वोट बसपा को मिल जाए तो बीजेपी साफ हो जायेगी क्योंकि बसपा के खिलाफ ध्रुवीकरण नहीं होता है जबकि सपा के खिलाफ जातिगत और धार्मिक दोनों ध्रुवीकरण होता है।
इसलिए बीजेपी विपक्ष के रूप में सपा पर आक्रामक रहती है और अपनी गोदी मीडिया से सपा का प्रचार करवाती है।
यह सच्चाई नहीं है।
बल्कि सच्चाई यह है कि बीजेपी और सपा आपसी सहमति से एक अघोषित समझौते के साथ चुनाव लड़ते है जिसमें बीजेपी ,सपा पर आक्रामक रह कर अपनी गोदी मीडिया से विपक्ष के रूप में सपा का प्रचार करवाती है जिससे कि जातिगत और धार्मिक ध्रुवीकरण हो और मुस्लिम वोट सपा में जाकर डम्प हो जाए।
इससे सपा को अप्रत्यक्ष रूप से मुलिमो के सामने बीजेपी को हराने के लिए एक मात्र विकल्प के रूप में पेश करने में आसानी होती है।
इससे आसानी से ऐसे समझिए कि जिसे सपा के लोग बीजेपी की B टीम कहते है बीजेपी उसका प्रचार नहीं करती बल्कि सपा का प्रचार करती है।इसलिए इसका राजनैतिक सार यही है कि
' सत्ता हमेशा कमजोर विपक्ष चुनती है '
और up में बीजेपी के लिए कमजोर विपक्ष सपा है जहां वह अपने विरोधी वोटों को डलवा कर बेकार कर देती है और सपा के आने का डर दिखा कर दलित और अतिपिछड़े समाज का ध्रुवीकरण अपने पक्ष में कराती है।
भारत के राजनैतिक इतिहास में इतनी बड़ी भागम भाग किसी ऐसी पार्टी में पहली बार हो रही है जो लगातार 3 चुनाव से सत्ता में थी। राष्टीय पार्टी बन चुकी। रिजल्ट आये कुछ दिन हुए और उसमे;
60 विधायको ने एकाएक ठेंगा दिखा दिया।
20 सांसदों ने ठेंगा दिया।
फिर आप मजबूत कन्हा थे? आप सत्ता में थे इसलिए मजबूत दिख रहे थे। अब "तू चल, में आया" कि तर्ज पर वो तक भाग रहा है जो बागी को कोस रहा था।
दृश्यम फ़िल्म देखी है?
जिसमे ऐसा वातावरण बनाया जाता है जिसमे एक कहानी बनाई जाती है, उस कहानी को इतना ज्यादा गम्भीरता से निभाया जाता है कि झूठ से बना माहौल भी सच लगता है।
पिछले 8 साल से कल्याण बनर्जी, ममता बनर्जी, सयानी घोष, केजरीवाल, ही चर्चाओं में है। ऐसा दिखाया जाता कि यह लोग ही भाजपा को रोक रहे है। एक दृश्यम जैसा वातावरण बनाकर रखा गया। इसमे "कोंग्रेस" भी फँस गयी। सपा तो कॉकरोच पार्टी तक को महत्व दे रही थी।।जबकि अब सयानी घोष व कल्याण बनर्जी जैसे स्वयं कह रहे है कि हम ममता से अलग हो रहे है। ममता बनर्जी व केजरीवाल ने भाजपा को और मजबूत किया है, जैसे सपा ने उत्तर प्रदेश में भाजपा को स्थापित किया।
भाजपा 2014 से दृश्यम रूपी राजनैतिक माहौल बनाकर लड़ाई जीत रही है। जिसमे कमजोर से पक्ष को मीडिया के माध्यम से अपना विपक्ष बनाकर पूरा माहौल बनाती है व फिर आराम से जीत जाती है। समय समय पर;
1.केजरीवाल को अपना विपक्ष बनाकर दिखाया।
2.उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी से पर्दे के पीछे से गठबंधन करके दृश्यम माहौल बनाकर बसपा को लड़ाई में नही दिखाया।
3.बंगाल में 26 साल सत्ता में रही वाम दलों का नाम फक नही लिया दृश्यम रुपी माहौल बनाकर ममता व अपने मे लड़ाई दिखाई, जिसे ममता ने बखूबी हवा दी औऱ 2 विधायक वाली भाजपा सीधा 208 पर ममता ने पहचा दिया।
भाजपा इसमे माहिर है।। श्री मुलायम सिंह यादव जब पहली बार मुख्यमंत्री बने तब उससे पहले पूरे उत्तर प्रदेश में भाजपा के सांसद तक नही थे। पूरे देश मे केवल दो सांसद थे। फिर कार सेवा की घोषणा हुई, श्री मुलायम जी ने पहले उन्हें अंदर आने दिया और फिर गोलियां चलवाई। इससे हिन्दू भाजपा के पक्ष में व मुस्लिम मुलायम जी के पक्ष में खड़ा हुआ। यह भी इतिहास है कि ;
1.श्री मुलायम जी ने मुख्यमंत्री रहते 2 सांसद वाली भाजपा को सीधा उत्तर प्रदेश में 57 पर पहचाया दिया व अगली सरकार पहली बार उत्तर प्रदेश में भाजपा की बनवा दी।
2.बहनजी ने भाजपा को 2009 में 10 लोकसभा पे ला दिया और श्री अखिलेश जी ने 2014 में भाजपा को 71 पे ला दिया।
जब जब सपा मजबूत हुई, उसने भाजपा को डबल मजबूत किया।
जब जब बसपा मजबूत हुई। भाजपा कमजोर हुई है। इसलिए बसपा को मीडिया की सुर्खियों से नदारद किया गया। यह सपा भाजपा का आपसी साहयोग है। जिसे नौशिखिया, अपरिपक्व टाइप व केवल हल्ला करने वाले नही पकड़ सकते है।।
विकास कुमार जाटव
सच यही है कि अखिलेश यादव की इस बार अकेले लड़ने में पांव कांप रहे है इसलिए लगातार 10 जनपथ में गठबंधन की गुहार लगा रहे है
क्योंकि इस बार लोग समझ रहे है कि बीजेपी ध्रुवीकरण के लिए ही सपा का प्रचार कर रही है जिससे मुस्लिम वोट सपा में जा कर डम्प हो जाए और सपा के आने का डर दिखा कर बीजेपी दलित और अतिपिछड़ा वोट को अपने पाले में ध्रुवीकृत करा ले।
और एक बात जान लीजिये जैसे जैसे चुनाव करीब आयेंगे वैसे वैसे बीजेपी के नेता जबरदस्त तरीके से अखिलेश यादव और सपा को टारगेट करेगी और सपा वाले बीजेपी को टारगेट करगे और बसपा को टारगेट करने के लिए अपने sc नेताओं को आगे करेंगे।
"सपा बीजेपी की जीत की गारंटी" यह बात सदन में योगी आदित्यनाथ ने ऐसे ही नहीं कही थी।
क्योंकि बीजेपी की जीत की पूरी रणनीति सपा के इर्द गिर्द ही घूमती है।
अक्ल सबको है।लेकिन कुछ चीजों से जानबूझ कर आँखे चुराई जाती है।जैसे कोई sc का व्यक्ति जब सपा के sc/st विरोधी कामों को जानकार भी उसका समर्थन करता है तो इसमें यह बात तय है कि वह या तो सुरक्षित सीट की दलाली कर रहा है या दलाली करने वाले का समर्थक हो।
इन्हें आप सुरक्षित सीट के दलाल कह सकते है।