माता भूमि: पुत्रोअहं पृथिव्या:
सनातनी चिंतक,ancient history teller(मैं रामवंशी हूँ,मैं आर्यपुत्र हूँ,वैदिकसनातनहिंदुत्व,बंधन,कश्मकश)..ज्ञानमार्ग पर एक अज्ञानी
‘मैं रामवंशी हूँ’ पुस्तक के विमोचन समारोह में रामायण और भगवान श्रीराम से जुड़े कुछ तथ्यों की चर्चा की। राम हमारी संस्कृति के ऐसे चरित्र हैं जिनपर जितना लिखा जाए कम है। उनके विविध आयाम हैं।
भगवान राम सिर्फ राजा ही नहीं बल्कि लोकनायक हैं। भारतीय समाज के लोकतांत्रिक प्रतिनिधि हैं। समतामूलक समाज की अवधारणा सर्वप्रथम वही देते हैं।
पुस्तक के लेखक श्री मनोज सिंह को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ।
मैं राम भक्त हूँ। वही राम जो धर्म की प्रतिमूर्ति हैं। आजकल उसी धर्म की सत्ता को साक्षात् देख पा रहा हूँ।और धर्म के न्याय को समझ भी पा रहा हूँ। कुछ कुछ तो बहुत पहले से, और स्पष्ट रूप में कुछ समय पहले से दिखने लगा था। इसे देखने के लिए किसी बौद्धिकता की आवश्यकता नहीं। शास्त्र ज्ञान भी आवश्यक नहीं। बस स्वार्थ और लोभ से दृष्टि हटानी पड़ती है। यह मानवीय प्रवृत्तियां भी अनेक रूप बदलकर आती जाती हैं। जैसे जैसे इससे बचते जाते हैं वैसे वैसे यह दृष्टि और स्पष्ट होने लगती है। राम पर आस्था सदा से रही है, ' रामवंशी' लिखते समय पूर्ण समर्पण का भाव भी आया था। और 'कृष्णवंशी' लिखते समय विरक्ति भी आ रही है। ऐसे में भूलोक को और अधिक स्पष्ट देख पा रहा हूँ। देख क्या रहा हूँ, भविष्य में झांक भी पा रहा हूँ।
धर्म की अदृश्य शक्ति अनंत है, यह अपरिभाषित है और जिसका प्रभाव अलौकिक है।उस धर्म के मूर्तिमान राम की नगरी अयोध्या स्वतः धर्म की नगरी हुई। यहां धर्म अपनी परम् सत्ता के लिए अभी अनेक प्रसंग रचेगा, उसके प्रयोजन क्या होंगे समझना आसान नहीं। हेतु क्या रहे समझाना मुश्किल। रास्ते क्या होंगे कल्पना करना असम्भव। पात्र कौन होंगे किस रूप में होंगे यह सब प्रभु स्वयं रचेंगे। प्रश्न अनेक किये जा सकते हैं। किसलिए ? किसके लिए ? कैसे ? क्यों ? कब ? कहाँ ? उत्तर स्पष्ट कर दूँ , तुम अपनी अपनी सत्ता के लिए षड्यंत्र रचते रहते हो ,और जिसने तुम्हें रचा उनसे ये प्रश्न ?!? हास्यास्पद लग रहा है , किन्तु हम मानते कहाँ हैं । स्मरण रहे, धर्म अधर्म से भी अधिक क्रूर है ,अप्रत्याशित है , और क्यों न हो , उसे अपनी अंतिम परम् सत्ता बनाये रखनी है। और अयोध्या हजारों साल से उस 'समय' की असीमित अकल्पनीय सत्ता की साक्षी रही है।
#जयश्रीराम
#मैं_रामवंशी_हूँ
यह जो समाज में पुरुष और महिला के बीच हिंसक घटनाएं बढ़ रही हैं , उसके पीछे के कारण को आधुनिक युग समझ नहीं पा रहा।
हर मानव में एक पशु भी है। यह पशुता , कम या ज्यादा, अनेक रूप में हो सकती है। यह शेर लोमड़ी सांप बिच्छू से लेकर हिरण बकरी कुत्ता और गौ माता के रूप में भी हो सकती है।
मानव भी मूलतः पशु ही है और उसका प्राकृतिक जीवन वन में ही है। सभ्यता निर्माण के हजारों वर्ष के विकासक्रम में , इस पशु तत्व को कैसे नियमित और नियंत्रित किया गया, यह बेहद दिलचस्प और गहन अध्ययन का विषय है। सभ्यता को बसाकर उसे सुसंस्कृत करने के लिए संस्कारों को कैसे जीवन में उतारा गया , ऋषि-मुनियों की अलौकिक बौद्धिकता का चरम है। और यह प्रयास एक निरंतर प्रक्रिया रही।
वर्तमान कालखंड , आधुनिकता के नाम पर इस जीवन यात्रा को नष्ट कर रहा है। स्वतन्त्रता के नाम पर हम इस पशुता को स्वतंत्र कर दे रहे हैं। हम इस सामान्य सी बात को भी नहीं समझ पा रहे कि समाज अनेक परिवारों का समूह है। और परिवार के मूल में स्त्री-पुरुष संबंध ही हैं। इसीलिए सनातन में पति-पत्नी के वैवाहिक संबंधो पर सबसे ज्यादा ध्यान दिया गया। इसे दूषित कर के आप स्वस्थ और स्वच्छ समाज का निर्माण कभी नहीं कर सकते। और समाज के दूषित होते ही उसके प्रदूषण से आप बच नहीं सकते।
इस विषय की गूढ़ता को सरलता से समझने के लिए आप श्रीराम के जीवन से प्रेरित संस्कार कथा #मैं_रामवंशी_हूँ पढ़ सकते हैं।
बच्चों से पता चला कि आज फादर्स डे है।
वैसे यह मेरा पहला ' फादर्स डे' है जब मेरे पिता इस लोक में नहीं हैं।
और मैं केवल इसी दिन नहीं हर दिन हर पल उनको 'मिस' करता हूँ।
एक पिता का महत्व क्या हो सकता है ,
उनके जाने के बाद और अधिक समझ पा रहा हूँ।
यह समाज की जाने कैसी विडंबना है कि ,
माता को उसका उचित मान-सम्मान तो परिभाषित किया ,
किन्तु पिता के लिए हर स्तर पर चूक गया।
माताएं तो कह लेती हैं रो लेती हैं ,
और पिता ?
वो पुरुष है और उसे पीड़ा नहीं हो सकती ,
यह मान लिया जाता है।
वह बच्चों से उनकी माता से अधिक नहीं तो कम प्यार भी नहीं करता,
किन्तु व्यक्त नहीं कर पाता।
उसके संघर्ष और समर्पण की कोई सीमा नहीं ,
वो तो बीज है ,
जो हर पेड़ की नींव है ,
किन्तु अदृश्य और अस्तित्वहीन।
पुनः पुनः स्मरण करते हुए,
पूज्य पिता को नमन है !
जिस किसी ने भी यश लिया था,
अब दूर रहकर मौन द्वारा ,
अपयश से बच नहीं सकता !
स्मरण रहे !
राम ने कभी धर्म का मार्ग नहीं छोड़ा था ,
और कभी किसी अधर्मी को भी नहीं छोड़ा था !
#मैं_रामवंशी_हूँ
'पूरे ब्रह्माण्ड में क्या नृपेंद्र मिश्रा और चंपत राय ही योग्य मिले थे ?'
यह प्रश्न कल भी था, तो आज अधिक प्रासंगिक है और भविष्य में कटु तथ्य बनकर निर्मम और अप्रिय सत्य के रूप में इतिहास में अंकित हो जाएगा !
#मैं_रामवंशी_हूँ
सुनकर पहले व्यथित हुआ। फिर पढ़कर मन आक्रोशित हुआ था। और अधिक जानने पर जाने क्या हो ! विरक्ति आ सकती है। क्रोध की ऊर्जा शाप बनकर निकल सकती है कि जो कोई भी इस पाप का भागीदार होगा , उसके कुल का सर्वनाश हो जाय।
रामजन्मभूमि संबंधित घटनाक्रम पढ़कर, सामान्य हिन्दू के मन में ऐसे ही अनगिनत विचार आ रहे होंगे। राम इस सनातन सभ्यता की आत्मा हैं। उनके नाम से मृत्यु भी मोक्ष में बदल जाती है। धर्म की प्रतिमूर्ति प्रभु श्रीराम के मंदिर में ऐसा अधर्म ? आश्चर्य ! जिस राम ने वचन के नाम पर अयोध्या का राज्य छोड़ दिया था , उसी अयोध्या में चंद रुपयों (फिर चाहे वो करोड़ों में ही क्यों न हो ) के लिए यह सब !! जिस मंदिर के नाम मात्र से ही समर्पण के भाव जाग जाते हैं उस मंदिर में कार्य करनेवाले यह सब कर सकते हैं , अकल्पनीय है। जिस मंदिर में दर्शन मात्र से पत्थर में भी त्याग की भावना जागृत होती है वहाँ इतना मोह जनित पतन कि दान की भी चोरी कर ली जाय ! घोर कलयुग। फिर याद आया ये सभी रावण वंश के होंगे। अतः इनका हश्र भी रावण की तरह ही होगा , इसमें मुझे कोई संदेह नहीं। यह दान का पैसा न जाने किस माँ का होगा। वह माता शबरी भी हो सकती हैं। न जाने किस कर्मयोगी का हो , वह केवट भी हो सकता है। इनके निश्छल प्रभु प्रेम को तुमने छूकर दूषित किया है , यह महापाप है। तुम इससे सात जन्मों तक मुक्त नहीं हो पाओगे।
यह समस्या कलयुग की ही नहीं है। त्रेता में भी कैकेयी थी। बाली था। सूर्पणखा भी थी। ताटका और मरीच भी थे। असुर हर युग में रहे, हर काल में हुए। श्रीराम इन्हें पहचान लिए थे , तभी सुग्रीव का चुनाव किया था। विभीषण को अपना बनाया था। हनुमानजी का साथ लिया था। और असुरों का , फिर चाहे वह राक्षसराज ही क्यों न हो , वध किया था। अधर्मी और अपराधी को दंड दिए बिना रामराज्य की स्थापना नहीं हो सकती।
न्याय करना प्रभु श्रीराम को अति प्रिय था। प्रभु श्रीराम के अनन्य भक्त गोरक्षपीठाधीश्वर महंत योगी आदित्यनाथ जी महाराज भी धर्म और न्याय के लिए समर्पित हैं, इसमें भी संदेह नहीं। किन्तु यह भी सत्य है कि इस घटनाक्रम का अधर्मी मायावी है इसके अनेक मुख और भुजाएं हैं। कोई बात नहीं , वानर सेना है। वो तो हर युद्ध में धर्म के साथ थी है और सदा रहेगी।
हे महादेव ! कृपा करना !
हे प्रभु श्रीराम ! अपने भक्त पर आशीर्वाद बनाये रखना !!
#जयश्रीराम