*रात और चाँद 🌙 — 06 सितंबर, 2026*
*✨शिक्षक और पिता*
*✨Teacher And Father*
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*“मेरे पास रोते हुए आओगे तो शायद मेरे भी भीतर कुछ टूटेगा, मुझे भी दर्द होगा।”*
*— आचार्य जी ✨*
आचार्य जी, प्रणाम 🙏🏻
आप अपनी संतान के आँसू देखकर केवल उन्हें पोंछते नहीं, बल्कि उनके दर्द को अपने भीतर भी महसूस करते हैं।
आपका ऐसा निःस्वार्थ प्रेम—जहाँ हमारा दुःख केवल हमारा नहीं रह जाता।
हमारे दुःख को मिटाने के लिए आप स्वयं को न्योछावर किए जा रहे हैं।
आपका होना इस संस्था के लिए ही नहीं, हम सभी के लिए बहुत ज़रूरी है।
बस एक ही प्रार्थना है—*आप शीघ्र स्वस्थ हों।*
🙏🏻✨
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2015 के मध्य में, अभी‑अभी 26 वर्ष का होने के बाद, मैं उस घिसे‑पिटे रास्ते से ऊब गया जिस पर मैं चल रहा था। कुछ ही हफ्तों में मैंने अपनी सारी चीज़ें बेच दीं, नौकरी छोड़ दी, एक विषाक्त संबंध समाप्त कर दिया, परिवार और दोस्तों से इस तरह विदा लिया मानो उनसे फिर कभी मुलाकात न हो, और ऑस्ट्रेलिया छोड़कर एक तरफ़ा टिकट पर थाईलैंड और आगे के लिए निकल पड़ा। मुझे ज़रा भी स्पष्ट योजना नहीं थी कि मैं क्या कर रहा हूँ, कहाँ जा रहा हूँ, या पैसे कैसे कमाऊँगा। बस इतना पता था कि मुझे इस सब से दूर जाना है।
मैंने दक्षिण‑पूर्व एशिया में सस्ते और धीमे ढंग से भटकना शुरू किया। उस समय के दौरान मैंने शास्त्र पढ़े, YouTube पर अद्वैत शिक्षकों के बहुत से सत्संग देखे, और इधर‑उधर बिना उद्देश्य के घूमता रहा, यह देखते हुए कि स्वाभाविक रूप से मेरी मुलाकात किन‑किन लोगों से होती है। अजीब तरह से, मैं हमेशा ऐसे लोगों के साथ गहरी बातचीत में पड़ जाता था जिनके पास कोई सूझबूझ भरी बात साझा करने के लिए होती थी।
अजीब बात यह थी कि रास्ते में कई लोग बार‑बार मुझसे कहते रहे कि मुझे ऋषिकेश जाना चाहिए।
तो 15 मार्च 2016 को मैं सीधे बैंकॉक से देहरादून उतरा, टैक्सी लेकर लक्ष्मण झूला पहुँचा, पास के एक हॉस्टल में चेक‑इन किया, और यह देखने के लिए सीधा बाहर निकल पड़ा कि ऋषिकेश कैसा है।
लक्ष्मण झूला पुल के ऊपर मुझे किताबों और पोस्टरों वाला एक छोटा‑सा स्टॉल दिखा। शुभंकर जी मेरे पास आए और पूछा कि क्या मुझे अद्वैत / नॉन‑ड्युएलिटी में रुचि है। मैंने हाँ कहा, तो उन्होंने मुझे उसी शाम एक जीवित मास्टर, आचार्य प्रशांत के साथ सत्संग के लिए आमंत्रित किया। मैंने पहले कभी उनके बारे में नहीं सुना था।
मैंने Truth Demolition Tour का फ्लायर लिया और देखा कि उसी दिन से रोज़ रात 8 बजे सत्र होते हैं।
उस शाम मैं एक छोटे‑से कैफ़े में पहुँचा और लगभग 20–30 और लोगों तथा PAF टीम के साथ इंतज़ार करते हुए गंगा की ध्वनि सुनने लगा, कि कब आचार्य प्रशांत बोलना शुरू करेंगे। अंततः वे मंच पर आए और आरंभ किया। मैं पूरी एकाग्रता से सुन रहा था — ईमानदारी से यह सुनते हुए कि क्या मैं कहीं कोई कमी पकड़ सकता हूँ या कोई असत्यता महसूस कर सकता हूँ। मैं सनकी और संदिग्ध‑सा था, लेकिन जिज्ञासु भी।
लगभग आधे घंटे बाद, जब अब भी मैं कोई गलती न पकड़ सका, तो मैंने बोलकर अपना थोड़ा‑सा अनुभव साझा किया, और फिर उनसे “साक्षी” के बारे में एक प्रश्न पूछा। बड़ी अद्भुत सूक्ष्मता से उन्होंने बताया कि मैं साक्षी के बारे में बोलकर उसे वस्तु बना रहा हूँ, और यह दिखाया कि साक्षी को ही साक्षीभाव से देखने का दावा करना कितना बेतुका है। जिस सफ़ाई से उन्होंने अहंकार की मानसिक कलाबाज़ियों को पकड़ लिया, उससे मैं स्तब्ध होकर चुप रह गया।
उसी क्षण मुझे जान गया कि वही वह व्यक्ति हैं जिनसे मुझे सीखना है — क्योंकि वे मेरी अपनी ही झलक मुझे दिखाने में मदद कर सकते थे। वे इतने तेज़ थे कि मुझे वहाँ पकड़ लेते जहाँ और कोई नहीं पकड़ पाता था। उस दिन से मैं आचार्य जी का विद्यार्थी बन गया।
अगले कुछ हफ्तों तक ऋषिकेश में, आचार्य जी हर शाम के सत्र से पहले पूरा दोपहर का समय उसी कैफ़े में बिताते थे, उनकी किताबें मेज़ पर बिखरी रहती थीं, और कोई भी उनके पास जाकर उनके साथ बैठ सकता था। वहाँ शायद ही कोई और होता था। मुझे घंटों बैठकर प्रश्न पूछने का अवसर मिला, और फिर शाम को उन्हें बोलते हुए सुनता था। वह सचमुच एक अत्यंत मंगलमय और जादुई समय था।
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✨*मेरे साथ चलना चाहते हो, तो अपनी मजबूती को सम्मान दो।*
*—आचार्य जी ✨*
✨*ऊँची संगति के लिए दाम चुकाना पड़े, तो चुका देना।*
*सस्ती जगह से बचो,* 🫸
इसलिए नहीं कि वहाँ सुविधा कम होती है,
इसलिए कि वहाँ संगति खराब होती है।
आपकी ज़िंदगी का क्या *मूल्य *है,
यह आपको ही तय करना है।
विशेष होने में *सुख* है,
निर्विशेष होने में *आनंद* है!
🌟*Allow yourself to be immersed.*
*गुस्सा* भी इंसान और परिस्थिति देखकर आता है।
गुस्सा भी एक चुनाव है।
वासना भी एक चुनाव है।
गुस्सा और वासना हो नहीं जाते,
*तुमने करने का चुनाव करा है।*
*स्वार्थी बनिए।*
अपनी जिम्मेदारियों पर बाद में,
पहले खुद पर खर्च करिए।
बेहतर खाना,
GYM,
*गीता मिशन—*
*इन पर अपना खर्चा बढ़ाइए।*
शरीर की मज़बूती,
ज्ञान की मज़बूती,
फैसलों की मज़बूती—
हर तरह की *मज़बूती* होनी चाहिए।
ज़रूरत के लिए नहीं,
गरिमा के लिए कमाओ।
*Good spirituality,*
*good economics!*
फ़ालतू का खर्च बंद करिए।
*जो भीतर सही है, वही जानेगा पैसे कहाँ खर्च करना है।*
पैसा खर्च करना समस्या नहीं है,
*विवेकहीन* खर्च समस्या है।
हर जगह खर्च नहीं करते,
और सही जगह पर खर्च करने से पीछे नहीं हटते।
*सस्ता रोए बार-बार,*
*महंगा रोए एक बार।*
खाने-पीने की चीज़ों में जुगाड़बाज़ी मत करो।
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प्रकृति सिखाती है—
*न हरा रहना है,*
* न अड़ा रहना है;*
*समय आए तो पत्तों-सा गिर जाना है।*
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इंसान को नापने का एक ही तरीका है —
👉 *उसकी ज़िंदगी में वो खुद कितना मौजूद है!*
🙏🏻🙏🏻
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हर साल हम स्वतंत्रता का उत्सव मनाते हैं। पर ज़्यादा ईमानदार और ज़्यादा उपयोगी प्रश्न यह है कि जब वास्तविक स्थिति आज़ादी की है, तो फिर आगे चलकर यह ग़ुलामी नाम की चीज़ कहाँ से आ गई? क्या भारत सदा से ग़ुलाम था? नहीं। कोई भी मनुष्य किसी का ग़ुलाम पैदा नहीं होता; परतंत्र बनाना पड़ता है।
यह भी सोचने की बात है कि जो कारण हज़ार साल तक हमें ग़ुलाम बनाए रखता रहा, क्या वह अस्सी‑पचहत्तर साल में पूरी तरह चला गया होगा? ख़तरा आज भी बराबर का है, तलवार अभी भी सिर पर है। स्वाधीनता दिवस पर उत्सव मनाना ठीक है, पर इससे अधिक महत्वपूर्ण होगा कि हम इसे आत्म‑अवलोकन दिवस की तरह मनाएँ।
जलवायु संकट से लड़ने में व्यक्ति की क्या भूमिका है? - लंदन क्लाइमेट ऐक्शन वीक में आचार्य प्रशांत 🌍🇮🇳🇬🇧✨
पूर्व क्लाइमेट डिप्लोमेट गोतिए उएल के साथ एक महत्वपूर्ण संवाद - अब YouTube पर लाइव!
हमारे समय के सबसे बड़े संकट पर एक सटीक आध्यात्मिक दृष्टिकोण।
🎥 पूरा संवाद देखें: https://t.co/vYjLmW9a3R
*क्या हम गीता का स्वागत पूरे सम्मान से करते हैं?* 💐🤔
आचार्य जी ने गीता सत्रों में समझाया है कि हमें गीता सुनने के लिए एक माहौल बनाना है। परंपराओं और रीति-रिवाजों में जो बातें हमारे विवेक के विरुद्ध हों, उन्हें छोड़ देना चाहिए, लेकिन जो बातें हमें किसी पवित्र चीज़ के प्रति आदर और सम्मान सिखाती हैं, उन्हें अपनाना चाहिए। जैसे हम मंदिर में जाते हैं तो बाहर ही चप्पल उतारकर जाते हैं और एक अलग भाव के साथ अंदर प्रवेश करते हैं। गुरुद्वारे में जाते हैं तो सिर ढककर जाते हैं और पूरे सम्मान के साथ बैठते हैं। इन छोटी-छोटी बातों का उद्देश्य हमें भीतर से उस जगह और उस समय के लिए तैयार करना होता है।
इसी तरह गीता सुनने से पहले भी हमें तैयारी करनी चाहिए। जैसे हमारे घर में कोई खास मेहमान आने वाला होता है, तो हम पहले से ही उसके स्वागत की तैयारी करते हैं। उसी तरह गीता के माध्यम से स्वयं कृष्ण हमारे पास आ रहे हैं, तो क्या हम उनका पूरे सम्मान और प्रेम से स्वागत नहीं करेंगे?
इसलिए हमें अपने घर में एक शांत और सुंदर कोना बनाना चाहिए। वहाँ कुर्सी पर बैठकर, अपने साथ डायरी और पैन रखकर, ध्यान से गीता सुननी है और ज़रूरी बातें लिखनी हैं। जैसे हम किसी परीक्षा में पूरी तैयारी के साथ बैठते हैं, वैसे ही गीता सुनने के लिए भी स्वयं को तैयार करना चाहिए।
मैंने भी अपने घर में एक छोटा-सा कोना बनाया है, जिसे मैंने अपने तरीके से सजाया है। जब भी गीता सैशन होता है, मैं यहीं बैठकर ध्यान से सैशन सुनती हूँ। जब हम गीता को पूरा सम्मान, समय और ध्यान देते हैं, तो उसकी बातें हमारे जीवन में और सुंदर तरीके से उतरने लगती हैं।
धन्यवाद! 🙏🌷✨️
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The Cage Feeds, The Sky Frees
Until you agree with freedom, you will remain restless. You will remain incomplete. You will remain a bird with wings folded in fear.
*Truth Without Apology पढ़ें:* https://t.co/GXlEe3Oyzu
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'Mass-based Education of The Self' क्यों ज़रूरी है? - लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में आचार्य प्रशांत 🇮🇳🇬🇧✨️
जून में London Climate Action Week के दौरान आचार्य प्रशांत को प्रतिष्ठित लंदन स्कूल ऑफ़ इकोनॉमिक्स में जलवायु परिवर्तन पर आयोजित एक बड़े अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में मुख्य भाषण देने के लिए आमंत्रित किया गया।
इसका पूरा वीडियो अब YouTube पर लाइव है।
🎥 देखें: https://t.co/5AHBAGKPp3
आचार्य प्रशांत का साप्ताहिक लेख Navbharat Times में, 15 अगस्त ‘26:
स्वतंत्रता दिवस: तलवार अभी भी सिर पर है
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“स्वतंत्रता तो नैसर्गिक है, दी हुई है। ज़्यादा ईमानदार और ज़्यादा उपयोगी प्रश्न यह है कि जब जन्म से सब कुछ आज़ाद ही है, तो फिर आगे चलकर यह ग़ुलामी नाम की चीज़ कहाँ से आ गई? क्या भारत सदा से ग़ुलाम था? नहीं। तो ग़ुलामी कहाँ से आ गई? वही प्रश्न असल में पूछना चाहिए।”
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पूरा लेख पढ़ें: https://t.co/wE8cWCraJG