माननीय न्यायालय संज्ञान ले!
भाजपाई घपलेबाज ख़ुद से फ़ार्म 7 छापकर, नक़ली हस्ताक्षर करके पीडीए समाज के वोटरों, विशेष रूप से अल्पसंख्यक समाज का वोट कटवाने में लगे हैं।
हर पत्रकार से अपील है, अपना मीडिया धर्म निभाएं, लोकतंत्र बचाएं! जो भी मीडिया, वो चाहे गाँव-मोहल्ले-स्थानीय स्तर का हो या ज़िले-मंडल-राज्य स्तर का अगर वो ये ख़बरें दिखा रहा है और लोकतंत्र के चौथे खंभे की सार्थक भूमिका निभा रहा है, तो हम उसके साथ हैं।
सिवाय निर्वाचन आयोग के ये बात सबको पता है। हमारे बार-बार अपील करने पर भी SIR में फ़ार्म 7 की ये धांधली रुक नहीं रही है।
फ़ार्म 7 का दुरुपयोग एक बहुत बड़ा अपराध है। इसके ग़ैरक़ानूनी इस्तेमाल की क्या सज़ा क्या हो सकती है। इसके बारे में चुनाव आयोग विज्ञापन प्रकाशित करे और भाजपाई और उनके संगी-साथियों को चेतावनी दे। हमारे पीडीए-प्रहरी और जागरूक वोटर तो इस फ़र्ज़ीवाड़े के भंडाफोड़ का प्रयास कर ही रहे हैं, चुनाव आयोग भी अपनी विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए आगे आए।
कहीं ऐसा न हो कि मुख्य चुनाव आयुक्त को चेताने के लिए कोई उनका ही नाम फ़ार्म सात का इस्तेमाल करके साफ़ कर दे।
स्पष्टीकरण अपेक्षित :
*चुनाव आयोग किसके साथ योग कर रहा है?*
*पुनः-आग्रह* :
सभी न्यूज़ चैनलों, अख़बारों से अपील है कि वो इस महा-घोटाले का पर्दाफाश करें।
हम स्थानीय यूट्यूबर व लोकल न्यूज़ कर्मियों से लोकतंत्र के हित में ये माँग करते हैं कि आप इस महाघोटाले का भंडाफोड़ करें व अपने स्तर पर प्रकाशित-प्रसारित करें। हम आपकी विश्वसनीय रिपोर्ट को पूरे देश-प्रदेश के सामने रखेंगे व आपकी ईमानदार पत्रकारिता को सच्चे दर्शकों-पाठकों तक पहुंचाएंगे।
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बेटी का बलात्कारी
ज़मानत पर बाहर है,
और सत्ता कहती है—
“क़ानून ने अपना काम किया।
चौराहे पर यमराज नहीं मिला,
क्योंकि यहाँ न्याय नहीं,
समीकरण चलते हैं।
लोकभवन हाथ फैलायें तैयार है—
फूलों से स्वागत के लिए।
यह बलात्कारी की जमानत नहीं,
एक राजनीतिक फ़ैसला है—
जहाँ अपराध नहीं देखा जाता,
केवल जाति, वोट और पद देखा जाता है।
बेटी की चीख़
रिपोर्ट बनकर दबा दी जाती है,
और दरिंदा
नेता बनकर बाहर निकलता है।
यह लोकतंत्र नहीं,
यह दरिंदों का संरक्षण तंत्र है—
जहाँ शर्म विपक्ष में है
और अपराध सत्ता में।
याद रखना,
जब न्याय सत्ता की जेब में चला जाए,
तो बलात्कारी अकेला अपराधी नहीं होता—
पूरी व्यवस्था उसकी साझेदार होती है।
एक ट्रेन में तबीयत बिगड़ने पर एक हिंदू बहन ने बुज़ुर्ग मुसलमान अंकल का हाथ थाम कर मदद की… यही असली भारत है।❤️
ना टोपी देखी, ना तिलक बस तकलीफ़ देखी और दौड़कर इंसान ने इंसान का साथ दिया… नफ़रतों के इस दौर में ऐसे लम्हे याद दिलाते हैं कि “आज भी इंसानियत ज़िंदा है।