1. आदरणीय श्री @manojmuntashir ‘शुक्ल’ जी! आज शायद आपको पता चल गया होगा कि समाज में ‘संवैधानिक अधिकारो, मूल्यों, व्यवस्था एवम सहिष्णुता’ जैसे मूल्यों की कितनी आवश्यकता होती है! एकेडमिक फ़्रीडम और लिटरेरी फ्रीडम (भाषण एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता) कितनी आवश्यक होती है.
A total of 111 sitting MPs and MLAs changed their political parties after being elected to the current Lok Sabha, Rajya Sabha and State Assemblies since 2022. Among them, 26 were members of the Lok Sabha, seven were of the Rajya Sabha and 78 were of Legislative Assemblies. https://t.co/1T3jN2CxhK
लोग अक्सर मुझसे कहते हैं—“नितिन जी, आपने Deswa, Mithila Makhaan, Jackson Halt, Kariyatthi, Chhath जैसी फिल्में बनाईं, National Award जीता, इतने वर्षों से काम कर रहे हैं, लेकिन आपके काम की awareness उतनी नहीं है जितनी Bollywood फिल्मों की होती है ।”
यह बात सही है। लेकिन इसके पीछे की संरचनात्मक समस्या को समझना भी जरूरी है।
पहले तो ये की जिस समाज के लिए मैं भोजपुरी - मैथिली बना रहा हूँ वो बहुत तेज़ी से अपनी मातृभाषा छोड़कर हिंदी में जा चुकी है, उनका जो मीडिया एक्सपोज़र का algorithm है वहाँ बिहार की भाषाएं हैं ही नहीं छठ गीत छोड़कर । मैंने आज तक जो भी प्रमुख काम किए हैं, वे लगभग पूरी तरह भोजपुरी और मैथिली में हैं। समस्या यह है कि इनके पास अपना मीडिया इकोसिस्टम लगभग नहीं है।
हमारी भाषाओं में ऐसा अखबार नहीं है, ऐसा रेडियो नेटवर्क नहीं है, ऐसा न्यूज चैनल नहीं है, ऐसी मजबूत डिजिटल मीडिया व्यवस्था नहीं है जो इन भाषाओं में हो रहे अच्छे सिनेमा, साहित्य, रंगमंच, संगीत या दूसरे सांस्कृतिक कामों को लगातार खोजे, समझे और लोगों तक पहुँचाए।
दूसरी तरफ, हिंदी का मीडिया अपने स्वाभाविक दर्शक-वर्ग और अपने व्यावसायिक हितों के अनुसार काम करता है। भोजपुरी सिनेमा को लेकर पिछले कई दशकों में जिन चेहरों और जिस तरह के कंटेंट ने लोकप्रियता हासिल की है, उसके बारे में लिखने और बात करने के पीछे एक बड़ा स्थापित audience base मौजूद है।
इसलिए उस व्यवस्था में अगर किसी भोजपुरी फिल्म ने अश्लीलता, सनसनी या किसी स्थापित स्टार के कारण चर्चा पैदा की, तो उसके बारे में लिखना मीडिया के लिए आसान है—क्योंकि उसके पीछे पहले से audience curiosity मौजूद है।
लेकिन अगर कोई व्यक्ति भोजपुरी या मैथिली में एक संवेदनशील, शोधपूर्ण या प्रयोगधर्मी फिल्म बना रहा है, तो उसके लिए समस्या सिर्फ फिल्म बनाना नहीं है। समस्या यह है कि उस फिल्म के बारे में लोगों को बताएगा कौन ? मैं पिछले लगभग पंद्रह वर्षों से इसे बहुत करीब से देख रहा हूँ ।
हिंदी मीडिया से यह शिकायत करना भी पूरी तरह उचित नहीं होगा कि वह हमारी फिल्मों को उतनी जगह क्यों नहीं देता। आखिरकार वह हिंदी का मीडिया है, उसका अपना audience है, उसका अपना mandate है और उसकी अपनी व्यावसायिक प्राथमिकताएँ हैं।
असल सवाल कहीं बड़ा है:
भोजपुरी और मैथिली समाज का अपना cultural media ecosystem क्यों नहीं है?
क्यों ऐसा नहीं है कि कोई अच्छी मैथिली फिल्म बने तो उसके बारे में नियमित रूप से चर्चा हो? कोई अच्छी भोजपुरी वेब सीरीज आए तो उसकी समीक्षा हो? कोई नया लेखक, निर्देशक, अभिनेता या संगीतकार अच्छा काम करे तो उसकी खोज और पहचान हो? कोई प्रयोग हो तो उसके ऊपर बहस हो?
आज सोशल मीडिया पर लोग मुझसे बार-बार पूछते हैं—“आपने इतना काम किया, फिर लोगों को उसके बारे में पता क्यों नहीं है?”
मेरा जवाब यही है।
अच्छा काम अपने आप लोकप्रिय नहीं होता। उसके लिए एक ecosystem चाहिए।
और जब वह ecosystem मौजूद न हो, तब समाज के उस वर्ग की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है जो अच्छे काम को पहचानता है।
अगर आपको कोई अच्छी भोजपुरी फिल्म दिखती है—बताइए।
अगर कोई अच्छी मैथिली फिल्म बनी है—उसके बारे में लिखिए।
अगर किसी कलाकार ने अच्छा काम किया है—उसका नाम आगे बढ़ाइए।
एक पोस्ट लिखिए। एक लिंक शेयर कीजिए। किसी को फिल्म देखने के लिए कहिए। चर्चा शुरू कीजिए।
क्योंकि जिन भाषाओं का अपना मजबूत मीडिया नहीं है, वहाँ समाज खुद मीडिया बन जाता है।
और शायद यही हमारे सामने सबसे बड़ा सांस्कृतिक काम है—सिर्फ अच्छी फिल्में बनाना नहीं, बल्कि ऐसा वातावरण बनाना जिसमें अच्छी फिल्में लोगों तक पहुँच भी सकें ।
दिल्ली महिलाओं के लिए इतनी असुरक्षित हो गई है कि दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज ने क्लासेज ऑनलाइन चलाने का फैसला लिया है।
सरकार में अगर ग़ैरत होती तो शर्म से डूब जाती।
We spent months investigating the inner working of the EC.
What we found: the majority of the Commission, kept in the dark for almost a year.
Election Commissioners Sukhbir Singh Sandhu and Vivek Joshi objected on record at least 14 times in 10 months, FOUR times on a single day, to decisions taken in the Commission's name without their knowledge.
Here is what they flagged:
(3/10)
https://t.co/LuOZBDxKt8
गिरिराज किशोर हिंदी के सम्मानित लेखक रहे हैं और उनकी अनेक रचनाएं पाठकों द्वारा आज भी सराही जाती हैं। उन्होंने IIT कानपुर में जातिगत भेदभाव और दलित छात्रों के अनुभवों को अपने चर्चित उपन्यास “परिशिष्ट” में बेहद मार्मिक ढंग से दर्ज किया है।
सनद रहे गिरिराज किशोर IIT कानपुर में 1975 से 1983 तक कुलसचिव और संस्थान में SC/ST छात्रों के साथ होने वाले अपमान, उपेक्षा और पूर्वाग्रह को उन्होंने करीब से देखा था। उपन्यास में इन्हीं अनुभवों की पृष्ठभूमि में उच्च शिक्षा संस्थानों में ‘जाति’, ‘मेरिट’ और ‘सामाजिक वर्चस्व’ के सवाल उठते हैं।
परिशिष्ट केवल किसी एक छात्र की कहानी नहीं है; यह उस संस्थागत वातावरण की पड़ताल है जहाँ आरक्षण के रास्ते आए दलित छात्रों को बराबरी का अवसर है कहने के बावजूद सामाजिक और मानसिक अपमान का सामना करना पड़ता है। इस अर्थ में, गिरिराज किशोर का यह लेखन आज भी IIT जैसे संस्थानों में जातिगत भेदभाव की बहस को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण साहित्यिक दस्तावेज है। आज कई वर्षों बाद “परिशिष्ट” का याद आना अनायास नहीं है।
जय हिन्द
जमुई के वो लड़के और अश्लीलता के हवाले पूरी पीढ़ी l
हमने क्या सिखाया उन्हें?
चौदह का था,
पंद्रह का था,
सोलह-सत्रह का था
बच्चा ही तो था।
उसके हाथ में किताब होनी थी,
आँखों में सपना,
मन में खेल होना था।
मगर उसके मोबाइल में
हमने क्या भर दिया?
गीत के नाम पर देह,
मनोरंजन के नाम पर अश्लीलता,
हर स्क्रीन पर औरत का शरीर
और फिर हम पूछते हैं,
बच्चे ऐसे क्यों हो गए?
जिन्होंने कभी
अश्लीलता को बाज़ार दिया,
जिस संस्कृति ने उसे
करोड़ों व्यूज़ दिए,
आज उसी दुनिया के कुछ चेहरे
संसद में हैं,
विधानसभा में हैं,
सत्ता के गलियारों में हैं।
कल तक जो चीज़
मनोरंजन थी,
आज उसके असर पर
सवाल उठ रहे हैं।
और सवाल सिर्फ
उन चौदह-सत्रह साल के बच्चों से नहीं है
सवाल हमसे है।
हमने उन्हें क्या दिखाया?
क्या सुनाया?
क्या सामान्य बना दिया?
बच्चे अचानक नहीं बिगड़ते
उनके आसपास का समाज
उन्हें धीरे-धीरे बनाता है।
फिर किसी जमुई की सड़क पर
जब एक बच्ची के साथ
बदसलूकी होती है,
तो हम स्तब्ध होकर पूछते हैं—
“ये बच्चे ऐसे कैसे हो गए?”
शायद सवाल बदलने का समय है—
“हमने उन्हें बड़ा होते हुए
दिखाया क्या था?”
और सबसे बड़ा सवाल
जिस अश्लीलता को हमने
बाज़ार में जगह दी,
जिसे लाखों व्यूज़ मिले,
जिसे तालियाँ मिलीं
क्या अब हम उसके
सामाजिक असर से
अपना पल्ला झाड़ सकते हैं?
बिहार की बेटियों से
सिर्फ सुरक्षा का वादा नहीं चाहिए।
उन्हें ऐसा समाज चाहिए
जहाँ उनकी देह
किसी गीत का विषय नहीं,
किसी भीड़ का मनोरंजन नहीं,
किसी सत्ता की सीढ़ी नहीं
बल्कि उनकी अपनी है।
जब भोजपुरी फिल्मों और गीतों के ज़रिए एक पूरी पीढ़ी के सामने लगातार फूहड़ता, अश्लीलता और स्त्री-देह को मनोरंजन की वस्तु बनाकर परोसा जा रहा था, तब सरकारें चुप थीं। बुद्धिजीवी चुप थे। नेता चुप थे। पक्ष-विपक्ष चुप थे । और बॉलीवुड के बड़े-बड़े नाम भी चुप थे ।
किसी ने नहीं पूछा कि हम अपनी अगली पीढ़ी के मन में क्या भर रहे हैं ।
आज वही लड़के बड़े हो चुके हैं। जिन आँखों ने वर्षों तक गीतों में स्त्री के अंग-प्रत्यंग को उपभोग की वस्तु की तरह देखा, जिन कानों ने लगातार वही भाषा सुनी, जिन कल्पनाओं को उसी फूहड़ता ने आकार दिया—उनमें से कुछ अब उस कल्पना को वास्तविक जीवन में छूना चाहते हैं, आज़माना चाहते हैं। अपने हाथों से, अपनी आँखों से, अपने शब्दों से ।
मैं यह नहीं कह रहा कि समाज में महिलाओं के प्रति हिंसा, यौन अपराध या विकृत सोच के लिए केवल भोजपुरी की अश्लीलता जिम्मेदार है। समाज इतना सरल नहीं होता। इसके पीछे पितृसत्ता है, शिक्षा की कमी है, सत्ता और सामाजिक संरचनाएँ हैं, इंटरनेट और पोर्नोग्राफी है, घर और परिवार का संस्कार है, कानून का भय और उसके क्रियान्वयन की कमजोरी है—बहुत कुछ है ।
लेकिन ये बात इसलिए निकलेगी क्यूंकि जिन्होंने औरतों के अंगो पर गाने और फिल्मे बनाकर अपना जेब भरा वो आज देश के "हीरो" हैं, युवा कलकारों की पीढ़ी को सन्देश ये जा रहा है की ये करोगे तो राजा की जिंदगी जियोगे और युवा डूबता ही रहा ऐसी चीज़ों में ।
लेकिन यह सवाल पूछना भी ज़रूरी है कि अगर किसी समाज को दो दशकों तक लगातार फूहड़ता, स्त्री-विरोधी भाषा और नग्न उपभोग की संस्कृति के हवाले कर दिया जाए, तो क्या उसका कोई असर नहीं होगा ?
असर होता है । ज़रूर होता है । और देर-सबेर दिखाई देता है । सबसे भयावह बात सिर्फ अश्लीलता का फैलना नहीं थी। उससे भी भयावह था हमारा सामूहिक मौन।
हममें से बहुत लोग इस सबको पसंद नहीं करते थे। घर के बंद दरवाज़ों के पीछे इसकी आलोचना भी करते थे। लेकिन सार्वजनिक रूप से बोलने की हिम्मत नहीं थी। क्योंकि बोलने पर लोग कहते—“अरे, मनोरंजन है… जाने दीजिए ।”
हमने जाने दिया । फिर थोड़ा और जाने दिया ।
फिर इतने साल जाने दिया कि एक दिन हमें पता चला—हमने सिर्फ गाने नहीं सुने थे, हमने एक संस्कृति को सामान्य बना दिया था ।
और अब जब उसका असर समाज में दिखाई दे रहा है, तो हम अचानक पूछ रहे हैं—ये लड़के ऐसे क्यों हो गए ?
बिहार तो चारो तरफ से मारा गया, बॉलीवुड वाला नीरज पांडे जैसे अपने हिंदी फिल्म में डालता है "आइये हमरे बिहार में कट्टा ठोक दें कपार में वहीँ प्रियंका चोपड़ा ये कहती है अपनी भोजपुरी फिल्मे की "सइयां जी रहेलन हमरा पे हावी बोलेरो के चाभी से खोद देलन नाभी ।" ये बड़े लोग हैं, इज़्ज़तदार लोग हैं ।
लेकिन सवाल यह भी होना चाहिए—
जब युवा पीढ़ी को लगातार यही सिखाया जा रहा था कि स्त्री एक देह है, एक वस्तु है, एक तमाशा है, बिहार में तो यही सब होता है — तब हम कहाँ थे ?
हम चुप थे ।
मार्टिन लूथर किंग जूनियर ने चेताया था -
“इस पीढ़ी को एक दिन अपने किए पर पछताना पड़े। केवल बुरे लोगों के कटु शब्दों और हिंसक कृत्यों के लिए नहीं, बल्कि उन अच्छे लोगों की भयावह चुप्पी और उदासीनता के लिए भी ।’”
“We will have to repent in this generation. Not merely for the vitriolic words and the violent actions of the bad people, but for the appalling silence and indifference of the good people.”
While the death of the IIT Bombay student is extremely unfortunate and yet another reminder that these premier institutions need to work on the campus environment and mental health but to sack the professors to end the protests is just a band aid solution to a problem that needs surgery. Also, shifting the blame on the professors who were doing their job of reporting copying during an exam and making it about caste discrimination is a sad outcome.
भागवत कह रहा है 'सेक्युलरिज्म मॉडर्न' विचार है, 'ये भारतीय परंपरा में फिट' नहीं होता। इस जाहिल को यह नहीं पता कि यूरोप के 'सेक्युलरिज्म' का मतलब हिंदू-मुस्लिम-सिख-ईसाई एकता नहीं था, न है। यूरोप में हिंदू-मुस्लिम-सिख थे ही नहीं। वहाँ इसका मतलब था वैज्ञानिक तर्क को मानना। 'सेक्युलरिज्म' की धार्मिक एकता वाली परिभाषा सिर्फ़ हमारी है। मगर इस आदमी को क्या, सारे आरएसएस/बीजेपी गैंग को हज़ारों वर्षों की एकता और विज्ञान दोनों से नफ़रत है। इससे और क्या उम्मीद की जा सकती है
Of all places, to see such discriminatory and inhuman posters put up in our IITs is chilling. These are institutions we once imagined as sanctuaries of reason, curiosity and scientific temper. When prejudice begins to find a home there, it is no longer an aberration but a sign of something far more unsettling.........
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने UP सरकार को बड़े सबक वाला फैसला दिया है।
13 अप्रैल को नोएडा में मज़दूर प्रोटेस्ट के दौरान हुई हिंसा हुई थी। उस मामले में एक्टिविस्ट आकृति चौधरी पर NSA लगा कर जेल में डाल दिया। तब नक्सल,फॉरेन कनेक्शन की बातें सरकार की तरफ से हुई थी।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा- सरकार की कहानी मनगढ़ंत है। तुरंत रिहाई के आदेश। साथ ही नोएडा की DM, IAS मेघा रूपम की तनख़्वाह से काटकर 5 लाख मुआवजा भी देने को कहा
सेलिब्रिटी की लड़ाई पर लाखों views।
राजनेताओं की बयानबाज़ी पर घंटों बहस।
Viral reel पर पूरा देश।
लेकिन दूरदराज़ के गाँव में आदिवासी बच्चे मरें तो ख़ामोशी।
सवाल सिर्फ़ ये नहीं कि मीडिया क्या दिखाता है।
सवाल ये भी है—हम किसकी मौत देखने लायक समझते हैं?
#Baiga#TribalIndia #MediaBytes
भारतीय स्टेट बैंक ने एक लाख करोड़ का लोन छोड़ दिया। NCLT के बाद एक लाख करोड़ वसूलने की उम्मीद होती भी है क्या? क्या ये लोन माफ़ी नहीं है? ये सौभाग्यशाली लोग कौन थे जिनका हज़ारों करोड़ का लोन राइट ऑफ हो गया!
जब नाश मनुज पर छाता है,
पहले विवेक मर जाता है।
दूसरों की बहन बेटी को उठाने वाले, प्रेग्नेंट औरत को गोली मारने वाले करेक्टर को प्रमोट करना पड़ रहा है।
जबकि असली छात्र को दिमागी नक्सल बताया जा रहा है।
अरे साला,
अब समझ आया कि क्या गड़बड़ है,
मतलब जो लोग अंधे हैं उन्हें गोरखपुर स्पेन नहीं लगता है।
लेकिन सांसद जी,
जो अंधा होगा उसे कैसे दिखेगा कि गोरखपुर स्मार्ट सिटी है या नहीं?