महंगाई,बेरोज़गारी,किसान आंदोलन,आर्थिक अनिश्चितता,सीमा अतिक्रमण व जन-स्वास्थ्य जैसी ज़रूरी बहसों से मुँह फेरकर,गाँधी-सावरकर व “छह ग्राम सेलिब्रिटी नशा” जैसी अप्रासंगिक थेथरई पर पूरा-पूरा दिन स्क्रीन समर्पित करने के लिए किस ख़ास तरह की बेशर्मी व कुतार्किक पाखंड की ज़रूरत होती होगी?
मुशायरे के मंचों से लेकर निजी ज़िंदगी तक, मेरी सभी महत्वपूर्ण यात्राओं में साथ सफ़र करने वाले, बाकमाल शायर और बेहतरीन दोस्त, बड़े भाई राहत साहब की आज पुण्यतिथि है।व्यथित मन से इतना ही कहूँगा कि यह बात इस वक्त नहीं लिखनी थी! यह वक्त तो मुशायरों में आपके साथ ठहाके साझा करने का था