“Independence is no doubt a matter of joy. But let us not forget that this independence has thrown on us great responsibilities. By independence, we have lost the excuse of blaming the British for anything going wrong. If hereafter things go wrong, we will have nobody to blame except ourselves.”
Dr. B. R. Ambedkar in his last Constitution Assembly Speech on
25.11.1949
#Accountability #SelfReflection #Responsibility #ConstitutionalMorality #Justice
“भ्रष्टाचार वो ज़हर है जो एक बार मुँह में जाता है और खून के रैशे-रैश में पैठता जाता है। अगर बिना अपना कमीशन लिए एक भी देशी-विदेशी सौदा नहीं किया जा सकता तो हमें उस चपरासी और क्लर्क को भी छूट देनी होगी जो बिना अपना ‘हक’ लिए आपकी अर्जी नहीं पकड़ता रेल का टिकट नहीं देता।”
‘राजीव गांधी’ प्रधानमंत्री के नाम एक खुला पत्र का अंश द्वारा डॉ राजेंद्र यादव 12.11.1984
#corruption #endcorruption #responsibility #accountability #transparency @RTIExpress@AmitCSS11@ThePSFront
सिखों के छठे गुरु, मीरी-पीरी के महान प्रणेता, शौर्य और आध्यात्मिकता के प्रतीक श्री गुरु हरगोबिंद साहिब जी को नमन करते हैं।
जिन्होंने दो तलवारें धारण कर धर्म की रक्षा का संदेश दिया, अकाल तख्त की नींव रखी और सिख पंथ को योद्धा स्वरूप प्रदान किया। आपके जीवन से हमें सिख मिलती है — आध्यात्मिकता के साथ साहस भी जरूरी है।
सभी को गुरु हरगोबिंद साहिब जी के प्रकाश पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ !
वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह !
#GuruHargobindSahibJi #PrakashParv #GuruHargobindJayanti #MeeriPeeri #SikhGuru #Gurpurab #Waheguru #Sikhism #PrakashPurab
#प्रकाश_पर्व #गुरु_हरगोबिंद_साहिब_जी #मीरी_पीरी
Every road accident victim remembers three people:
❤️ The one who helped.
🚑 The one who brought the ambulance.
👨⚕️ The doctor who fought to save their life.
Thank you to every doctor for giving hope when it matters most.
#NationalDoctorsDay#BeASatwikSathi
समाज सेवा और सामाजिक परिवर्तन:
यह एक महत्वपूर्ण बिंदु है जिसे समझना चाहिए। चिकित्सा नैतिकता (Remedial Morality) कहती है, रोकथाम इलाज से बेहतर है। बीमारी का इलाज करने के बजाय उसकी रोकथाम पर अधिक ध्यान दें। फ्रैक्चर को ठीक करना समाज सेवा है, फ्रैक्चर न हो इसके लिए माहौल बनाना सामाजिक परिवर्तन है। कुपोषित आदिवासी बच्चों को विटामिन की गोलियां देना समाज सेवा है, उनके माता-पिता को रोजगार देना ताकि वे अपने बच्चों के लिए पौष्टिक भोजन खरीद सकें, सामाजिक परिवर्तन है। भिखारी को दान देना समाज सेवा है, ऐसा सामाजिक माहौल बनाना ताकि किसी को भीख न मांगनी पड़े, सामाजिक परिवर्तन है। जब बाजार मूल्य 7 रुपये प्रति किलो है, तब दो रुपये प्रति किलो चावल देना समाज सेवा है, व्यक्ति की आय बढ़ाना ताकि वह बाजार मूल्य पर चावल खरीद सके, सामाजिक परिवर्तन है। भूखे को खाना खिलाना समाज सेवा है, ऐसी स्थिति बनाना जहां कोई भूखा न रहे, सामाजिक परिवर्तन है। अनपढ़ को पढ़ाना समाज सेवा है, उस सामाजिक ढांचे को नष्ट करना जिसने उसे अनपढ़ बनाया है, सामाजिक परिवर्तन है।
"झोपड़पट्टी" की एक अनपढ़ गरीब बस्ती के आस-पास एक नया स्कूल खोलना समाज सेवा हो सकती है, गरीब भूखे और अनपढ़ आदमी को अपने बच्चे को खाली पेट भी पाँच किलोमीटर दूर चलकर स्कूल भेजने के लिए प्रेरित करना सामाजिक परिवर्तन है। एक कमज़ोर व्यक्ति को हथियार देकर उसकी रक्षा करना समाज सेवा है, उसे इतना मज़बूत बनाना कि वह अपने हथियार खुद बना सके और उनका इस्तेमाल कर सके, सामाजिक परिवर्तन है। एक स्कूली बच्चे को समतावादी प्रार्थना सिखाना समाज सेवा हो सकती है, इंसानों के बीच असमानता फैलाने वाले शास्त्रों को बारूद से उड़ा देना सामाजिक परिवर्तन है।
#SocialJustice #SocialTransformation
#equaljusticeforall #Equality #EducationForAll #Kanshiram
"देवताओं, मंदिरों और ऋषियों का यह देश!
इसलिए क्या यहाँ सब कुछ अमर है?
वर्ण अमर, जाति अमर, अस्पृश्यता अमर!... युग के बाद युग आए! बड़े-बड़े चक्रवर्ती आए ! दार्शनिक आए! फिर भी अस्पृश्यता, विषमता अमर है !
यह सब कैसे हो गया? किसी भी महाकवि, पंडित, दार्शनिक, सत्ताधारी सन्त की आँखों में यह अमानुषिक व्यवस्था चुभी क्यों नहीं ?
बुद्धिजीवियों, संतों और सामर्थ्यवानों का यह अंधापन, यह संवेदन शून्यता दुनियाभर में खोजने पर भी नहीं मिलेगी! इससे एक ही अर्थ निकलता है कि यह व्यवस्था बुद्धिजीवियों, संतों और राज करने वालों को मंजूर थी! यानी इस व्यवस्था को बनाने और उसे बनाये रखने में बुद्धिजीवियों और शासकों का हाथ है।"
-बाबुराव बागुल
जानेमाने मराठी लेखक
#समरसता #समता #समानता #न्याय #जाति_उन्मूलन #CasteDiscrimination
#SocialJustice #SocialTransformation
#Ambedkar #Equality #equaljusticeforall
सच्चे प्रजातंत्रवादी व समाज सुधारक, सामाजिक परिवर्तन की दिशा में क्रांतिकारी दिशा तय करने वाले, छत्रपति शिवाजी महाराज के वंशज, भारत में पहली बार नौकरी और शिक्षा में वंचितों को विधिक तरीके से प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कराने वाले, शिक्षा के द्वार हर जाति के लिए खोलने वाले, बाबा साहब को पूरे देश के पीड़ितों का नेता बताने वाले, बाबा साहब के लिए उच्च शिक्षा व उनके अख़बार “मूकनायक” के लिए सहायता देने वाले, सामाजिक क्रांति के योद्धा, आरक्षण एवं सच्चे प्रतिनिधित्व के जनक, कोल्हापुर के शासक, बहुजन कुल के गौरव, शोषितों और वंचितों के मसीहा लोकनायक छत्रपति शाहू जी महाराज जी के जन्म दिवस 26 जून पर कृतज्ञतापूर्ण सादर नमन💐🙏
छत्रपति शाहू जी महाराज मराठाओं के भोसले राजवंश से कोल्हापुर रियासत के महाराजा थे। शाहू जी महाराज जी का जन्म कोल्हापुर जिले के कागल गाँव के घाटगे शाही मराठा परिवार में आज ही के दिन 26 जून, 1874 को हुआ था । छत्रपति शाहू जी महाराज ने समाज के समग्र विकास के लिए अतुलनीय कार्य किए। वर्ष 1917 में उन्होंने विधवापन को वैध बनाने के लिए पुनर्विवाह अधिनियम बनाया। उन्होंने कई जनजातियों के लोगों को अपराध का शिकार होने से बचाने के लिए ब्रिटिश काल की 'उपस्थिति प्रणाली' को बंद करके कोल्हापुर राज्य में लोगों को नौकरी दी और भटक रहे लोगों को आजीविका के अवसर प्रदान किये ।
वर्ष 1919 में छत्रपति शाहू जी महाराज और बाबा साहब डॉ.भीमराव आम्बेडकर जी की मुलाकात हुई। उन्होंने बाबा साहब के समाचार पत्र "मूकनायक" और इंग्लैंड में उनको *उच्च शिक्षा* प्राप्त करने में महत्वपूर्ण मदद की। सामाजिक सुधारों के साथ, शाहू जी महाराज जी ने कृषि को बढ़ावा दिया तथा कृषि और औद्योगिक प्रदर्शनियों का आयोजन कराया। कृषि उत्पादों के लिए तथा शाहपुरी जयसिंगराव जैसे बाजारों की स्थापना के कारण कोल्हापुरी गुड़ बाजार दुनिया भर में प्रसिद्ध हो गया था। शाहू जी महाराज ने उद्योगों की नींव भी रखी थी और आधुनिक कपड़ा उद्योग को बढ़ावा देने के लिए उन्होंने शाहू मिल की स्थापना की थी।
छत्रपति शाहू जी महाराज-महामना फुले और बाबा साहब के बीच की महत्वपूर्ण कड़ी थे। छत्रपति शाहू जी महाराज जी ने जो कुछ बहुजन समाज के लिए किया, उस पर महामना फूले की छाप स्पष्ट दिखाई पङती है। महामना फूले ने पाखंडवादी, पितृसत्तात्मक जाति व्यवस्था की कड़ी आलोचना की थी, जो महिलाओं, पिछङों और अतिपिछङों को गुलाम और अज्ञानी बनाए रखना चाहती थी ।
महामना फूले जी को आशा थी कि शिक्षा और एकजुटता के सहारे बहुजन समाज असमान जाति व्यवस्था के ढांचे का ध्वस्त कर सकेंगा। शाहू जी महाराज ने महामना फूले के शिक्षा को आगे बढ़ाते हुए प्राथमिक शिक्षा का सार्वभौमिकरण करने का प्रयास किया। शाहू जी महाराज, बाबा साहब के अनन्य प्रशंसक थे और दलित वर्गों के नेता के रूप में उन्हें मान्यता देते थे। बाबा साहब भी शाहू जी महाराज को आमजनों व उनके हितों का संरक्षक और हिमायती मानते थे। बाबा साहब, शाहू जी महाराज की सकारात्मक सामाजिक नीतियों और कार्यक्रमों से बहुत प्रभावित थे।
महामना फूले-शाहू जी महाराज और बाबा साहब में कई समानताएं थीं। तीनों महापुरूषों ने अंग्रेज़ी की शिक्षा ग्रहण की थी और उन पर उदारवादी, पश्चिमी तर्कवादी चिंतकों का प्रभाव था। फूले, थाॅमस पेन की पुस्तक ‘राईट्स आफ मेन’ से बहुत प्रभावित थे। आंबेडकर, जानेमाने बुद्धिजीवी, मानवतावादी और कोलंबिया विश्वविद्यालय में उनके प्रोफेसर जान डेवी से प्रभावित थे। वहीं शाहू जी महाराज अपने गुरू फ्रेज़र का बहुत सम्मान करते थे। वह अमरीकी मिशनरियों के भी प्रशंसक थे, विशेषकर डा. वानलेस व डा. वेलके के, जिनकी सोंच समतावादी थी और जो दबे-कुचले वर्गों के बीच रहकर काम करते थे। तीनों महापुरूषों ने कहीं न कहीं जातिवादियों के हाथों अपमान सहा था और तीनों ही इतने परिपक्व थे कि वह यह समझ सकें कि उनके व्यक्तिगत जख्मों का कारण जाति व्यवस्था थी। तीनों ने अपने व्यक्तिगत अनुभव से ऊपर उठकर बहुजनों के लिए संघर्ष किया। तीनों महापुरुष यह मानते थे कि शिक्षा, पिछङों की मुक्ति की कुंजी है। तीनों ने अपनी सोच को अलग-अलग शब्दों में व्यक्त किया। फूले के शब्दों में शिक्षा लोगों के लिए ‘तृतीय रत्न’ का द्वार खोलेगी और वह यह समझ सकेंगे कि उनका शोषण हो रहा है और उसके विरूद्ध संघर्ष कर सकेंगे। शाहू जी ने अपनी जनता को ज्ञान प्राप्त करने, एकजुट होने और अपने अधिकारों के लिए लड़ने के लिए प्रोत्साहित किया। वहीं बाबा साहब ने शिक्षा, संगठन और संघर्ष पर बल दिया ।
#राजर्षि_छत्रपति_शाहू_जी_महाराज
#अम्बेडकर #बहुजन #ShahuJiMaharaj
#Bhaujan #Phule
@praveenrpal82
DMRC Commences Work at Central Secretariat Station for Central Vista Corridor
➤ The Central Secretariat Station will become a triple interchange station, where the new Magenta Line station will seamlessly connect with the existing Yellow Line and Violet Line
➤ This unique facility will significantly benefit government employees and commuters accessing the Lutyens’ Zone and surrounding administrative districts
➤ The corridor spans 9.913 km with nine underground stations, namely: Shivaji Stadium, Yuge Yugeen Bharat, Central Secretariat, Kartavya Bhawan, India Gate, War Memorial–High Court, Baroda House, Bharat Mandapam, and Indraprastha.
#DelhiMetro #CentralVistaCorridor
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"दलित जातियों तथा पिछडे वर्गों को सामाजिक न्याय तथा आर्थिक विकास का लाभ तभी मिल सकता है, जब उन्हें मद्यपान से हानि की जानकारी दी जाय तथा यह कार्य राज्य स्तर से भी होना चाहिये। " - डा0 बी0आर0 अम्बेडकर
आज ही नशा मुक्त भारत ऑनलाइन क्विज़ में भाग लें—QR कोड स्कैन करें, अपनी जानकारी परखें और नशामुक्त भविष्य के अभियान से जुड़ें। नशामुक्ति सहायता के लिए 14446 पर कॉल करें।
Take the Nasha Mukt Bharat Online Quiz today—scan the QR code, test your knowledge, and join the movement for a drug-free future. For de-addiction support, call 14446.
#नशा_मुक्त_भारत
#नशा_नाश_की_जड़
#नशा_मुक्ति_अभियान
#NashaMuktBharat
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"मानव बनने के लिए स्वयं में परिवर्तन लाओ।
संगठित होने के लिए स्वयं में परिवर्तन लाओ।
शक्ति पाने के लिए स्वयं में परिवर्तन लाओ।
एकता लाने के लिए स्वयं में परिवर्तन लाओ।
स्वतंत्रता पाने के लिए स्वयं में परिवर्तन लाओ।
घरेलू जीवन खुशहाल बनाने के लिए स्वयं में परिवर्तन लाओ।"
#SocialTransformation
#Justice
#Equality
#Liberty
#humanity
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"एक सफल क्रांति के लिए मात्र असंतोष होना पर्याप्त नहीं है। अपेक्षित है राजनीतिक एवं सामाजिक अधिकारों की न्यायसंगतता, अनिवार्यता तथा महत्ता के प्रति प्रगाढ़ एवं समग्र विश्वास।"—
डॉ. बी.आर. आंबेडकर
For a successful revolution it is not enough that there is discontent. What is required is a profound and thorough conviction of the justice, necessity and importance of political and social rights.
Dr. B.R. Ambedkar
श्री किशोर मकवाना जी, माननीय अध्यक्ष, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग और श्री अंतर सिंह आर्य जी, माननीय अध्यक्ष, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के साथ भेंट कर @CS_SCSTWelfAsso के अप्रैल में होने वाले वार्षिकोत्सव के लिए आमंत्रित किया।
अवसर पर सामाजिक जिम्मेदारी और राष्ट्र निर्माण में भागीदारी पर चर्चा की।
संत शिरोमणि गुरु रैदास जी की जयंती की सभी को बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएं।
गुरुओं के गुरु संत शिरोमणी रैदास ने भक्तिकाल में इंसानियत के लिए मनुष्यों में आपसी भेदभाव और असमानता के सारे माध्यमों को तोड़कर एक समानता और समतामूलक समाज की स्थापना को जन्म दिया। उन्होंने तत्कालीन समाज में व्याप्त जातिवाद और ऊँच-नीच को समाप्त कर समता, समानता और मानवीय मूल्यों पर आधारित बेगमपुरा की कल्पना की है जहां कोई भी व्यक्ति एक दूसरे से भेदभाव नहीं करता है, सभी समान है और खुशी से रहते हैं ।
जातियों की प्रकृति और भेदभाव को उन्होंने इस प्रकार कहा है:-
"जाति-जाति में जाति हैं, जो केतन के पात।
रैदास मनुष ना जुड़ सके जब तक जाति न जात।।"
अर्थात जिस प्रकार केले के तने को छीला तो पत्ते के नीचे पत्ता, फिर पत्ते के नीचे पत्ता और अंत में कुछ नही निकलता, लेकिन पूरा पेड़ खत्म हो जाता है। ठीक उसी तरह इंसानों को भी जातियों में बांट दिया गया है, जातियों के विभाजन से इंसान तो अलग-अलग बंट ही जाते हैं, अंत में इंसान खत्म भी हो जाते हैं, लेकिन यह जाति खत्म नही होती।
कोई भी मनुष्य अपने जन्म से नहीं बल्कि कर्म से ऊंचा या नीचा होता है। इसे संत रैदास जी ने कुछ इस प्रकार कहा है:
"रविदास जन्म के कारनै, होत न कोउ नीच।
नकर कूं नीच करि डारी है, ओछे करम की कीच।।"
अर्थात कोई भी व्यक्ति किसी जाति में जन्म के कारण नीचा या छोटा नहीं होता है, आदमी अपने कर्मों के कारण नीचा होता है।
व्यक्ति को उसकी जाति से नहीं बल्कि उसके गुणों और योग्यता के आधार सम्मान करना चाहिए। संत रैदास जी कहते है कि :
"ब्राह्मण मत पूजिए जो होवे गुणहीन।
पूजिए चरण चंडाल के जो होवे गुण प्रवीन।।"
अर्थात किसी व्यक्ति को सिर्फ इसलिए नहीं पूजना चाहिए क्योंकि वह किसी ऊंचे कुल में जन्मा है। यदि उस व्यक्ति में योग्य गुण नहीं हैं तो उसे नहीं पूजना चाहिए, उसकी जगह अगर कोई व्यक्ति गुणवान है तो उसका सम्मान करना चाहिए, भले ही वह कथित नीची जाति से हो।
एक कल्याणकारी राज्य की परिकल्पना जोकि हमारा संविधान का उद्देश्य भी है, जिसका आधार स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित है संत रैदास जी ने अपने बेगमपुरा में देखी थी जिसका वर्णन उन्होंने इस प्रकार किया है:
"ऐसा चाहूँ राज मैं जहाँ मिले सबन को अन्न।
छोट बड़ो सब सम बसे रैदास रहे प्रसन्न।।"
अर्थात मैं ऐसा राज चाहता हूँ जहाँ सभी लोगों को भरपेट खाना मिले और सभी लोग किसी भी कारण से भेदभाव से बचे तथा समान रूप से रहें तो रैदास खुश रहेंगे. गुरु रैदास ने ऐसे राज के रूप में बेगमपुरा की कल्पना की है।
#रविदास_जयंती #संत_शिरोमणि_गुरुरविदास_जयंती
#संत_रविदास_जयंती
#बेगमपुरा #समानता #स्वतंत्रता #बंधुत्व
#ravidas_jayanti #SantRavidasJayanti
#Budget2026
#nirma
A delegation of the Association paid a courtesy call on Sh. Chirag Paswan, Hon’ble Union Minister, and conveyed New Year Greetings. The Association apprised him of its efforts for the welfare of SC/ST employees, including reservation in promotion. @iChiragPaswan ji @AmitCSS11
"चाहूँ ऐसा राज मैं जहाँ मिले सबन को अन्न।
छोटे-बड़े सब सम बसें रैदास रहे प्रसन्न।।"
आज के कल्याणकारी लोकतन्त्र की परिकल्पना को निर्गुण भक्ति के महान संत रैदास ने आज से 500 वर्ष पहले की थी।
संत रैदास ने समाज में फैली कुरीतियों के खिलाफ उठाई, छुआछूत आदि का विरोध किया। उन्होंने लोगों को सन्देश दिया कि ईश्वर ने इंसान को बनाया है न कि इंसान ने ईश्वर को।
वे कहना चाहते थे कि इस धरती पर सभी को भगवान ने बनाया है और सभी के अधिकार समान हैं। इन सामाजिक परिस्तिथियों के सन्दर्भ में संत रैदास जी ने लोगों को भाईचारा और मानवीयता का ज्ञान दिया। वे इस दुनिया के हर इंसान को सुखी और प्रसन्न देखना चाहते थे।
@BeASatwikSathi@RTIExpress@CS_SCSTWelfAsso@NimSahab@vkjatav84@praveenrpal82@ThePSFront@nastikbhagat@narendramodi@PMOIndia
We have least respect for the basic civic behavior until it has religious and social sanction. Just imagine the situation on sanitation when Prime Minister himself took initiative to enforce the basic sanitation habits of (i) cleanliness
(ii) construction of toilets in houses.
(iii) constructions of toilets in schools/colleges and public places.
I have made a list of some civic qualities need to be inculcated in ourselves.
सार्वजनिक स्थानों पर हर नागरिक को सामान्य व्यवहार की आदत डालनी चाहिए जिसकी जिम्मेदारी हम सभी की है। कुछ सामान्य व्यवहार निम्न है:
(1 ) कतार में लगें - ट्रेन, बस, मंदिर, बैंक, दुकान – कहीं भी लाइन तोड़ना नहीं।
(2) सड़क पर चलते समय फुटपाथ पर चलें, ज़ेब्रा क्रॉसिंग का इस्तेमाल करें, ट्रैफिक सिग्नल का पालन करें।
(3 ) सार्वजनिक परिवहन में
बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं, दिव्यांगों को सीट दें,
तेज़ आवाज़ में फोन पर बात न करें
खाना खाकर कचरा डिब्बे में ही डालें
(4) कचरा सही जगह डालें: रास्ते पर, पार्क में, ट्रेन में थूकना या कचरा फेंकना बंद करें। अपना कचरा हमेशा डस्टबिन में डालें।
(5) शोर कम करें: रात 10 बजे के बाद लाउडस्पीकर, हॉर्न, तेज़ म्यूजिक न बजाएँ। दूसरों का आराम उतना ही महत्वपूर्ण है।
(6 ) सार्वजनिक संपत्ति का सम्मान: बस की सीटें न काटें, दीवारों पर न लिखें, पार्क के पौधे न तोड़ें।
(7) महिलाओं व बच्चों के प्रति संवेदनशील रहें: भीड़ में धक्का न दें, छेड़खानी बिल्कुल नहीं, असहज करने वाली टिप्पणी न करें।
(8) पानी और बिजली बचाएँ : सार्वजनिक नल बंद करें, पार्क में पानी बर्बाद न करें, स्ट्रीट लाइट अपने आप बंद हो रही हो तो उसे जलाए न रखें।
(9) दूसरों की निजता का खयाल रखें: किसी की फोटो या वीडियो बिना इजाज़त न लें, सोशल मीडिया पर टैग करते समय भी पूछ लें।
मुस्कुराकर “धन्यवाद”, “क्षमा करें”, “शुभ प्रभात” कहने में कोई पैसा नहीं लगता। ये शब्द समाज को बहुत सुंदर बनाते हैं।
ये छोटे-छोटे नियम अगर हम सब रोज़ अपनाएँ, तो हमारा शहर, हमारा देश सचमुच स्वच्छ, सुरक्षित और सुसंस्कृत हो जाएगा।
आइए, अच्छे नागरिक बनें – पहले खुद से शुरू करें! 🙏
@BeASatwikSathi@ThePSFront@NimSahab@praveenrpal82@PMOIndia@MORTHIndia
शिक्षा सामाजिक बदलाव का सबसे अचूक और क्रांतिकारी हथियार है –
यही बात सबसे पहले महात्मा ज्योतिराव फुले ने सिद्ध की, जब उन्होंने स्त्रियों और शूद्र जातियों के लिए स्कूल खोलकर सदियों की गुलामी की जंजीरें तोड़ने का बीड़ा उठाया। हण्टर कमीशन से सारभौमिक प्राथमिक शिक्षा, ट्रेनिंग स्कूल आदि सहित आरक्षण, छात्रवृत्ति की मांग की।
इसी क्रांति को आगे बढ़ाते हुए छत्रपति शाहू जी महाराज ने कोल्हापुर रियासत में न केवल मुफ्त और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा लागू की, बल्कि पिछड़े और दलित बच्चों के लिए छात्रावास खोलकर तथा आरक्षण देकर यह साबित किया कि राज्य की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है – अपने सबसे वंचित नागरिक को भी उच्चतम शिक्षा तक पहुँचाना।
और इसी विचार को संवैधानिक गारंटी देने का काम डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने किया। उन्होंने कहा था – “मैं ऐसी व्यवस्था बनाऊँगा जिसमें जन्म के आधार पर किसी को शिक्षा से वंचित न रखा जाए।”
इसलिए उन्होंने अनुच्छेद 45 , 46 और आरक्षण की व्यवस्था देकर यह सुनिश्चित किया कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा केवल विशेषाधिकार न रहे, बल्कि हर भारतीय का मौलिक अधिकार बने।
फुले ने सपना देखा, शाहू ने उसे साकार किया, आंबेडकर ने उसे कानून बना दिया।
इसलिए आज भी सत्य यही हैः
शिक्षा अगर सबको समान रूप से और गुणवत्ता के साथ नहीं मिलेगी, तो फुले-शाहू-आंबेडकर का सामाजिक न्याय का संघर्ष अधूरा ही रहेगा।
सरकार की सबसे पहली और पवित्र जिम्मेदारी है – हर बच्चे तक मुफ्त, अनिवार्य और उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा पहुँचाना, क्योंकि यही एकमात्र रास्ता है जिससे हम जाति, धर्म और आर्थिक असमानता की दीवारों को हमेशा के लिए ढहा सकें।
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