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जीवन के गाओ गीत मधुर
जो मिला नहीं क्या काफी है
जो है उसका उल्लेख करो
महसूस करो रब राजी है
जो संतोषी है वही सुखी
शिकवा में रहता वही दुखी
संतोषं शरणं गच्छामि
गोविंदं शरणं गच्छामि
@SiddharthAulia
मेरा ईश्वर एक काव्य है। मैं जिस ईश्वर की बात कर रहा हूँ, वह कोई धारणा नहीं है। मैं तो उस ईश्वर की बात कर रहा हूँ जो है.. जो मौजूद है..जो वृक्षों में हरा है, फूलों में लाल है, जो हवाओं में अदृश्य है, जो पहाड़ों में सिर उठाए खड़ा है--ध्यानस्थ। मेरे लिए ईश्वर अस्तित्व है।
#ओशो
प्रेम में कभी कोई हारा?
प्रेम में तो जीत ही जीत है।
प्रेम में हार होती ही नहीं।
तुमने प्रेम किया, बात पूरी हो गई।
प्रतिकार की आकांक्षा प्रेम में नहीं होती।
प्रतिफल की आकांक्षा प्रेम में नहीं होती।
#ओशो
97
हैं वही सुखी हैं वही धनी
है पास नाम का धन जिनके
निस दिन सुमिरन की मस्ती में
नित अहोभाव में हैं रहते
जो आनंद संत फकीरी में
वह आनंद नांहं अमीरी में
आनंदं शरणं गच्छामि
गोविंदं शरणं गच्छामि
@SiddharthAulia
जब तक स्वयं का स्वीकार न हो,
कि मैं जैसा भी हूँ ,जो भी मेरा होना है,
उसका पूर्ण स्वीकार ,तब ही कोई
स्वयं को प्रेम कर सकता है।
जिसे स्वयं से ही प्रेम नही है ,
वो किसी को भी प्रेम नही कर सकता,
और उसे भी कोई प्रेम न कर सकेगा।
#ओशो
इस संसार में सदा नहीं रहेंगे,ऐसा जिसको समझ में आ गया,उसी को इस संसार में रहने का ढंग आ गया।जिसको समझ में आ गया ओस की बूंद है,अब गिरी,तब गिरी;भोर की तरैया है,अब डूबी,तब डूबी।क्षणभर का खेल है फिर क्या चिंता है?फिर किसको दुख देना है, किसको पीड़ा देनी है,किससे शत्रुता लेनी है।
#ओशो
95
पांचजन्य फूंको हे अर्जुन
शोक मोह का समय नहीं है
रण से भागो नहीं धनंजय
तात सनातन धर्म यही है
चीर हरण को याद करो अब
समय नहीं बरबाद करो अब
दायित्वं शरणं गच्छामि
गोविंदं शरणं गच्छामि
@SiddharthAulia
अहंकार की चालबाजियों से बचना।
अहंकार अंत-अंत तक पीछा
करता है। धन से ही नहीं अकड़ता,
पद से ही नहीं अकड़ता, प्रार्थना से
भी अकड़ जाता है, ध्यान से भी
अकड़ जाता है। और जहां अहंकार
आया वहीं द्वार बंद हो गए; वहीं तुम
विच्छिन्न हो गए, टूट गईं तुम्हारी
जड़ें परमात्मा से।
#ओशो
94
हिंदू जागा नहीं आज तो
कल भारत से मिट जाएगा
राम राज्य यदि हुआ नहीं तो
रावण हाबी हो जाएगा
राम कृष्ण का देश यही है
संतों का संदेश यही है
संतत्वं शरणं गच्छामि
गोविंदं शरणं गच्छामि
@SiddharthAulia
तुम्हारी यह फिक्र नहीं होती कि मैं झूठ न बोलूँ,
तुम्हारी यह फिक्र होती है कि किसी को यह पता
चले कि मैं झूठ बोला।अजीब सी
बात है। तुम्हारी यह चिंता नहीं होती कि मैं झुठ
न बोलूँ--वही असली बात है जिसकी लज्जा
होनी चाहिए। करते वख्त लज्जित नहीं होते,पकड़े वक्त लज्जित होते हो।
#ओशो
92
श्वेत वस्त्र में नेता फिरते
करते हैं काली करतूतें
तंग पजामा लंबा कुरता
पहन असुर सड़कों पर घुमते
दनुज कर रहे दानव लीला
कौन करेगा राघव लीला
रामत्वं शरणं गच्छामि
गोविंदं शरणं गच्छामि
@SiddharthAulia
संघ का अर्थ होता है--केंद्र पर जाग्रतपुरुष हो, कोई जिसने स्वयं को जीता और जो स्वयं में जागा, भगवत्ता हो केंद्र पर, तो उसके आसपास जो बुझे हुए लोग इकट्ठे हो जाते हैं। माना कि सोए हैं, लेकिन उनके जीवन में भी जागने का कम से कम सपना तो पैदा हो गया। जागने की तरफ बढ़ने तो लगे हैं।
#ओशो
तुम प्रेम के लिए नौकर-चाकर नहीं रखते, लेकिन प्रार्थना के लिए रखते हो। प्रार्थना
प्रेम की अंतिम घटना है। प्रार्थना तो प्रेम है, वह तो प्रेम की परमदशा है। तुम करोगे तो ही पहुंचेगी। बिचवइयों और दलालों का
काम नहीं है। दलाल की उत्सुकता तो तुमसे जो पैसा मिल रहा है उसमें है।
#ओशो
89
यदि नाद नहीं होता जग में
प्रभु की सुधि कैसे हम पाते
तीरथ तीरथ पर्वत पर्वत
हम कहाँ कहाँ ठोकर खाते
उसकी वाणी अमृत वाणी
वरना जग में आनी जानी
अथ अनहद शरणं गच्छामि
गोविंदं शरणं गच्छामि
@SiddharthAulia
मांग कभी भी प्रार्थना नहीं बन सकती।वासना कभी भी प्रार्थना नहीं बन सकती।चाह कभीभी उपासना नहीं बन सकती।प्रार्थना का तो सूत्र ही यही है तुम वहां धन्यवाद देने जातेहो,मांगने नहीं।उसने पहले ही बहुत दे रखा है।जितनी जरूरत हैउससे ज्यादा दे रखा हैजितनी योग्यता हैउससे ज्यादा दे रखा है।
#ओशो
प्रेम पाठ है परमात्मा का।
अगर तुम प्रेम में कुशल हो गए
तो परमात्मा दूर नहीं।
तो परमात्मा दूर नहीं।
जितनी तुम्हारी
कुशलता प्रेम में है उतना
परमात्मा करीब आता है।
#ओशो