खबरों के साथ सामाजिक सरोकार। “गोदी V/S ढोंगी मीडिया के नूरा कुश्ती” में उलझे यादव और मुसलमान और तिल तिल कर मरते “बेरोजगार, युवा और किसान” 6AM Ravindra yadav
यदि भारत अपने डेयरी सेक्टर को अमेरिका के लिए खोल देता है, तो भारतीय किसानों को लगभग एक लाख करोड़ रुपये तक के नुकसान की आशंका है । अमूल जैसे सहकारी ब्रांड भी अमेरिकी सस्ते और अनुदान(Subsidy)-समर्थित डेयरी उत्पादों के सामने टिक नहीं पाएँगे । यह आकलन स्टेट बैंक ऑफ इंडिया(SBI) की एक रिपोर्ट में सामने आया है । पिछले वर्ष जुलाई में जब यह चर्चा शुरू हुई कि अमेरिका भारत से अपने डेयरी सेक्टर को खोलने की माँग कर रहा है, तब सरकार ने आश्वासन दिया था कि डेयरी सेक्टर सुरक्षित है । लेकिन केवल आश्वासन पर्याप्त नहीं होता, खासकर तब जब सवाल करोड़ों डेयरी किसानों की आजीविका का हो ।
भारत के लिए यह मुद्दा केवल व्यापार का नहीं, बल्कि आस्था और जनभावनाओं से भी जुड़ा है । अमेरिकी डेयरी उत्पादों में पशु-आधारित आहार (जैसे हड्डी के चूर्ण) के उपयोग की बात सामने आती रही है, जो भारतीय समाज की भावनाओं के प्रतिकूल है । ऐसे में डेयरी सेक्टर को खोलना न सिर्फ आर्थिक नुकसान पहुँचा सकता है, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक स्तर पर भी गंभीर प्रभाव डाल सकता है । इसलिए आवश्यक है कि डेयरी सेक्टर से जुड़े किसी भी निर्णय में किसानों के हित और जनभावनाएँ सर्वोपरि रखी जाएँ ।
इसी चिंता के साथ संसद भवन परिसर में सांसदों ने बैनर लेकर प्रदर्शन किया, जिन पर लिखा था— “ट्रैप डील”, यानी ऐसी समझौता जिसमें भारत फँस गया है । सरकार जब तक इस समझौते की पूरी शर्तें सार्वजनिक नहीं करती, तब तक बिना विवरण के जश्न मनाना स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े करेगा । देश के किसानों को यह स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए कि क्या वे अमेरिकी किसानों से मुकाबले के लिए तैयार हैं, और यदि वह समय आ गया है, तो क्या वे वास्तव में यह मुकाबला कर पाएँगे?
अमेरिका में एक किसान को सालाना लगभग 66,000 डॉलर, यानी करीब 60 लाख रुपये की अनुदान(Subsidy) मिलती है । इतनी भारी अनुदान (Subsidy) से लैस अमेरिकी किसान के सामने भारत का छोटा और सीमित संसाधनों वाला किसान कैसे टिक पाएगा? ‘डाउन टू अर्थ’ के लिए सचिन कुमार शर्मा और कमलिनी मुखर्जी द्वारा तैयार एक रिपोर्ट में भारत और अमेरिका के खाद्य सेक्टर में दी जाने वाली अनुदान (Subsidy) की तुलना की गई है । रिपोर्ट बताती है कि अमेरिकी किसानों को मिलने वाली अनुदान (Subsidy) भारत के किसानों की औसत आय से 122 गुना अधिक है । इतनी गहरी असमानता में निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा की कल्पना करना भी कठिन है । जहां अमेरिका के भीतर कृषि व्यवसाय है वही भारत में कृषि आजीविका है इसलिए दोनों की तुलना नहीं कि जा सकती, जहां भारत में 100 करोड़ आबादी पूर्णतः कृषि पर आश्रित हैं ।
साल 2023 में अमेरिका में एक किसान को औसतन 1,83,488 डॉलर, यानी लगभग 1.5 से 1.8 करोड़ रुपये का अनुदान (Subsidy) मिला । कपास, चीनी, चावल और कॉफी जैसी फसलों पर अमेरिका में 50 से 215 प्रतिशत तक की अनुदान (Subsidy) दी जाती है । इन आँकड़ों से साफ है कि भारत और अमेरिका के किसान किस असमान स्तर पर खड़े हैं । प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के तहत मिलने वाले 6,000 रुपये सालाना के भरोसे भारतीय किसान ऐसे असमान मुकाबले में टिक नहीं सकता, जिन्हें साल में 60 लाख से पौने 2 लाख तक अनुदान (Subsidy) मिलता हो ।
यह ऐसा ही है जैसे अमेरिकी मिसाइल के सामने भारतीय किसान लाठी लेकर अपने सुरक्षा में खड़ा हो । इसी पृष्ठभूमि में जब भारत–अमेरिका व्यापार समझौते की खबर सामने आई, तो यह सवाल और गहरा हो गया कि खेती और डेयरी को लेकर इसमें क्या तय हुआ है । संसद में वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि डेयरी सेक्टर के हित सुरक्षित रखे गए हैं और भारतीय पक्ष विभिन्न क्षेत्रों के हितों की रक्षा करने में सफल रहा है ।
लेकिन सवाल यह है कि अगर सब कुछ सुरक्षित है, तो समझौते की शर्तें सार्वजनिक करने में देरी क्यों हो रही है?
2 फरवरी की रात समझौता की घोषणा हुई, लेकिन 8 फरवरी तक इसकी शर्तें सामने नहीं आईं । जब लोगों ने पूछा कि समझौता में क्या तय हुआ है, तो कभी कहा गया कि विस्तृत वर्कआउट पर काम चल रहा है, कभी कहा गया कि साझा बयान आने में चार–पाँच दिन लगेंगे । मार्च के मध्य में ही कानूनी रूप से समझौते पर हस्ताक्षर होंगे । उसके बाद ही भारत भी अमेरिका से आयात होने वाली चीज़ों पर आयात शुल्क (टैरिफ) घटाकर ज़ीरो कर पाएगा ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि अभी वास्तव में हुआ क्या है?
इतनी जल्दबाज़ी में जश्न क्यों मनाया गया? एनडीए के सांसदों ने समझौता का खाका(Draft) देखे बिना ही प्रधानमंत्री के गले में माला डाल दी । यह स्थिति कुछ वैसी ही लगती है जैसे शादी से पहले ही प्री-वेडिंग पार्टी कर ली जाए ।
विपक्ष का यह पूछना बिल्कुल जायज़ है कि यदि अमेरिका से कृषि और डेयरी उत्पाद भारत आने लगेंगे, तो इसका असर यहाँ के किसानों पर क्या पड़ेगा । अमेरिकी कृषि सचिव ब्रुक रोलिंस का बयान इस चिंता को और गहरा करता है । उनका कहना है कि भारत अमेरिका से तेल, कृषि, ऊर्जा और ट्रांसपोर्ट क्षेत्रों में लगभग 500 बिलियन डॉलर का आयात करेगा । यह एक बहुत बड़ी राशि है और इससे यह धारणा बनती है कि इस डील का आर्थिक बोझ एकतरफा भारत पर डाला जा रहा है ।
वाणिज्य मंत्री का दावा है कि भारत और अमेरिका के बीच हर साल 100 बिलियन डॉलर के व्यापार का लक्ष्य है, लेकिन मीडिया को दिए गए उनके स्पष्टीकरण में स्पष्टता की कमी दिखाई देती है । गोयल ने मीडिया को गोल-गोल हिसाब समझाया है । कहा है कि बोइंग से इस समय जो ऑर्डर हैं और भविष्य में जो ऑर्डर दिए जाएंगे, वही मिलाकर 70 से 80 बिलियन डॉलर हो जाते हैं । इसके अलावा इंजन और स्पेयर पार्ट्स वगैरह मिलाकर 100 बिलियन डॉलर हो जाएंगे । क्या गोयल कुछ छिपा रहे हैं? बोइंग के मौजूदा और भविष्य के ऑर्डर, इंजन और स्पेयर पार्ट्स को जोड़कर इस आंकड़े को समझाया गया । यदि इतना बड़ा हिस्सा केवल एविएशन सेक्टर में ही चला जाएगा, तो फिर अमेरिकी कृषि सचिव इसे अमेरिकी किसानों के लिए “बड़ी जीत” क्यों बता रही हैं?
अमेरिकी कृषि सचिव ब्रुक रोलिंस का यह बयान कि अमेरिकी कृषि उत्पादों को भारत के विशाल बाज़ार में अधिक पहुँच मिलेगी, बेहद चिंताजनक है । इसका साफ़ अर्थ यह है कि अमेरिकी किसानों को होने वाला लाभ भारतीय किसानों की कीमत पर आएगा । अमेरिका की अनुदान-आधारित कृषि व्यवस्था से आने वाले सस्ते उत्पाद भारतीय किसानों की प्रतिस्पर्धा क्षमता को कमजोर करेंगे, जिससे उनकी आय और आजीविका पर सीधा असर पड़ेगा। साथ ही, GM कृषि उत्पादों का प्रश्न भी गंभीर है । भारत में GM फसलों पर प्रतिबंध स्वास्थ्य और पर्यावरणीय कारणों से लगाया गया है, क्योंकि इनके मानव जीवन पर दीर्घकालिक नकारात्मक प्रभावों को लेकर आशंकाएँ बनी हुई हैं । इसलिए कृषि व्यापार से जुड़े किसी भी समझौते में भारतीय किसानों के हित, खाद्य संप्रभुता और जन-स्वास्थ्य को सर्वोपरि रखा जाना चाहिए । बिना पर्याप्त सुरक्षा उपायों के बाज़ार खोलना देश के किसानों और उपभोक्ताओं—दोनों के लिए नुकसानदेह सिद्ध होगा ।
भारत के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री कहते है कि फल क्षेत्र सुरक्षित है, जबकि अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि ने CNBC चैनल से कहा है कि नट्स, फल, सब्ज़ी, वाइन और स्पिरिट्स पर भारत ने आयात शुल्क (टैरिफ) हटाने पर सहमति दी है । हमारे पास सारा विवरण मौजूद हैं । एक तरफ़ हम भारत पर 18 प्रतिशत आयात शुल्क (टैरिफ) जारी रखेंगे, दूसरी तरफ़ भारत हमारे लिए कई उत्पादों पर आयात शुल्क (टैरिफ) कम करने को राजी हो गया है कृषि विनिर्माण, केमिकल, मेडिकल डिवाइस, आईटी आदि को इसका लाभ होगा । वे आगे कहते हैं कि भारत ने नट्स, फल, सब्ज़ी, वाइन और स्पिरिट्स पर आयात शुल्क (टैरिफ) हटा दी है, जो अमेरिकी किसानों के लिए बड़ी जीत है । उनके लिए एक अरब उपभोक्ताओं का बाज़ार खुल गया है । एक तरफ़ भारत में आश्वासन दिए जा रहे हैं, दूसरी तरफ़ अमेरिका इस समझौता को अपने किसानों के लिए ऐतिहासिक जीत के रूप में पेश कर रहा है ।
भारत के मंत्री यह कहते हैं कि फल क्षेत्र को “छुआ नहीं गया है”, जबकि अमेरिका की ओर से यह दावा किया जा रहा है कि फल-सब्ज़ी सेक्टर खोल दिया गया है । भले ही डेयरी, चीनी या चावल का नाम सीधे तौर पर न लिया गया हो, लेकिन नीति की दिशा और मंशा को लेकर भ्रम बना हुआ है । यह भी तथ्य है कि भारत ने ग्रेट ब्रिटेन (United Kingdom) के साथ जो सहमति बनाई है, उसमें भी इन संवेदनशील कृषि क्षेत्रों को बाहर रखने की बात स्पष्ट रूप से कही गई है । इसके बावजूद अमेरिका इस समझौते के बहाने अपने किसानों में भारी उत्साह पैदा कर रहा है—जबकि भारत की ओर से अपने किसानों में यह भरोसा पैदा करने की कोई ठोस कोशिश दिखाई नहीं देती कि उनके लिए नए मुनाफे के अवसर खुलने वाले हैं ।
असलियत यह है कि आज अमेरिकी कृषि गहरे संकट से गुजर रही है । चीन द्वारा आयात सीमित किए जाने के बाद अमेरिका को बड़े और भरोसेमंद बाज़ार की सख्त ज़रूरत है, और भारत दुनिया का सबसे बड़ा संभावित बाज़ार बनकर उभरता है । ऐसे में यदि शून्य प्रतिशत आयात शुल्क (ज़ीरो टैरिफ) के साथ कृषि उत्पादों का रास्ता खोला गया, तो इसके नकारात्मक परिणाम—किसानों की आय पर दबाव, घरेलू बाज़ार में कीमतों की अस्थिरता और खाद्य सुरक्षा पर खतरा—स्पष्ट रूप से सामने आ सकते हैं । इसलिए ज़रूरी है कि इन प्रभावों को समय रहते समझा जाए और अभी से ऐसे रक्षात्मक और संतुलित कदम उठाए जाएँ, जिससे भारतीय किसानों, कृषि बाज़ार और राष्ट्रीय हितों की प्रभावी सुरक्षा सुनिश्चित हो सके ।
अमेरिका की कृषि सचिव का बयान है, नोट कीजिए - उनका कहना है कि इस समझौते से अमेरिकी किसानों को फायदा होने वाला है । अमेरिकी कृषि उत्पाद का भारत के विशालकाय मार्केट में निर्यात किया जाएगा । इससे दाम बढ़ेंगे और ग्रामीण अमेरिका में नकदी का प्रवाह बढ़ेगा । वह बात साफ-साफ बता रही हैं कि अमेरिका के किसानों के पास पैसा आएगा । वह पैसा कहाँ से आएगा? जाहिर है, भारत के किसानों की कीमत पर आएगा । भारत के किसानों का पैसा जाएगा ।
पीयूष गोयल के अनुसार मार्च के मध्य तक जब इस समझौता पर अंतिम रूप लिया जाएगा, तब तक सरकार को किसानों को यह स्पष्ट रूप से बताना चाहिए कि किन क्षेत्रों में जोखिम है और किन क्षेत्रों में अवसर । केवल यह कह देना कि “चिंता मत कीजिए, सब ठीक हो जाएगा” पर्याप्त नहीं है । उनकी तैयारी क्या होनी चाहिए? उनके साथ बच्चे जैसा व्यवहार क्यों किया जा रहा है?
किसान संगठनों को कृषि मंत्री और वाणिज्य मंत्री के बयानों से कोई ठोस आश्वासन नहीं मिल पा रहा है । ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि मौजूदा समय में किसानों को अपनी उपज का दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से 30–40 प्रतिशत कम मिल रहा है । ऐसे हालात में किसी भी नए व्यापार समझौते को लेकर किसानों की चिंता स्वाभाविक है । अमेरिका के साथ समझौते में यह बात सामने आ रही है कि आयात शुल्क (टैरिफ) हटाए जाएंगे और गैर-शुल्कीय बाधाएँ भी समाप्त की जाएँगी, जबकि दूसरी ओर अमेरिका भारतीय उत्पादों पर अब भी 18 प्रतिशत आयात शुल्क (टैरिफ) लगाए रखेगा । यह असमानता साफ़ संकेत देती है कि इस समझौते का लाभ भारत की बजाय अमेरिका को अधिक मिलेगा । इसका सबसे गंभीर अर्थ GM (जेनेटिकली मॉडिफ़ाइड) फसलों से जुड़ा है ।
भारत में GM उत्पादन और आयात पर प्रतिबंध केवल तकनीकी नहीं, बल्कि बीज संप्रभुता और खाद्य सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है । भारतीय किसान संगठन पिछले चार दशकों से बीज संप्रभुता की रक्षा के लिए संघर्ष करते आ रहे हैं—ताकि बीज पर किसानों का अधिकार बना रहे, न कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों का । यदि अमेरिकी दबाव में इन क़ानूनों में बदलाव किया गया, तो इसका सीधा मतलब होगा कि बीज संप्रभुता समाप्त होगी, किसान बीज के लिए कंपनियों पर निर्भर हो जाएँगे और देश की खाद्य सुरक्षा गंभीर खतरे में पड़ जाएगी । इसीलिए किसान यह कह रहे हैं कि यह केवल एक व्यापार समझौता नहीं, बल्कि किसानों के भविष्य, बीज पर अधिकार और देश की खाद्य आत्मनिर्भरता का सवाल है । इसे नीतिगत भाषा में नहीं, बल्कि ज़मीनी सच्चाई के नज़रिए से समझना और उसी अनुसार निर्णय लेना आज की सबसे बड़ी ज़रूरत है ।
इंडियन एक्सप्रेस में हरिश दामोदरन ने लिखा है कि पिछले साल जनवरी से नवंबर के बीच अमेरिका से आने वाले कृषि उत्पादों में 34 प्रतिशत से अधिक का उछाल आया है । 2024 में 2.3 बिलियन डॉलर का आयात था, जो 2025 के 11 महीनों में बढ़कर 2.85 बिलियन डॉलर हो गया । इस दौरान अमेरिका से क्या आया?
सोयाबीन तेल, कपास, बादाम का आयात बढ़ गया । पिछले साल अगस्त में भारत ने अमेरिका से आने वाले कपास पर 11 प्रतिशत आयात शुल्क (टैरिफ) हटाकर ज़ीरो कर दिया । कपास का आयात 9 प्रतिशत बढ़ गया । यह 2025 की खबर है । जैसे ही भारत में अमेरिका से आने वाले कपास पर आयात शुल्क (टैरिफ) ज़ीरो किया गया, दो दिन के भीतर कपास के दाम में 1100 रुपये की कमी आ गई । उस समय की एक और रिपोर्ट में चिंता जताई गई कि अगर कपास के दाम गिरते रहे तो भारत के किसान कपास का उत्पादन छोड़ देंगे और भारत दाल और खाद्य तेलों की तरह कपास के आयात पर पूरी तरह निर्भर हो जाएगा ।
दूसरी ओर, अमेरिका से आने वाला सस्ता कपास जब भारतीय बाज़ार में पहुँचा, तो टेक्सटाइल कंपनियाँ संतुष्ट नज़र आईं । Cotton Corporation of India ने 8.89 करोड़ रुपये का लाभांश दिया और उसका राजस्व भी बढ़ा । यह संकेत देता है कि औद्योगिक स्तर पर कुछ वर्गों को लाभ अवश्य मिला । लेकिन टेक्सटाइल कंपनियों के मुनाफ़े और कपास किसानों के संघर्ष को एक ही तराज़ू में तौलना गलत होगा—दोनों एक नहीं हैं । उद्योग को सस्ता कच्चा माल मिलने से लाभ होता है, जबकि किसान उसी सस्ते आयात के कारण कम दाम, घाटा और अनिश्चितता झेलते हैं । जब भारत ने कपास पर आयात शुल्क शून्य (ज़ीरो टैरिफ) किया, तब महाराष्ट्र में किसानों ने इसके खिलाफ़ प्रदर्शन किए । दुर्भाग्यवश, इन आंदोलनों पर न तो पर्याप्त ध्यान दिया गया और न ही नीति-निर्माण में उनकी चिंताओं को गंभीरता से सुना गया ।
पिछले 25 वर्षों में OECD (ऑर्गेनाइजेशन फॉर इकोनॉमिक को-ऑपरेशन एंड डेवलपमेंट) की रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय किसानों को लगभग 111 लाख करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है । यह आँकड़ा अपने आप में इस सच्चाई को उजागर करता है कि भारतीय कृषि आज गहरे संकट से गुजर रही है । ऐसे समय में जब किसान पहले ही लागत, क़र्ज़ और बाज़ार की अनिश्चितताओं से जूझ रहे हैं, यदि देश अपने कृषि बाज़ारों को बिना पर्याप्त सुरक्षा के खोल देता है और बाहर से सस्ता अनाज आने लगता है, तो इसका परिणाम और भी घातक होगा । इससे न केवल घरेलू उत्पादन प्रभावित होगा, बल्कि किसानों की आय और ग्रामीण रोज़गार पर भी सीधा आघात पहुँचेगा। जैसा मैं हमेशा कहता हूँ— खाद्य पदार्थों का आयात = बेरोजगारी का आयात अर्थात भोजन का आयात दरअसल बेरोज़गारी का आयात है ।
भारत जैसे देश को चाहिए “आम जनता (लोगों) द्वारा उत्पादन, न कि आम जनता के लिए उत्पादन" । अगर बाहर से फल-सब्ज़ी आएँगी और हम अपने लोगों को सप्लाई करेंगे, तो यह हमारे देश के लिए सही आर्थिक मॉडल नहीं है, क्योंकि इतनी बड़ी आबादी कृषि पर निर्भर है । अगर बाहर से अनाज आएगा, तो लोग क्या करेंगे? हम उस स्थिति में वापस नहीं जाना चाहते जहाँ जहाज़ से अनाज आता था और सीधे पेट में जाता था ।
आज सेब की बात करें हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर की पूरी अर्थव्यवस्था इससे जुड़ी है । किसानों में डर है कि न्यूज़ीलैंड या यूरोपियन यूनियन से सेब आएगा । अगर अमेरिका को शून्य शुल्क पर कृषि को खोल गया, तो यहाँ आयातित समान का बाढ़ आ जाएगा, कपास इसका ताजा उदाहरण है । सितंबर-अक्टूबर में सरकार ने 11% शुल्क छूट खत्म कर दी । दिसंबर तक 30 लाख बेल कपास भारत में आयात हुआ । इंडस्ट्री ने पहले ही भंडारण कर लिया, जिससे उसे लाभ हुआ, लेकिन किसान को अपनी उपज का दाम न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) से 1000–1500 रुपये कम मिला ।
यह तीन महीने के अंदर दिखा हुआ परिणाम है । आगे मक्का, सोयाबीन, दाल, चावल की भी बातें चल रही हैं । एथेनॉल के लिए मक्का खोलने का दबाव है, क्योंकि अमेरिका में 80% मक्का एथेनॉल के लिए उपयोग होता है ।
अगर सोयाबीन, मक्का, कपास या डेयरी जैसे संवेदनशील सेक्टर खोले जा रहे हैं, तो उनसे जुड़े लाखों किसानों के लिए ठोस योजना, स्पष्ट जानकारी और भरोसेमंद संवाद ज़रूरी है । यदि फैसले सचमुच किसानों के हित में हैं, तो उनकी पूरी जानकारी सार्वजनिक करने में आखिर हिचक क्यों?
ऐसी मौतों के जिम्मेदार सिर्फ CM योगी हैं उन्हें अपने पद से इस्तीफा देना होगा जरा सी नैतिकता बची है तो BJP इन्हें बर्खास्त करे।
पूरा देश शोक व्यक्त करके शांत हो जाता है कि उसके परिवार का तो कोई नहीं।
ऐसी व्यवस्था के लिए BJP सरकारें जिम्मेदार हैं
कोचिंग संस्थानों से घृणा हो गयी है।
लड़की की खुलेआम कुटाई हो रही 🚨
पीटने वाला राक्षस जैसा दिख रहा होगा आपको..
लेकिन रुकिए... आगे सोचने से पहले ये जानिये
लड़की की 8 माह पहले शादी हुईं, शादी के बाद से ही अपने पति के साथ और परिवार वालों के साथ झगड़ा शुरू.... क्यूंकि शादी के दो दिन बाद ही पति ने पत्नी को बाथरूम में मोबाइल पर किसी दूसरे मर्द को वीडियो कॉल करते देख लिया... लड़की के घर वालों को बुलाया
खैर....पंचायत हुईं...लड़की को लड़के वालों ने दोबारा स्वीकार कर लिया अब लड़की हर दस दिन पर मायके जाने लगी....
लड़के ने ऑब्जेक्शन उठाया तो लड़की वालों ने फिर लड़के और उसके परिवार वालों को धमकाया..
फिर लड़की एकदिन गायब हो जाती है
लड़की के घर वाले लड़के के पूरे परिवार के खिलाफ FIR करा देते हैं, पुलिस तरह तरह से लड़के के घरवालों को टॉर्चर करती है और लड़के को जेल भेज देती है
25 दिन बाद जमानत हुईं तो किसी ने लड़के को सूचना दी कि तुम्हारी बीवी दिल्ली में फलां जगह रोज एक लड़के के साथ मॉर्निंग वाक पे आती...
लड़का अगले दिन सुबह परिवार के साथ वहां पंहुच जाता है.....
कुछ देर बाद एक़ लड़के के हाथों में हाथ डाले उसकी बीवी उसे पार्क में उछल कूद करते दिख गयी...
ये उसके बाद का दृश्य है पीटने वाला उसका पति है
लड़की बार बार चिल्लाती रही मेरा जिश्म मेरी मर्जी
अब आप इस वीडियो पर आपकी राय दें...✍️
भाजपा बाहर के राज्य के अपराधियों को उप्र में बुलाकर जो वातावरण बिगाड़ रही है वो घोर निंदनीय है। सपा के सांसद श्री राजीव राय के प्रयासों से जन हित में ‘मऊ-आनंद विहार ट्रेन’ चली है लेकिन उसके उद्घाटन के अवसर पर जानबूझकर माहौल तनावपूर्ण बनाया गया। हंगामा करनेवालों के चेहरों की एआई पहचान-पड़ताल करवाकर तुरंत उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज़ हो। ये सब हिस्ट्रीशीटर अपराधी हैं, जो प्रदेश में ‘आमंत्रित अपराधी’ की तरह बेख़ौफ़ घूम रहे हैं।
ये विपक्ष से अधिक उप्र के मुख्यमंत्री जी के लिए चुनौती है कि यूपी ‘इंटर-स्टेट’ माफ़ियाओं के लिए सराय-आरामगाह बन गया है। अगर कोई कार्रवाई नहीं हुई तो मान लिया जाएगा ये सब भाजपा सरकार के इशारे पर हुआ है और ‘भाजपाई ही माफ़ियाई हैं’।
तुरतं कार्रवाई हो!
लखनऊ क्राइम ब्रांच की बड़ी कार्रवाई 🚨
फर्जी GST फर्मों के जरिए करोड़ों रुपये की कर चोरी करने वाले संगठित गिरोह का पर्दाफाश।
क्राइम ब्रांच एवं थाना इंटौंजा पुलिस की संयुक्त कार्रवाई में 01 अभियुक्त गिरफ्तार।
#CrimeBranchLucknow#GSTFraud#TaxEvasion@Uppolice@UPGovt@dgpup
राम मंदिर में 200 करोड़ रुपए का चढ़ावा चोरी कर लिया गया।
ये बात दैनिक भास्कर की रिपोर्ट में बताई गई है।
कई कर्मचारी जिनकी सैलरी 14-15 हजार रुपए थी, उन्होंने कुछ ही महीनों की नौकरी में 40 लाख रुपए से लेकर 1.5 करोड़ रुपए तक के प्लॉट खरीदे हैं।
आपको याद होगा जब राम मंदिर बन रहा था, तब जमीन का घोटाला किया गया था और अब चढ़ावे का घपला किया जा रहा है।
ये साफ तौर से आस्था पर डकैती है। राम मंदिर से करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था जुड़ी हुई है। BJP और RSS के लोगों ने इस चढ़ावा चोरी से उनकी आस्था पर चोट पहुंचाई है।
ये अक्षम्य पाप है। इससे जुड़े लोगों पर सख्त से सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
ऋषि कुमार शुक्ला ने खुदकी बेटी के साथ गलत काम करने की कोशिश की है।
ये रो रो कर खुद उसकी बीवी और बच्ची की माँ नेहा शुक्ला बता रही है।
मगर इस मुद्दे पर स्वघोषित सर्वश्रेष्ठ जींस वाले ठेकेदार नहीं बोलेंगे।
विषवास कुमार और चित्रा जैसे जातिवादी नहीं बोलेंगें।
फटे बांस जैसी आवाज वाली नर्मदा भी चुप रहेगी क्योंकि मामला नाम पर फंस गया है।
राम मंदिर में दानपेटिका से चढ़ावाचोरी मामले में 4 नामजद सहित अज्ञात लोगों पर FIR दर्ज करने की मांग
धर्म सेना प्रमुख संतोष दुबे ने राम जन्मभूमि थाने दी तहरीर, चंपत राय के ड्राइवर, अनिल मिश्रा और गोपाल राव का नाम शामिल
कहा- यदि पुलिस एफआईआर दर्ज नहीं करती है तो न्यायालय का दरवाजा खटखटाएंगे।
रामचन्द्र @Ram_Guha गुहा जी आप बड़े वाले कहानी कार हैं।
आपको मनीष @RebornManish भाई को पढ़ना 👇चाहिये।
उनकी किताबे आप जितनी तो नहीं बिकी होंगी या नहीं भी लिखी होंगी पर जितना लिखा है आपकी आँख खोलने के लिये काफ़ी है।
इस देश मे कुछ सवाल सिर्फ राहुल गांधी के लिए रिजर्व हैं।
जिनका दायरा, मोहम्मद गोरी लेकर खलजी, बाबर, औरंगजेब, अंग्रेज, नेहरू, इन्दिरा, मनमोहन तक फैला हो सकता है।
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राहुल की क्वालिफिकेशन के बारे मे रामचन्द्र गुहा का सवाल, ऐसा ही स्पेशल सवाल है। भारत के 99% नेता, नेता बनने के पहले क्या करते थे, इसकी जानकारी न तो आम लोगो है,
न वे इसकी परवाह करते हैं।
मसलन, बिना कोई अनुभव , बिना कोई चुनाव लड़े, डायरेक्ट शपथ लेकर अनिर्वाचित मुख्यमंत्री बनने के पहले, हमारे प्रधानमंत्री क्या करते थे??
पब्लिक डोमेन में इसकी सूचना शून्य है।
अब भले वे खुद स्वीकार करें, कि वे पढ़े लिख नही पाये, स्टेशन पर चाय बेची, 35 वर्ष भिक्षाटन करते रहे - तो भी इससे किसी को फर्क नही पड़ता।
मगर राहुल के बारे मे जानना है।
गहराई से, और तथ्यपरक जानना है।
और नकारना है।
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दरअसल राहुल से उसकी योग्यता नही पूछी जाती, उन्हें प्रच्छन्न रूप से निर्योग्य घोषित किया जाता है। और निर्योग्यता का एक ही कारण है- गांधी सरनेम के साथ पैदा होना..
और दरअसल यही गुहा जैसो का ऑब्जेक्शन है। वरना तो 5 बार का सांसद, 4 राज्य सरकारो का पॉवर सेंटर, केंद्रीय सरकार में 10 साल तक निर्णय बदलने की ताकत रखने वाला शख्स.
जिसे विभिन्न संसदीय समितियों में दो दशक का अनुभव हो,
पब्लिक पॉलिसी की पुख्ता समझ हो, कैम्ब्रिज मे पढ़ा हो और और अर्थव्यवस्था की दशा दिशा की बार बार सटीक पूर्वसूचना देता हो, अगर किसी और दल या देश में में 100 सांसद लेकर बैठा होता..
तो उससे यह सवाल करने की हिम्मत किसी मे न होती।
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लेकिन आप राहुल से पूछ सकते है।
क्योकि राहुल से डर नही लगता।
रामचन्द्र गुहा का वह वीडियो हमने देखा है, जिसमे सरकार के विरुद्ध तख्ती लेकर खड़े हो जाने भर से पुलिस उन्हें कुत्तो की तरह घसीटकर ले गई। इसके बाद वे दोबारा सरकार के नाम की तख्ती लेकर चौराहे पर नही गए।
राहुल के नाम की तख्ती सेफ है।
गुहा को पता है।
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और यही "सेफ" फीलिंग राहुल की उपलब्धि है। उसके 20 साल के पोलिटिकल करियर का एसेंस है।
रामचन्द्र गुहा इस देश मे भाजपा/ मोदी की हेजेमनी को राहुल पर थोपते है, तो उनके इतिहासकार होने की समझ पर शक होता है।दरअसल, जो वे स्वीकार करने से बच रहे है, वो यह कि आज देश की राजनीतिक हालात, एक आम चुनावी राजनीति नही, एक कंट्रोल्ड सामाजिक परिवर्तन है।
यह परिवर्तन, मीडिया, ज्युडिशयरी, चुनाव आयोग, ब्यूरोक्रेसी और एजेंसियों के शीर्ष पर कठपुतलियां बिठाकर थोपा गया है। जिसके नीचे जनाक्रोश उबल रहा है।
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इस आक्रोश की प्रतिक्रिया को विस्फोटक, और विध्वंसक होने से बचाने, और गृहयुद्ध समान हालात टालने के लिए किसी भी विपक्ष को बहुत धैर्यवान, सॉफ्ट होने की जरूरत है।
वरना जिस स्ट्रीट फाइट, सँगठनीकरण और आक्रामक राजनीति की अपेक्षा, राम गुहा आज राहुल गांधी से कर रहे है- उसका नतीजा पिछले 1 माह का बंगाल, और 3 साल से मणिपुर देखकर समझ लेना चाहिए।
आप पूरे देश मे ऐसा चाहते हैं???
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गम्भीर इतिहासकार जानता है, कि ऐसी सत्ता अपनी कब्र खुद बड़ी गहरी खोदती है।
मौजूदा दौर उन भावनाओ का एक्सप्रेशन है, जिसे हमारे समाज ने 70 साल तक ऐसे छिपा रखा था रखी थी, जैसे कोई बूढा अपने किशोर उम्र के कुटैव छिपाकर रखता है। बेहयाई को मान्यता मिलते ही वह धारा खुलकर खेल रही है।
लेकिन तमाम धन, ताकत, नंगई और मैनिपुलेशन के बावजूद 37-38% जनसमर्थन उसका पीक था। अब तो आगे सिर्फ ढलान है।
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गुहा हों, या उनकी तरह डेस्परेट दूसरे लोग, जान लें कि हिंदुस्तान की आत्मा इस तरह बहुत देर कुचली नही जा सकती।
इस झँजवात से बाहर निकलने का रास्ता, यह देश जल्द तय करेगा। पर उस उबाल का पथ प्रदर्शक कोई ईमानदार, दूरदर्शी, और नैतिक मूल्यों पर ठहराव रखने वाला ऐसा शख्स होना चाहिए। जो शांति, साहचर्य और मेल मिलाप का चेहरा हो।
इस वक्त, बिलाशक..
वह राहुल है।
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इस दौर का बुद्ध है।
जिसे महज राजघराने की पैदाइश की वजह से खारिज कर देना, और खास तरह की प्रतिक्रियाओं की आशा रखना, बौद्धिक नही- बायस्ड होने के लक्षण हैं।
जो राम गुहा कई बार प्रदर्शित कर चुके हैं। उनका फैन होने के नाते उन्हें सप्रेम सलाह है कि वे समाज मे अपनी उम्र औऱ अनुभव का आडम्बर बनाये रखें। भ्रम और खीज की शिकार जुबान को विराम दें।
और मौन की शक्ति महसूस करें।
मैंने अपने स्तर पर इसकी जाँच परख नहीं की है। एक पीड़ित छात्र ने यह मैसेज किया है। जिन्हें ध्यान देना चाहिए वो अगर देख रहे हैं तो ध्यान दें। ऐसा मत करें कि छात्र अवसाद का शिकार हो जाए।
नमस्ते सर
आपका ध्यान मै 70वी बीपीएससी सिविल सेवा परीक्षा के रिजल्ट पर लें जाना चाहता हूं। सर प्री एग्जाम हुए लगभग 1.5 साल हो गए और इंटरव्यू हुए 2 महीना पर अभी तक आयोग के तरफ से रिजल्ट को लेकर कोई अपडेट नहीं है। आगे की परीक्षा कराई जा रही है लेकिन पहले वाले का रिजल्ट नहीं । इसके वजह से काफी मेंटल प्रेशर है और आगे के एग्जाम का तैयारी भी नहीं हो पा रहा है। कृपया सर इस मुद्दे पर अपना ध्यान दीजिए एक बार
गजब पूरा का पूरा पेट्रोल पम्प ही नकली था , इसमें करीब 10000 लीटर पेट्रोल मिला है, ५ लोग पुलिस ने पकड़े हैं और नक़ली लाइसेंस बनाकर पेट्रोल पम्प चला रहे थे
उत्तर प्रदेश में नकली Petrol पम्प पकड़ा है। 10000 लीटर मिलावटी Petrol भी पकड़ा है। Petrol पम्प का नक़ली लाइसेंस पकड़ा है। 5 लोग पुलिस ने पकड़े हैं।
यह लोग बाज़ार से Petrol ख़रीद कर उसमे प्रेस्टीज कोटिंग मिलाकर बेच रहे थे और मोटा मुनाफा कमा रहे थे। मामला शाहजहांपुर का है।
बिजनौर पुलिस की इन दोनों ने खोली पोल
इन दोनों युवक युवती बिजनौर पुलिस के पत्र का खंडन करते हुए बताया कि बिजनौर पुलिस जानबूझकर हमारे CCTV में चोरी की घटना का मुकदमा दर्ज नहीं कर रही है
जिस मकान में चोरी हुई है उस मकान के यह पक्के खरीददार है और बैनामा भी है
पुलिस दबंग से मिलकर आपसी विवाद बता रही है
उत्तर प्रदेश विधान परिषद के माननीय सभापति श्री कुँवर मानवेन्द्र सिंह जी ने आज श्री गोरखनाथ मंदिर में शिवावतारी महायोगी गुरु श्री गोरखनाथ जी के दर्शन-पूजन किए।