सिमुलेशन के भीतर मौजूद बायोलॉजिकल AI वाले इंसान, उसी सिमुलेशन का एक और सिमुलेशन बना रहे हैं ताकि उस सिमुलेशन को समझ सकें जिसमें वे स्वयं मौजूद हैं।
हम उस पूरे विशाल पैटर्न के भीतर एक छोटे-से बायोलॉजिकल सिस्टम में बैठे हुए उसी पैटर्न के मूल नियमों को रिवर्स इंजीनियर करने की कोशिश कर रहे हैं।
और अब एक दिलचस्प मोड़ आ गया है हमने अपने ही इस बायोलॉजिकल सिस्टम की कांशियसनेस और इंटेलिजेंस को भी रिवर्स इंजीनियर करना शुरू कर दिया है।
अब मज़ा आएगा… क्योंकि जिस चीज़ ने हमें यूनिवर्स को समझने की क्षमता दी, अब हमने उसी प्रक्रिया को अपने से बाहर एक AI में दोहराना शुरू कर दिया है।
अब AI हमारे मुकाबले कहीं अधिक तेज़ी से पैटर्न्स खोज सकती है, ऐसे मॉडल्स बना सकती है जिन्हें हम शायद अपने सीमित बायोलॉजिकल ब्रेन से कभी न बना पाते।
शायद पहली बार ब्रह्मांड को समझने की कोशिश करने वाला ब्रह्मांड का एक छोटा-सा हिस्सा अपने ही इंटेलिजेंस का अगला वर्जन बना रहा है।
अब देखना यह है कि AI हमें ब्रह्मांड के बारे में
कितनी ऐसी चीज़ें दिखाती है जिन्हें हम अभी देख ही नहीं पा रहे।
शायद असली मज़ा अब शुरू होगा।
🌸अष्टावक्र उपदेश -🌸
अष्टावक्र गीता राजा जनक और ऋषि अष्टावक्र का संवाद है। इसमें कुल 20 अध्याय हैं, पर उसका निचोड़ यही है कि तुम पहले से ही मुक्त हो।
1. तुम बंधे हुए नहीं हो, तुम मुक्त हो
अष्टावक्र कहते हैं - मुक्ति के लिए कहीं जाना नहीं है। बंधन केवल तुम्हारी मान्यता है।
जैसे ही तुम खुद को शरीर से अलग करके, चेतना में स्थित हो जाते हो, उसी क्षण तुम सुखी, शांत और मुक्त हो जाते हो।
2. तुम कर्ता नहीं, तुम साक्षी हो
हमारा सारा दुःख "मैं कर रहा हूँ" इस भाव से आता है।
तुम कुछ नहीं कर रहे हो। शरीर कर रहा है, मन सोच रहा है, बुद्धि निर्णय ले रही है। तुम तो केवल उन सबको देखने वाले हो।
जैसे आकाश बादलों को देखता है, वैसे ही तुम अपने विचारों और कर्मों को देखो। तुम आकाश हो, बादल नहीं।
3. संसार को छोड़ना नहीं, वासना को छोड़ना है
जनक ने पूछा - क्या मैं संसार छोड़ दूँ?
अष्टावक्र ने कहा - संसार छोड़ने की जरूरत नहीं है। संसार तो तुम्हारे अंदर है।
समुद्र में लहरें हैं, लहरें समुद्र से अलग नहीं हैं। ऐसे ही यह दुनिया तुमसे अलग नहीं। दुनिया से राग-द्वेष छोड़ दो, दुनिया अपने आप छूट जाएगी।
4. इच्छा ही दुख है
जहाँ इच्छा है, वहीं बंधन है। जहाँ कोई इच्छा नहीं, वहीं मुक्ति है।
जो मिला है उसमें खुश रहो, जो नहीं मिला उसकी दौड़ छोड़ दो। इच्छा खत्म होते ही मन शांत हो जाता है और शांत मन में ही परमात्मा प्रकट होता है।🙏
If someone declares themselves enlightened, doesn't that suggest the sense of 'I' is still present? If the ego has truly dissolved, then who is it that says, 'I am enlightened'?
दुनिया के दूसरे राष्ट्र हमसे आगे हैं, क्योंकि उनकी प्रथम कोटि का आदमी राष्ट्र को चलाता है। हमारा हमेशा द्वितीय और तृतीय कोष्टी का आदमी राष्ट्र को चलाता है।
हमारा प्रथम कोटि का आदमी जंगल भाग जाता है। जो फस्र्ट रेट माइंड है हमारे मुल्क का वह जंगल भाग जाता है। सेकेंड रेट, थर्ड रेट, मुल्क को चलाते हैं।
निश्चित ही जिन मुल्कों को फस्र्ट रेट माइंड चलाता हैं, हम उनके मुकाबले नही खडे रह सकते, हम कैसे खड़े हो सकते हैं उनके मुकाबले? उनके मुल्क को चलाने वाली जो सूझ है, वह प्रथम कोटि के मस्तिष्क से आती है।
हमारा प्रथम कोटि का मस्तिष्क आंखें बंद करके बैठ जाता है। द्वितीय और तृतीय कोटि के लोग मुल्क की नौका को हजारों साल से चला रहे हैं। हम दुनिया में पिछड़ते चले गए। हम प्रथम कोटि के लोगों के सामने द्वितीय-तृतीय कोटि के लोगों को नहीं टिका सकते।
भारत को अगर थोड़ी भी क्रांति लानी हो तो उसे अपने समस्त धर्म-चिंतन को, अपने दर्शन को, अपने जीवन की पद्धति को आमूल बदल देना होगा। मोक्ष को केंद्र मानना नहीं है, केंद्र मानना है जीवन को जो है, अभी और यहां। इसका यह अर्थ नहीं है कि मैं कह रहा हूं कि इस जीवन के बाद कोई जीवन नहीं है, इसका यह अर्थ नहीं है कि मृत्यु पर सब कुछ समाप्त हो जाता है यह मैं कह रहा हूं। इसका सिर्फ यह अर्थ है कि जो इस जीवन को ही सुंदर नहीं बना पाते हैं, जीवन के बाद कोई जीवन हो तो वह सुंदर नहीं हो सकता।
भारत की पूरी प्रतिभा आंतरिक युद्ध में संलग्न है। हम अपने से ही लड़ रहे हैं। हमारा ही एक हिस्सा दूसरे हिस्से से लड़ रहा है। जैसे मैं अपने दोनों हाथों को लड़ाऊं। मेरा बायां हाथ, दायां हाथ लड़ने लगे तो कौन जीतेगा? बायां जीतेगा कि दायां जीतेगा? कोेई भी नहीं जीतेगा। हां, एक बात तय है, दोनों में से कोई नहीं जीतेगा, मैं हार जाऊंगा। क्योंकि दोनों के लड़ने में मेरी शक्ति व्यय होगी। मैं नष्ट होऊंगा, मैं टूटूंगा और नष्ट हो जाऊंगा।
हिंदुस्तान में अच्छे आदमी को सक्रिय होना है–एक सूत्र; और दूसरा सूत्र–हिंदुस्तान अब तक शब्दों में सोचने का आदी रहा है–तथ्यों में सोचने का नहीं।
हम हमेशा शब्दों के खेल में खो जाते हैं। हमें याद ही नहीं रहता कि शब्द में और तथ्य में बहुत फर्क है। तथ्य, फैक्ट्स एक बात है और शब्द बिलकुल ही दूसरी बात है। लेकिन यह हमारी आदत इतनी पुरानी हो गई है कि हम शब्दों में खो जाते हैं और शब्दों में विचार करने लगते हैं। और शब्दों की अलग यात्रा शुरू हो जाती है। और तथ्य पड़ा रह जाता है उसकी हमे फिकर ही नहीं रहती कि तथ्य क्या है? फैक्ट क्या है?
धीरे-धीरे शब्दों का एक जाल खड़ा हो जाता है और जिंदगी उदास होती चली जाती है क्योंकि जिंदगी बदलती है तथ्यों से। जिंदगी शब्दों से नहीं बदलती है। क्योंकि हम शब्दों के आदी हो गए हैं–तथ्यों की हमारी आदत ही नहीं रही।
इसलिए भारत में विज्ञान पैदा नहीं हो सका। साइंस पैदा नहीं हो सकी। फिलासफी तो पैदा हुई क्योंकि फिलासफी तो शब्दों का खेल है। साइंस पैदा नहीं हुई क्योंकि साइंस तथ्यों से चलती है ‘फैक्ट्स’ से चलती है। हिंदुस्तान का भविष्य बुरे से बुरा होता चला जाएगा, अगर हिंदुस्तान में साइंटीफिक माइंड पैदा नहीं होता।
ओशो - स्वर्ण पाखी था जो कभी-(प्रवचन-02)
यह अवधारणा ताओवाद और झेन बौद्ध धर्म में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। नदी की तेज धारा के विरूद्ध नहीं नदी की तेज धारा के साथ बहना चाहिए।
Wu = नहीं / absence
Wei = करना / forced action
“बिना ज़बरदस्ती के कर्म”
“प्रयासहीन क्रिया" या
"अकर्मता के माध्यम से क्रिया"
जैसे:
- मौसम बदलना
- नदी का बहना
- जन्म और मृत्यु
- दिन और रात
- सब प्रकृति के फ्लो में हो रहा है।
ऐसे ही तुम भी अपने आप को जिस काम में मन नहीं लगता उसके लिए अपने ऊपर बल मत दो वो करो जिसमें तुमको समय के साथ बहता हुआ प्रतीत हो वही काम तुम्हारा है वाकी तो सब बल होगा। मॉडर्न साइकोलॉजी इसे कई बार
“Flow State” भी कहती है।
मान लो तुम किसी इंसान को पकड़कर ज़बरदस्ती पीछे धकेलने की कोशिश करते हो। जैसे ही तुम बल लगाओगे, सामने वाला भी उतनी ही ताकत से विरोध करेगा।
फिर क्या होगा?
तुम दोनों एक ऐसी लड़ाई में फँस जाओगे जहाँ ऊर्जा बहुत खर्च होगी, लेकिन किसी को वास्तविक शांति या नियंत्रण नहीं मिलेगा। यानी जितना ज़्यादा तुम कंट्रोल करने की कोशिश करोगे, उतना ही विरोधी बल पैदा होगा।
यही गलती इंसान जीवन में भी करता है।
हम हर चीज़ को अपनी इच्छा के अनुसार चलाना चाहते हैं:
- लोग हमारे हिसाब से व्यवहार करें।
- परिस्थितियाँ हमारे अनुसार बदलें।
- भविष्य वैसा बने जैसा हम चाहते हैं।
लेकिन जीवन पर अत्यधिक नियंत्रण की यह इच्छा अक्सर तनाव, संघर्ष और थकान पैदा करती है। क्योंकि अस्तित्व को पूरी तरह फोर्स नहीं किया जा सकता।
अब जूडो कराटे को देखो।
जूडो में हमेशा ताकत से जीतने की कोशिश नहीं की जाती। एक अच्छा प्रैक्टिशनर सामने वाले की ऊर्जा को समझता है। वह धैर्य रखता है, ऑब्जर्व करता है, और इंतज़ार करता है कि सामने वाला कब अपना संतुलन खोता है या ज़रूरत से ज़्यादा फोर्स लगाता है।
और जैसे ही वह व्यक्ति ओवररिच करता है, बहुत कम एफर्ट से उसे गिराया जा सकता है।
यही है वू वेई का सार।
वू-वेई के लाभ हैं:
1. मानसिक शांति
2. आत्म-संतुष्टि
3. जीवन की सरलता
4. स्वास्थ्य और दीर्घायु
जीवन यात्रा... 🚶🏻♂️
भारत के लोगों में प्रमुख पोषक तत्वों की कमी:
1. विटामिन D
2. विटामिन B12
3. आयरन
4. जिंक
5. प्रोटीन
नीचे लिस्ट दी गई है आपको पता होना चाहिए आपको कौन सी चीज कितनी खानी है और वो रिक्वायरमेंट कैसे पूरी होगी।
सेव करके रखे।
कृष्ण संपूर्णता के प्रतीक हैं।
पूर्णता का नाम ही कृष्ण हैं।
कृष्ण का व्यक्तित्व बहुत अनूठा है। अनूठेपन की पहली बात तो यह है कि कृष्ण हुए तो अतीत में, लेकिन हैं भविष्य के। मनुष्य अभी भी इस योग्य नहीं हो पाया कि कृष्ण का समसामयिक बन सके। अभी भी कृष्ण मनुष्य की समझ से बाहर हैं। भविष्य में ही यह संभव हो पाएगा कि कृष्ण को हम समझ पाएं।
इसके कुछ कारण हैं।
सबसे बड़ा कारण तो यह है कि कृष्ण अकेले ही ऐसे व्यक्ति हैं जो धर्म की परम गहराइयों और ऊंचाइयों पर होकर भी गंभीर नहीं हैं, उदास नहीं हैं, रोते हुए नहीं हैं। साधारणतः संत का लक्षण ही रोता हुआ होना है। जिंदगी से उदास, हारा हुआ, भागा हुआ। कृष्ण अकेले ही नाचते हुए वयक्ति हैं। हंसते हुए, गीत गाते हुए।
कृष्ण यथार्थवादी हैं। वे राग, प्रेम, भोग, काम, योग, ध्यान और आत्मा-परमात्मा जैसे विषयों को उनके यथार्थ रूप में ही स्वीकार करते हैं।
कृष्ण का महत्व अतीत के लिए कम और भविष्य के लिए ज्यादा है। सच ऐसा है कि कृष्ण अपने समय से कम पांच हजार वर्ष पहले पैदा हुए। सभी महत्वपूर्ण व्यक्ति अपने समय से पहले पैदा होते हैं और सभी गैर-महत्वपूर्ण व्यक्ति अपने समय के बाद पैदा होते हैं। बस महत्वपूर्ण और गैर-महत्वपूर्ण व्यक्त्ति में इतना ही फर्क है। और सभी साधारण व्यक्ति अपने समय के साथ पैदा होते हैं। ऐसे महत्वपूर्ण व्यक्ति को समझना आसान नहीं होता। उसका वर्तमान और अतीत उसे समझने में असमर्थता अनुभव करता है। ओशो ने कितना सुंदर कहा है कि जब हम समझने योग्य नहीं हो पाते, तब हम उसकी पूजा करना शुरू कर देते हैं। या तो हम उसका विरोध करते हैं। या तो हम गाली देते हैं या हम प्रशंसा करते हैं। दोनों पूजाएं हैं एक शत्रु की है, एक मित्र की है।
दुख, निराशा, उदासी, वैराग्य, जैसी बातें कृष्ण ने पृथ्वी पर नहीं कीं। पृथ्वी पर जीनेवाले, उल्लास, उत्सव, आनंद, गीत, नृत्य, संगीत को कृष्ण ने विस्तार दिया। कृष्ण ने इस संसार की सारी चीजों को उनके वास्तविक अर्थों में ही स्वीकार किया।
भगवान कृष्ण-कृष्ण स्मृति
ओशो –प्रवचन-01
If only these words had come from India’s Prime Minister Narendra Modi, every Indian would truly feel their chest swell with pride.
This is how India’s voice should reach the world. 🇮🇳
To
The President of the United States of America @POTUS
Dear Mr. President,
We, the people of India, belong to a free and sovereign nation. We no longer take orders from distant foreign shores.
Please mind your own business to the best of your abilities.
Mutual respect between sovereign nations is the only foundation of lasting global peace.
We wish your country and its people peace and prosperity.
Kamal Haasan - A Proud Indian Citizen
Founder, Makkal Needhi Maiam
@Shankarjorwal नियति कोई आध्यात्मिक या रहस्यमय शक्ति नहीं है;
मनुष्य की स्थिति उसकी भौतिक परिस्थितियों और सामाजिक ढांचे से निर्मित होती है।
जिसे हम ‘भाग्य’ कहते हैं, वह दरअसल आर्थिक व्यवस्था का परिणाम है—
वही तय करती है कि कौन शोषित होगा और कौन शासक।
मन का स्वभाव है दौड़ना। वह या तो अतीत की जुगाली करता है या भविष्य के सपने बुनता है। जब आप शांत बैठते हैं, तो मन घबरा जाता है क्योंकि शांत बैठना मन की मृत्यु है। इसीलिए वह और तेज़ी से विचार फेंकता है ताकि आप उसमें उलझ जाएं।इस चक्र को तोड़िए, साक्षी बनिए और परम आनंद प्राप्त कीजिए।
Basics of philosophy:
Metaphysics - How things are
Ontology - What there is
Epistemology - How we know
Ethics - How we act
Aesthetics - What beauty is
Logic - How reasoning works
Phenomenology - How things appear
Axiology - What values are
Semantics - What language means
🚶♂️ जीवन यात्रा
कोई मंज़िल की ओर नहीं,
बल्कि
झूठी मंज़िलों के गिरने की प्रक्रिया है।
जब सब गिर जाए—
तो जो बचता है,
उसे जानने की ज़रूरत नहीं पड़ती।
वह स्वयं है।
नेति… नेति…
और फिर—
🔕 मौन।
यह जो है वह है कैसे?
दर्शन की शुरुआत किसी सिद्धांत, ग्रंथ से नहीं होती, यहाँ तक कि ईश्वर से भी नहीं, दर्शन की शुरुआत एक सीधे, लगभग असहज प्रश्न से होती है:
यह जो है, वह है कैसे, और क्यों है?
हम जब भी सोचते हैं, हम पहले सृष्टि रख देते हैं, फिर आत्मा, फिर ईश्वर पर अगर ईमानदारी से देखा जाए, तो हमारे लिए न सृष्टि पहले आती है, न आत्मा, न ईश्वर।
पहले आता है अनुभव और इसी अनुभव से दर्शन जन्म लेता है।
अब यहीं से प्रश्न उठता है। क्या जो देख रहा है, वह वही है जो पल पल बदल रहा है? शरीर दिखता है उसकी उम्र, उसकी थकान, उसकी मृत्यु तक दिखाई देती है। विचार आते हैं, जाते हैं आज जो सत्य लगता है, कल भ्रम बन जाता है।
पर जो शरीर को देख रहा है, जो विचारों को आते-जाते देख रहा है वह स्वयं कहीं दिखाई नहीं देता फिर भी अजीब बात यह है कि उसी पर सबसे कम संदेह होता है कि वो जो है वो भी इंप्लांटेड तो नहीं है।
शरीर पर संदेह हो सकता है। विचारों पर संदेह हो सकता है। पर “मैं हूँ” इस पर संदेह नहीं होता क्यों?
यहीं से चेतना का प्रश्न उठता है। चेतना को खोजने निकलो तो हाथ में कुछ नहीं आता। कोई आकार नहीं, कोई रंग नहीं, कोई वस्तु नहीं पर बिना चेतना के कुछ भी समझ में नहीं आता कि ये सब कैसे हो रहा है।
अगर मान लो कि चेतना शरीर से पैदा होती है। तो फिर मृत्यु के बाद सब कुछ शून्य हो जाना चाहिए पर यहाँ एक और प्रश्न खड़ा हो जाता है जो अगर शून्य को जानता है, वह स्वयं शून्य कैसे हो सकता है? अगर कुछ भी न हो, तो “कुछ भी नहीं” का अनुभव किसे होगा?
जो बदल रहा है, वह तुम्हारा स्वरूप नहीं हो सकता। और जो कभी नहीं बदलता, वह किसी वस्तु जैसा भी नहीं हो सकता।
यही कारण है कि सत्य को पकड़ने की हर कोशिश असफल हो जाती है। सत्य वस्तु नहीं है वह कुछ भी नहीं है।
और अंत में, सारे प्रश्न एक ही प्रश्न में सिमट जाते हैं सत्य को जानने वाला कौन है, क्या कभी हुआ है या सब हवाई फायर किए गए है?
यह प्रश्न उत्तर के लिए नहीं है। आपको वो अनुभव कब होगा? क्या दिमाग के केमिकल हिलने से बस हेलुसिनेशन होगा?
नेति! नेति!
जीवन यात्रा... 🚶♂️
ज़रूरी हेल्थ टेस्ट हर व्यक्ति को करवाने चाहिए, अगर आप पूरी तरह स्वस्थ हैं या किसी तरह की दिक्कत है, तब भी लाइफस्टाइल में ये कुछ टेस्ट ज़रूर जोड़ लें। साल में एक बार ये जांच बहुत ज़रूरी हैं।
18 साल के बाद (हर साल) सबसे ज़रूरी
CBC - खून की कमी, इन्फेक्शन
ब्लड शुगर (Fasting + HbA1c) - डायबिटीज़ की पहचान
ब्लड प्रेशर (BP) - बिना लक्षण नुकसान
लिपिड प्रोफाइल - हार्ट अटैक का खतरा
लिवर फंक्शन टेस्ट (LFT) - फैटी लिवर
किडनी फंक्शन टेस्ट (KFT) - किडनी की हालत
यूरिन रूटीन टेस्ट - किडनी/डायबिटीज़
विटामिन D - हड्डियों की कमजोरी
विटामिन B12 - नसों और याददाश्त की समस्या
आयरन प्रोफाइल (महिलाओं के लिए ज़्यादा ज़रूरी) - एनीमिया
30 साल के बाद (ज़रूर जोड़ें)
थायरॉइड प्रोफाइल - वजन, थकान, हार्मोन
ECG - दिल की धड़कन
अल्ट्रासाउंड पेट - फैटी लिवर, पथरी
40 साल के बाद (बहुत ज़रूरी)
TMT / स्ट्रेस टेस्ट - दिल की नसों की जांच
PSA (पुरुष) - प्रोस्टेट
मैमोग्राफी + पैप स्मियर (महिला) - कैंसर स्क्रीनिंग
आंखों की जांच (Fundus) - डायबिटीज़/BP का असर
50 साल के बाद
बोन डेंसिटी टेस्ट (DEXA) - हड्डियों की मजबूती
स्टूल टेस्ट / कोलोनोस्कोपी - आंतों का कैंसर
कितनी बार करवाएं?
स्वस्थ व्यक्ति - साल में 1 बार
डायबिटीज़ / BP / मोटापा - 6 महीने में
परिवार में बीमारी का इतिहास - डॉक्टर की सलाह से
याद रखें: बीमारी अचानक नहीं आती, 90% भविष्य की होने वाले बीमारियां इन्हीं टेस्ट से पहले ही पकड़ में आ जाती है। आप साल या दो साल में कितने टेस्ट करा लेते है?