अन्द्रेई तारकोव्स्की की फिल्म 'मिरर' का एक संवाद है: "मैं गिर पड़ा और अचानक मैंने कुछ बहुत ही उल्लेखनीय चीजें पाईं। झाड़ियाँ, सूखे पत्ते और घासें। इनमें से कोई भी उलझन में न था, संशय से ना भरा था, अलग-थलग नहीं था- मेरी तरह!"
(लेखांश)
~सुशोभित 🌻🤍
चाँदी उगने लगी है बालों में
ये उम्र तुम पर हसीन लगती है
यूँ भी अच्छा ही लगता है,
लेकिन देखकर अपनी हामला शाखें
गुलमोहर फूला-फूला रहता है।
~गुलज़ार सा'ब🌷
मरेंगे हम किताबों में, वरक होंगे कफ़न अपना
किसी ने न हमें जाना, न पहचाना सुख़न अपना
बनाया गुट कोई अपना, न कोई वाद अपनाया
आज़ादी सोच में रखी, यहीं हारा है फ़न अपना !
- नामवर सिंह
( First time at the Central Library, and I'm already in love with this place 💌 )
मुझे साफ़ पानी और
कम क्रूरता वाला शहर चाहिए जहाँ
अगर कोई हमला करने आए तो बचाने के लिए बग़ल वाला आए। वह न आए तो उसके बग़ल वाला आए और अगर वह भी न आए तो पूरे शहर में चर्चा शुरू हो जाए कि देखो आजकल आदमी को बचाने आदमी कैसे नहीं आता।
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/देवी प्रसाद मिश्र 🌻
“Everything comes in time to him who knows how to wait . . . there is nothing stronger than these two: patience and time, they will do it all.”
— Leo Tolstoy, War and Peace
“I want to leave, to go somewhere where I should be really in my place, where I would fit in.. but my place is nowhere; I am unwanted.”
— Jean-Paul Sartre, Nausea